68 - रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे) - की परीक्षा

सूतजीने कहा - अब मैं रत्नपरीक्षाका वर्णन करता हूँ। प्राचीनकालमें बल नामक एक असुर था। उसने इन्द्रादि सभी देवोंको पराजित कर दिया था। उसको जीतनेमें देवगण समर्थ नहीं थे। अतः असमर्थ देवोंने एक यज्ञ करनेका विचार किया और उस असुरके सन्निकट पहुँचकर उससे यज्ञपशु बननेकी अभ्यर्थना की। वचनबद्ध बलासुरने अपना शरीर उन देवोंको दानमें दे दिया। अतः अपने वाग्वज्रसे वह पशुवत्‌ मारा गया।

वचनपर अडिग, पशु - शरीरवाले उस असुरने संसारके कल्याणार्थ एवं देवताओंकी हितकामनाके कारण यज्ञमें शरीरका परित्याग किया था, उस विशुद्ध कर्मको करनेसे उसका शरीर भी विशुद्ध सत्त्वगुण सम्पन्न हो उठा था। अत: उसके शरीरके सभी अङ्ग रत्नोंके बीजके रूपमें परिणत हो गये।

इस प्रकार रत्नोंकी उत्पत्ति होनेपर देवता, यक्ष, सिद्ध तथा नागोंका उस समय बहुत बड़ा उपकार हुआ। जब वे सभी विमानके द्वारा उसके शरीरको आकाश मार्गसे ले जाने लगे तो यात्रावेगके कारण उसका शरीर स्वत: खण्ड - खण्ड होकर पृथिवीपर इधर - उधर गिरने लगा।

बलासुरके शरीरके अङ्ग खण्ड - खण्ड होकर समुद्र, नदी, पर्वत, वन अथवा जहाँ - कहीं रंचमात्र भी गिरे, वहाँ रत्नोंकी खान बन गयी और उन स्थानोंकी प्रसिद्धि उन्हीं रत्नोंके नामपर हो गयी। पृथिवीकी उन खानोंमें विविध प्रकारके रत्न उत्पन्न होने लगे; जो राक्षस, विष, सर्प, व्याधि तथा विविध प्रकारके पापोंको नष्ट करनेमें समर्थ थे।

रत्नोंके विविध प्रकारोंको वज्र (हीरा), मुक्तामणि, पद्मराग, मरकत, इन्द्रनील, वैदूर्य, पुष्पराग, कर्केतन, पुलक, रुधिर, स्फटिक तथा प्रवालादि कहा गया है। पारदर्शी विद्वज्जनोंने उनका यह नामकरण तथा संग्रह यथायोग्य गुणोंको दृष्टिमें रखकर किया है।

अतः रत्नपारखी विद्वानोंको सर्वप्रथम रत्नोंके आकार, वर्ण, गुण, दोष, फल, परीक्षा तथा मूल्य आदिका ज्ञान तत्सम्बन्धित सभी शास्त्रोंके द्वारा विधिवतू प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि कुत्सित लग्न या अनेक कुयोगोंसे बाधित अशुभ दिनोंमें जिन रत्नकी उत्पत्ति होती है, वे सभी दोषपूर्ण होकर अपनी गुण - क्षमताको नष्ट करते हैं।

ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह परीक्षासे किये गये अत्यन्त शुद्ध रत्नोंको धारण करे अथवा उनका संग्रह करे।

जो रत्नशास्त्रोंके ज्ञाता, कुशल, रत्नसंग्रही तथा परीक्षण - कार्यमें दक्ष होते हैं, उन्हींको रत्नोंके मूल्य और मात्राको जाननेवाले कहा गया है। वज्र (हीरा) - को महाप्रभावशाली कहा गया है, इसलिये सर्वप्रथम उसीकी परीक्षाको बतायेंगे।

