गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
238 - गीतासार
श्रीभगवानने पुनः कहा - हे अर्जुन! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि - यह अशष्ठङ्ग योग मुक्तिके लिये कहा गया है। शरीर, मन और वाणीको सदा सभी प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त रखना चाहिये; क्योंकि अहिंसा ही परम धर्म है और उसीसे परम सुख मिलता है -
कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा॥
हिंसाविरामको धर्मों ह्याहिंसा परमं सुखम्।
सदा सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिये। कभी भी अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये, प्रिय - मिथ्या वचन भी नहीं बोलना चाहिये, यही सनातन धर्म है -
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्म: सनातन:॥
चोरीसे या बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है। इसके विपरीत आचरण करना अर्थात् कभी भी चोरी न करना अस्तेय है। स्तेय - कार्य(चोरी) कभी भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि अस्तेय (चोरी न करना) ही धर्मका साधन है -
यच्च द्रव्यापहरणं चौर्याद्वाथ बलेन वा।
स्तेयं तस्थानाचरणमस्तेयं धर्मसाधनम्॥
सदा और सभी अवस्थामें कर्म, मन और वाणीके द्वारा मैथुनका परित्याग करना चाहिये। इसीको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्यका ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है। प्रयत्नपूर्वक परिग्रहका परित्याग करना चाहिये। शौच दो प्रकारके हैं - बाह्य और आभ्यन्तर। मृत्तिका और जल आदिके द्वारा बाह्य एवं भाव - शुद्धिके द्वारा आभ्यन्तर शौच होता है। यदृच्छालाभ अर्थात् अनायास - प्राप्तिसे संतुष्ट होना ही संतोष है। यह संतोष ही सभी प्रकारके सुखका साधन है। मन और इन्द्रियोंकी जो एकाग्रता है, वही परम तप है। कृच्छ और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा देहका शोषण भी तपस्या है। पुरुषोंकी सत्त्व शुद्धिके लिये जो वेदान्त, शतरुद्रीयका पाठ और ‘ॐ’कार आदिका जप है, पण्डित जन उसे स्वाध्याय कहते हैं।
कर्म, मन और वाणीसे हरिकी स्तुति, नाम - स्मरण, पूजादि कार्य और हरिके प्रति अनिश्चला भक्तिको ही ईश्वरका चिन्तन कहा जाता है।
स्वस्तिकासन, पद्मासन और अर्धासन आदि आसन कहे गये हैं। अपने शरीरगत वायुका नाम प्राण है। उस वायुके निरोधको प्राणायाम कहा जाता है। हे पाण्डव! इन्द्रियाँ असद्विषयोंमें विचरण करती हैं। उनको विषयोंसे निवारित करना चाहिये। साधुगण इस प्रकारके इन्द्रिय - निरोधको प्रत्याहार कहते हैं। मूर्त और अमूर्त ब्रह्म - चिन्तनको ध्यान कहा जाता है। योगारम्भके समय मूर्तिमान् और अमूर्तरूपमें हरिका ध्यान करना चाहिये।
तेजोमण्डलके मध्यमें शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी चतुर्भुज - कौस्तुभ चिह्नसे विभूषित, वनमाली, वायुस्वरूप जो ब्रह्म अधिष्ठित है ‘मैं वही हूँ’। इस प्रकार मनका लय करके श्रीहरिको धारण करना ही धारणा है। ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ और ‘ब्रह्म ही मैं हूँ’ इस प्रकार देशालम्बन - रहित अहं और ब्रह्म पदार्थका तादात्म्य रूप ही समाधि है।