भविष्य महा पुराण

कल्पवृक्ष एवं कल्पलतादानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन्! जब भगवान् शंकरका माता पार्वतीके साथ विवाह हुआ तो उनके अपत्यकी कल्पनाकर देवगण भयभीत हो गये। वे सभी भगवान् शंकरके पास गये और उनसे ऊर्बरता रहनेको प्रार्थना की। इसपर भगवान् शंकर कुछ खिन्न-से होकर कहने लगे-'देवगण! आपलोग भयभीत न हों, मैं स्थाणुके रूपमें स्थित रहूँगा। इसपर माता पार्वतीने क्रुद्ध होकर देवताओंको शाप दे डाला कि जिस प्रकार आपलोगोंने मुझे पुत्रसे रहित किया है, उसी प्रकार आप सबको भी पुत्रोंकी प्राप्ति नहीं होगी।' देवताओंको इस प्रकार शाप देकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे कहा-'जगत्पते। अब तो हमें पुत्र उत्पन्न होगा नहीं। अपुत्रको गति नहीं होती है ऐसा बुति कहती है। अतः हे महाभाग। दोनों लोकोंगे जैसे उद्धार हो, वैसा कोई आप उपाय बतलायें।

भगवान्ने कहा-देवि! पुररक्षित पुरुष अथवा

नारीको चाहिये कि सुवर्णका एक कल्पवृक्ष बनाकर उसका दान करे। इससे सद्गति प्राप्त होगी अथवा किसी वृक्षमें कल्पवृक्षकी कल्पनाकर उसमें पुत्रत्वकी भावना करनी चाहिये। इससे अपुत्रवान् पुत्रवान् हो जाता है। देवि! इसमें कोई संदेह नहीं है। अतः कल्पवृक्षका दान करना चाहिये। कल्पवृक्ष शुद्ध सुवर्णका होना चाहिये। उसमें बहुत-सी शाखाएँ और पत्र-पुष्प हों। उसे रत्नोंसे अलंकृत तथा फलोंसे सुसज्जित करना चाहिये। नृपसत्तम! वह कल्पवृक्ष अपनी शक्तिके अनुसार बीस पल सुवर्णसे अधिकका होना चाहिये। इसी प्रकार चाँदीसे भी बनाया जा सकता है। नदीके तटपर, घरपर या देवालयमें पूर्व आदि दिशामें एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। मण्डप दस हाथ प्रमाणका होना चाहिये। दस हाथकी वेदी भी निर्मित करनी चाहिये। मण्डपके अग्निकोणमें मेखलायुक्त प्रामाणिक एक अग्निकुण्ड भी बनवाये। वैदिक ब्राहाणोंका वरण करे। एक उपदेष्टा ब्राह्मणका भी वरण करे। उस कल्पवृक्षको एक प्रस्थ प्रमाणवाले गुडराशिपर स्थापित करे। उस वृक्षकी पाँच शाखाओंपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सूर्यका चित्राङ्कन करे। वृक्षके नीचेकी शाखामें स्त्रीसहित कामदेवके चित्रकी रचना करनी चाहिये। कल्पवृक्षके पूर्वभागमें नमकके ऊपर संतानवृक्षको स्थापित करे और संतानवृक्षपर गायत्रीकी स्थापना करे। कल्पवृक्षके दक्षिण भागमें घृतके ऊपर श्रीदेवीके साथ मन्दार नामक देववृक्षकी स्थापना करे। इसी प्रकार उसी वृक्षके पश्चिम भागमें (जीराके ऊपर) उमाके साथ पारिजात वृक्षकी और उत्तर दिशामें तिलोंके ऊपर सुरभी (गौ)-के साथ हरिचन्दनवृक्षको स्थापित करे। पुनः रेशमी वस्त्रसे वेष्टित, ईख, पुष्पमाला और फलोंसे संयुक्त आठ पूर्ण कलशोंको चारों ओर स्थापित करे। अग्निप्रणयन करके वृक्षोंका अधिवासन करे। अनेक प्रकारके धान्य तथा भक्ष्य-भोज्य नैवेद्योंको भी स्थापित करे। चारों ओर दीपमाला प्रज्वलित कर दे। अनन्तर कल्पवृक्षकी पूजा कर प्रार्थना करे-

कामदस्त्वं हि देवानां कामवृक्षस्ततः स्मृतः ।

मया सम्पूजितो भक्त्या पूरयस्व मनोरथान्॥

(उत्तरपर्व १७८।३१)

'कल्पवृक्ष! आपं देवताओंको इच्छाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसीलिये आपको कामवृक्ष कहा गया है। मैंने भक्तिपूर्वक आपकी पूजा की है, आप मेरे मनोरथोंको पूर्ण करें। इस प्रकार पूजन करनेके बाद रात्रि महोत्सवपूर्वक जागरण करे। ब्राहाण हवन करें। सभी स्थापित देवताओको हवनसे आप्यायित करे। प्रातः काल उठकर स्नानादि कर वेत वस्त्र धारण कर शुभ मुहूर्तमें उस कल्पवृक्षका दक्षिणाके साथ दान कर देना चाहिये। कल्पवृक्षको तीन चार प्रदक्षिणा कर प्रणाम करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे-

