भविष्य महा पुराण

भुवनप्रतिष्ठाका माहात्म्य, धर्मात्मा रजिकी कथा

महाराज युधिष्ठिरने कहा-मधुसूदन! अब आप कोई ऐसा उपाय बतलायें, जिससे इस लोकमें शाश्वती प्रतिष्ठा, महनीय कीर्ति, अक्षय संतति, प्रचुर सम्पत्ति तथा परलोकमें पितरोंको सद्गति प्राप्त हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! आपने संसारके उपकारके लिये ही इस बातको पूछा है अब मैं परम रहस्यमय भुवनप्रतिष्ठाकी विधिको संक्षेपमें बता रहा हूँ। भुवनप्रतिष्ठाके दानसे देवता, गन्धर्व, असुर, नाग, किन्नर, यक्ष, राक्षस, प्रेत, पिशाच, भूत आदि सभीकी प्रतिष्ठा हो जाती है। व्रतीको चाहिये कि सर्वप्रथम उत्तम मुहूर्त देखकर सात हाथ लम्बे-चौड़े मजबूत शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ श्वेत वस्त्र लेकर उसपर चित्रकर्ममें निपुण चित्रकारसे चौदहों भुवनोंका चित्र बनवाये। कुशल चित्रकारको बुलाकर वस्त्र, आभूषण तथा पुष्प आदिसे उसकी पूजाकर उसे चित्रकर्ममें नियुक्त करना चाहिये। उस समय आचार्यसहित ब्राह्मणोंका भी वस्त्रादिसे पूजन करना चाहिये। ब्राह्मण वेदध्वनिके साथ पुण्याहवाचन करें शङ्ख-भेरीसे मङ्गल शब्द करते हुए चित्रकर्म आरम्भ कर पुराणोंमें कही हुई विधिके अनुसार भुवनोंको चित्रित कराना चाहिये। वस्त्रके मध्यमें सर्वप्रथम जम्बूद्वीप, उसके मध्यमें मेरुपर्वत और उसके ऊपर देवताओंकी स्थापना करे एवं आठ दिशाओंमें आठ दिक्पालोंकी पुरियों तथा देवताओंके साथ सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी बनवाये। वह पृथ्वी सात कुलाचलों, सात समुद्रों, नदी, नद, सरोवर, सात पातालों, भूर्भुवः आदि सात लोकोंसे समन्वित हो। उसपर ब्रह्मादि देवताओंके लोक, ध्रुवमार्ग, ग्रह और तारागणोंसे युक्त सूर्यदेव, दानव, यक्ष, राक्षस, ऋषि, मुनि, गौ, देवमाता अदिति, सुपर्ण आदि पक्षी, नाग और ऐरावत आदि-आठ दिग्गज भी अङ्कित करे। इस प्रकार वस्त्रके ऊपर सम्पूर्ण भुवनकी रचना करवाये। उस कल्पित भुवनमें पृथ्वी, तेज, वायु आदि पञ्चतत्त्वों, अहंकार, मन, बुद्धि तथा सत्त्वादि तीन गुणों, प्रकृति तथा पुरुषको भी सर्वत्र व्याप्त समझकर यथाविधि अङ्कित करवाना चाहिये।

कार्तिक पूर्णिमा, अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग तथा ग्रहणमें इसकी पूजा करनी चाहिये। एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसके बीच चित्रपट स्थापित करना चाहिये। एक हाथ लम्बा-चौड़ा चौरस चार कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर दो-दो वेदपारङ्गत ब्राहाणोंका हवनके लिये वरण करना चाहिये। ब्राह्मण वस्त्रादि आभूषणसे अलंकृत होकर हवन करें। हवन चित्रपटमें अङ्कित देवताओंके नाम-मन्त्रोंसे करना चाहिये। यजमान भी वस्त्रादिसे अलंकृत होकर आचार्यके साथ चित्रपटस्थ देवताओंका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्यादिसे पूजनकर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे-

ब्रह्माण्डोदरवर्तीनि भुवनानि चतुर्दश।

तानि संनिहितान्यत्र पूजितानि भवन्तु मे।

ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो ह्यादित्या वसवस्तथा।

पूजिताः सुप्रतिष्ठाश भवन्तु सततं मम ।।

(उत्तरपर्व १९१ । ३०-११)

'ब्रह्माण्ड में स्थित चौदहों भुवन इस चित्रपटमें अधिष्ठित हों, वे मेरे द्वारा पूजित हों। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, आदित्य तथा वसु देवताओ! मेरे द्वारा पूजित होनेपर आप सब इसमें प्रतिष्ठित हो जायँ।'