वज्रायुध इन्द्रपर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले उस बल नामक असुरके अस्थिभाग पृथिवीके जिन - जिन स्थानोंमें गिरे, वे हीरे बनकर उन स्थानोंमें नाना प्रकारकी आकृतिवाले हो गये।

हिमाञ्चल मातंग, सौराष्ट्र, पौण्डू, कलिंग, कोसल, वेण्वातट तथा सौवीर नामक आठ भूभाग हीरोंके क्षेत्र हैं। हिमालयसे उत्पन्न हीरे ताम्रवर्ण, वेणुकाके तटसे प्राप्त चन्द्रमाके समान श्वेत, सौवीर देशवाले नीलकमल तथा कृष्णमेघके समान, सौराष्ट्रप्रान्तीय ताम्रवर्ण एवं कलिंगदेशीय सोनेके समान आभावाले होते हैं। इसी प्रकार कोसल देशके हीरोंका वर्ण पीत, पुण्ड्रदेशीय श्याम तथा मतंगक्षेत्रवाले हलके पीतवर्णके होते हैं।

यदि इस संसारमें कहींपर भी अत्यन्त क्षुद्र वर्ण, पार्श्वभागोंमें भली प्रकारसे परिलक्षित होनेवाली रेखा, विन्दु कालिमा, काकपदक (काकके पदके समान आभारविशेषसे युक्त।) और त्रास ( त्रास - मणिके दोषविशेषको त्रास कहते हैं।)

दोषसे रहित, परमाणुकी भाँति अत्यन्त लघु तथा तीक्ष्ण धारसे युक्त जो भी वज्र अर्थात्‌ हीरा दिखायी देता है, उसमें निश्चित ही देवताका वास समझना चाहिये।

रंगके अनुसार हीरकोंमें देवताओंके विग्रहोंका निश्चय किया गया है। वर्णको ध्यानमें रखकर ही हीरोंका विभाजन करना चाहिये। हरित, श्वेत, पीत, पिंगल, श्याम तथा ताम्रवर्णके हीरे स्वभावत: सुन्दर होते हैं। उन हीरोंमें क्रमानुसार विष्णु, वरुण, इन्द्र, अग्नि, यम और मरुतू - देव प्रतिष्ठित रहते हैं।

ब्राह्मणके लिये शङ्क, कुमुद अथवा स्फटिकके समान शुभ्रवर्णका हीरा प्रशस्त होता है। क्षत्रियके लिये शश (चन्द्रलाञ्छनके समान वर्णवाला), बभ्रु (पिंगल - भूरे वर्णके धातु विशेषके समान वर्णवाला), विलोचन (विलोचन (आँख) प्रसंगके अनुसार आँखकी तारा।) (आँखकी ताराके समान वर्णवाला), वैश्यवर्णके निमित्त कान्त (कुंकुम) अथवा कदलीदलके समान आभावाला तथा शूद्रवर्णके लिये धौत (चाँदी) - के समान अथवा तलवारके सदृश हीरा प्रशस्त है।

विद्वानोंने राजाओंके योग्य दो प्रकारके हीरोंको उत्तम माना है, जो अन्य लोगोंके लिये प्रशस्त नहीं होते हैं। जो हीरा जवावर्ण तथा प्रवालके समान रक्तवर्ण अथवा हल्दी - रसके सदृश पीतवर्णका होता है, वह राजाओंके लिये लाभप्रद है। सभी वर्णोंका स्वामी होनेके कारण अथवा समस्त वर्णोंके गुणोंको अपनेमें समाविष्ट करनेके उद्देश्यसे राजाओंको सभीके कल्याणकी इच्छासे उक्त दो प्रकारके हीरोंको धारण करना चाहिये। ऐसे हीरोंको धारण करनेका अधिकार अन्यके लिये किसी भी प्रकारसे नहीं है।

जिस प्रकार लोकमें निम्न और उच्च वर्णका वर्णसांकर्य दोषावह एवं दु:खदायी होता है, रत्नोंका वर्णसांकर्य उससे भी अधिक दुःखदायी होता है।