नमस्ते कल्पवृक्षाय विततार्थप्रदाय च।

विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये ।।

यस्मात् त्वमेव विश्वात्मा ब्रह्मस्थाणुदिवाकराः ।

मूर्तामूर्तपर बीजमतः पाहि सनातन॥

(उत्तरपर्व १७८ । ३७-३८)

'कल्पवृक्ष! आप प्रचुरमात्रामें अर्थ प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। देव! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले विश्वमूर्ति हैं, आपको प्रणाम है। सनातन ! चूँकि आप विश्वात्मा, ब्रह्मा, शिव, दिवाकर, मूर्त, अमूर्त तथा इस चराचर विश्वके परम कारणरूप हैं, अत: मेरी रक्षा कीजिये।

इस प्रकार आमन्त्रित कर उस कल्पवृक्षको गुरुको समर्पित कर दे एवं चार संतान आदि देववृक्षोंको ऋत्विजोंको समर्पित करे। इस विधिसे दान करनेवाला सूर्यके तेज समान कान्तिमान, अप्सराओंसे परिव्याप्त, किंकिणीजालसे अलंकृत सुन्दर विमानपर चढ़कर सभी बाधाओंसे रहित निर्विघ्न इन्द्रलोकको जाता है। पुण्यकर्मक समास होने के बाद वह पुनः पृथ्वीपर आकर श्रोत्रिय- कुलमें उत्पन्न होता है तथा पराक्रमी, विद्वान्, यज्ञकर्ता एवं धार्मिक राजा होता है। अन्तमें वह भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त करता है।

महाराज युधिष्ठिरने कहा- भगवन् ! संसार  कल्याण करनेके लिये किसी ऐसे दान, व्रत आदिको बतलायें, जिससे मनुष्य यश और लक्ष्मीसम्पन्न, निष्याप और दीर्घायु हो जाता है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-संसारके हितकी इच्छासे मैं वह उपाय बतला रहा हूँ, जिससे मानव भाग्यशाली होता है। कनक कल्पलताके दानसे मनुष्य सौभाग्यशाली हो जाता है। कल्पवृक्षा-दानकी विधिसे ही इसका भी दान करना चाहिये। विधिपूर्वक दिक्पाल-होम, आधार- आज्यभाग-हवन, ग्रहयाग तथा व्याहतियोंसे भी हवन करना चाहिये। हवन आदिके अनन्तर किसी पुण्य पर्वमें स्नानादिसे पवित्र होकर फल, अक्षत, वस्त्र, पुष्प, धूप आदिसे कल्पलताकी अर्चना करनी चाहिये। तदनन्तर प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंसे उसकी प्रार्थना करनी चाहिये-

नमो नमः पापविनाशिनीभ्यो

ब्रह्माण्डलोकेश्वरपालनीभ्यः

आशाशताधिक्यफलप्रदाभ्यो

दिग्भ्यस्तथा कल्पलतावधूभ्यः ॥

या यस्य शक्तिः परमा प्रदिष्टा

वेदे पुराणे सुरसत्तमस्य ।

तां पूजयामीह परेण साम्रा

सा मे शुभं यच्छतु तां नतोऽस्मि ।

(उत्तरपर्व १७२ । १०-११)

'पापोंका विनाश करनेवाली, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और लोकेश्वरों का पालन करनेवाली एवं आशासे अधिक सैकड़ों फल प्रदान करनेवाली दिग्वधूरूपी कल्पलता देवियो! आपको बार-बार नमस्कार है। वेदों तथा पुराणोंमें आप देवताओंकी परम शक्ति कही गयी है, अत: शक्तिस्वरूपा कल्पलते! मैंने सामध्वनिसे आपका पूजन किया है, आप मेरा कल्याण करें, आपको नमस्कार है।' इस प्रकार प्रार्थनाकर दस दिशारूपी दस कल्पलताएँ ब्राह्मणोंको दान कर दे और क्षमा- याचना करे। इस विधिके अनुसार दान करनेवाला इस लोकमें विजयी, धनवान् और पुत्रवान् होता है। मरनेके बाद इन्द्रलोकमें मन्वन्तरपर्यन्त निवास करता है। अनन्तर पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है। जो नारी यह दान देती है, वह शक्तिसमन्वित चक्रवर्ती पुत्रको जन्म देती है। जो इस कल्पलताके * दानको देखता है, अनुमोदन करता है अथवा इसके माहात्म्यको सुनता है वह भी मुक्त हो जाता है।(अध्याय १७८-१७९)