इस प्रकार भुवनमय उस चित्रपटकी प्रदक्षिणा करे और अनेक प्रकारकी भोजन-सामग्री तथा मिष्टात्र आदिका नैवेद्य लगाये। रात्रिको जागरण कर विविध प्रकारके वाद्य-यन्त्रोंको बजाते हुए वेदध्वनि करनी चाहिये। गीत-नृत्यके द्वारा उत्सव मनाना चाहिये।

प्रात:काल होते ही स्नानकर वस्त्र-आभूषण धारण कर पहलेकी भाँति ही चित्रपटकी पूजाकर एक सौ गोएँ अथवा दो गायें तथा उपानह, छाता एवं 'घरको उपयोगी सामग्री भी ऋत्विजोंको दान करे। फिर सुन्दर रथ लाकर उसे पताका, ध्वज, तोरण आदिसे अलंकृत कर उसमें दो हाथी अथवा घोड़े खींचने के लिये जोते। तदनन्तर रथपर भुवनमय चित्रपटको स्थापितकर ब्राह्मणके साथ ले जाकर देवमन्दिरमें स्थापित कर उसका पूजन करना चाहिये। वहाँ महोत्सव मनाना चाहिये। उत्तम चाँदीका छन्त्र, घण्टा, ध्वज, चामर आदि चढ़ाकर गुरु और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देकर दीन, अन्ध, बधिर, कृपण आदिको भोजन कराये। अपने मित्र, बन्धु तथा स्वजनोंको भी भोजन कराना चाहिये।

इस विधिसे जो पुरुष अधवा स्त्री भुवनकी देवालय आदिमें प्रतिक्षा करता है, वह मानो चराचर त्रैलोक्यको स्थापना कर लेता है और उससे वह अपने कुलका भी उद्धार कर लेता है। जितने समयतक देवालय में चित्रपट स्थापित रहता है और पूजित होता है, उतने समयतक त्रैलोक्यमें

उसकी अक्षय कीर्ति फैलती रहती है और जिसने समयतक लोकमें कीर्ति रहती है, उतने हजार वर्षतक वह व्यक्ति स्वर्गमें निवास करता है। गन्धर्व और अप्सराएँ उसकी सेवामें निरत रहते हैं। वह बहुत समयतक स्वर्गका सुख भोगकर पुण्यक्षय होनेपर इस भूमिपर जन्म लेकर धर्मात्मा, दीर्घायु, ऐश्वर्यवान्, प्रतापी और पुत्र-पौत्र आदिसे युक्त होकर दस जन्मोंतक राजा होता है।

 राजन्! इस विषयमें एक आख्यान प्रसिद्ध है। सुना जाता है कि प्राचीन कालमें रजि नामकाजितेन्द्रिय चक्रवर्ती एक राजा हुआ था। उसने समस्त पृथ्वीके राज्यको जीत लिया और दैत्योंको युद्ध में हराकर स्वर्गको एवं उनके आधिपत्यको इन्द्रके हाथमें समर्पित कर दिया। किसी समय उसकी राजसभामें ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि पुलस्त्य अपने शिष्योंके साथ पधारे। राजा रजिने पुलस्त्यजीका बड़ा आदर-सत्कार किया और पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क आदिसे पूजनकर उन्हें आसन प्रदान किया। कुशल-क्षेमके पश्चात् राजाने पुलस्त्यजीसे पूछा- 'ऋषिवर ! मैंने कौन-सा व्रत, दान अथवा तप किया है, जिसके प्रभावसे मुझे धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादिसे समन्वित यह निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है।' पुलस्त्यमुनिने कहा-'राजन्! इससे सात जन्मपूर्व तुम वाराणसी में धन-धान्यसम्पन्न धर्मात्मा और सत्यवादी एक वैश्य थे। तुमने अनेक पुराणों की कथाएँ सुनी तथा अनेक प्रकारके दान तो दिये ही भुवनकी प्रतिष्ठा भी की थी। उसी प्रतिष्ठाके प्रभावसे तुम सात जन्मसे राजाका पद प्राप्त कर रहे हो और तुम्हारी कीर्ति संसारमें फैली हुई है। अगले सात जन्ममें भी राजाका पद प्राप्त करोगे और अन्तमें तुम्हें मुक्ति मिल जायगी।

जो तुमने पूछा, वह मैंने बता दिया। जो स्त्री अथवा पुरुष भुवनप्रतिष्ठा करते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं। इस प्रकार कहकर महातेजस्वी पुलस्त्यजी अपने धामको चले गये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! इस भुवनप्रतिष्ठासे धर्मकी वृद्धि, अभीष्टकी सिद्धि, पापका क्षय और सभी कार्योंकी सिद्धि हो जाती है। (अध्याय १७१)