केवल वर्णमात्रको देखकर ही विद्वानोंको रत्नका संचय नहीं करना चाहिये, क्योंकि जो गुणवान्‌ रत्न होता है, वही गुण और सम्पत्तिकी विभूति होता है, इसके विपरीत गुणहीन रत्न कष्टका हेतु होता है। जिस हीरेका एक भी श्रृंग टूटा हुआ अथवा छिन्न - भिन्न दिखायी दे तो गुणवान्‌ होनेपर भी धनार्थीजनोंको उसे अपने घरमें नहीं रखना चाहिये।

अग्निके समान स्फुटित, विशीर्ण श्रृंगभागसे युक्त, मलिन वर्णवाले तथा मध्यमें विन्दुओंसे चिह्नित हीरकको धारण करनेपर इन्द्र भी श्रीहीन हो जाते हैं। ऐसे हीरेके संग्रह करनेकी लालसा नहीं करनी चाहिये। जिस हीरेका एक भाग अस्त्र - शस्त्रादिसे विदीर्ण क्षत - विक्षत शरीरकी आभाको प्राप्त हो तथा वह रक्तवर्णसे चित्रित हो तो वैसा हीरा इच्छा - मृत्युसे सम्पन्न शक्तिशाली व्यक्तिकी भी शीघ्र मृत्युको रोक नहीं सकता है। ऐसे हीरेको धारण नहीं करना चाहिये।

षट्कोण, अष्टकोण, द्वादशकोण, षट्पार्श्व, अष्टपार्श्व, द्वादशपार्श्व, षड्धारा, अष्टधारा, द्वादशधारा, उत्तुंग, सम एवं तीक्ष्णाग्र भाग हीरेके खानिक अर्थात्‌ प्रकृतिगत गुण हैं।

जो हीरा षट्कोण, विशुद्ध, निर्मल, तीक्ष्ण धारवाला लघु, सुन्दर पार्श्वभागसे युक्त और निर्दोष है तथा इन्द्रायुथ वज्रके समान स्फुरित अपनी प्रभाको विकीर्ण करनेमें समर्थ हो तो अन्तरिक्ष भागमें स्थित वह हीरा इस पृथिवीलोकमें सुलभ नहीं है।

जो मनुष्य तीक्ष्णाग्र, निर्मल तथा दोषशून्य हीरेको धारण करता है, वह जीवनपर्यन्त प्रतिदिन स्त्री, सम्पत्ति, पुत्र, धन - धान्य और गवादिक पशुओंकी श्रीवृद्धिको प्राप्त करता है। सर्प, विष, व्याधि, अग्नि, जल तथा तस्करादिक भय एवं भिचार - मन्त्रोंके उच्चाटनादिक प्रयोग उसके सन्निकट आनेके पूर्व दूरसे ही प्रत्यागमित हो जाते हैं।

यदि हीरा सभी दोषोंसे रहित तथा भारमें बीस तण्डुलके बराबर हो तो मणिशास्त्रके पण्डितोंने उसका मूल्य अन्य हीरेकी अपेक्षा द्विगुण अधिक कहा है। पूर्वोक्त परिमाणमें तीन भाग, अर्द्धभाग, चतुर्थांश, त्रयोदशांश और तीसवाँ अंश, साठवाँ अंश, अस्सीवाँ अंश, शतांश तथा सहस्रांश भाग न्यूनाधिक होनेपर मूल्यका निर्धारण भी उसके समान ही न्यूनाधिक होता है।

आठ गौर सरसोंके दानोंके भारके बराबर एक तण्डुलका भार होता है।

जो हीरा सभी गुणोंसे सम्पन्न होता है और जलमें डालनेपर तैरता है, वह सभी रत्नोंमें सर्वश्रेष्ठ होता है। उसीको धारण करना उचित है।

जिस हीरेमें अल्पमात्र भी स्पष्ट अथवा अस्पष्ट दोष होता है तो स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा उस हीरेको मनुष्य दशांश कम मूल्यमें ही प्राप्त कर लेता है। जिस हीरेमें छोटे अथवा बड़े अनेक दोष प्रकट रहते हैं, उस हीरेका मूल्य स्वाभाविक मूल्यकी अपेक्षा शतांश ही माना गया है।

अलंकारके रूपमें प्रयुक्त हीरेमें यदि किसी भी प्रकारका दोष परिलक्षित होता है तो अपेक्षाकृत उसका मूल्य बहुत ही कम हो जाता है। यदा - कदा जो हीरा सबसे पहले गुण - सम्पत्तियोंसे परिपुष्ट माना जाता है, वही बादमें दोषयुक्त हो जाता है। राजाको ऐसे दोषपूर्ण हीरेसे बने आभूषणको धारण नहीं करना चाहिये। गुणहीन होनेपर तो मणि भी आभूषणके योग्य नहीं होती है।

पुत्रप्राप्तकी अभिलाषा रखनेवाली स्त्रीके लिये सर्वगुण - सम्पन्न होनेपर भी हीरा प्रशस्त नहीं होता है। दीर्घ, चिपटा, ह्रस्व तथा अन्यान्य गुणोंसे रहित हीरेके विषयमें कुछ कहना ही नहीं, वह तो दोषपूर्ण होता ही है।

हीरेके कुशल विशेषज्ञ लौह, पुष्पराग, गोमेद, वैदूर्य, स्फटिक एवं विविध प्रकारके काँचोंसे हीरकके प्रतिरूपोंका निर्माण कर लेते हैं। अतः विद्वानोंको कुशल परीक्षकोंसे उनकी परीक्षा करवा लेनी चाहिये।

क्षारद्रव्यके द्वारा, उललेखन - विधिसे एवं शाण - प्रयोगसे हीरोंका परीक्षण करना चाहिये। पृथिवीमें जितने भी रत्न हैं अथवा लौहादिक जितनी अन्य धातुएँ हैं, हीरा उन सबमें चिह्नाङ्कन कर सकता है; किंतु अन्य कोई भी रत्न या धातु हीरेमें चिह्न करनेमें समर्थ नहीं है।

गुरुता समस्त रत्नोंके महत्त्वका कारण है, फिर भी रत्नशास्त्रज्ञ हीरेके विषयमें इस निर्देशके विपरीत ही कहते हैं।

पुष्परागादि जातिविशेषके रत्न दूसरी जातिके रत्नको काट सकते हैं, किंतु हीरक एवं कुरुवृन्द (कुरुविन्द - माणिक्य अथवा कुरुबिल्व नामका रत्नविशेष।) अपनी ही जातिके रत्नको काटनेमें सक्षम होते हैं। हीरेसे हीरा ही कट सकता है, अन्य रत्नोंसे वह हीरा काटा नहीं जा सकता है।

स्वाभाविक हीरेके अतिरिक्त हीरक तथा मुक्तादि जितने प्रकारके रत्न हैं, उनमें किसी भी रत्नकी प्रभा ऊर्ध्वगामिनी नहीं होती है। मात्र हीरा ही ऐसा रत्न है, जिसकी प्रभा ऊपरकी ओर जाती है।

यदि हीरा टूटे हुए किनारोंसे दोषयुक्त हो या विन्दु तथा रेखासे समन्वित हो अथवा विशेष वर्णसे रहित हो तो भी इन्द्रायुध - चिह्नसे अङ्कित होनेपर वह मनुष्यको धन - धान्य एवं पुत्रादिसे परिपूर्ण करता है।

जो राजा विद्युत् - तुल्य, समुज्ज्वल एवं चमकते हुए शोभा - सम्पन्न हीरेको धारण करता है, वह अपने पराक्रमसे दूसरेके प्रतापको आक्रान्त करनेमें समर्थ होता है तथा अपने समस्त सामन्तोंको वशमें रखकर वह पृथिवीका उपभोग करता है।