221 - धर्मसारका कथन

श्रीब्रह्मजीने कहा - हे शंकर! अब मैं सभी पापोंका विनाश करनेवाले तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले अतिशय सूक्ष्म धर्मसारको संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें।

शोक शास्त्रीय ज्ञान, धर्म, बल, धैर्य, सुख और उत्साह - इन सबका हरण कर लेता है। अर्थात्‌ शोकके प्रभावसे सभी सात्त्विक वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसीलिये सर्वतो भावसे शोकका परित्याग करना चाहिये।

कर्म ही दारा (स्त्री) है, कर्म ही लोक है, कर्म ही सम्बन्धी है, कर्म ही बान्धव है। (अर्थात्‌ स्त्री, लोक, सम्बन्धी एवं बान्धव आदि कर्मके अनुसार ही मिलते हैं।) कर्म ही सुख - दुःखका मूल कारण है। (अत: उत्तम कर्म करनेके लिये सदा सावधान रहना चाहिये।) दान ही परमधर्म है। दानसे ही पुरुषको सभी अभीष्ट प्राप्त होते हैं। दान ही पुरुषको स्वर्ग और राज्य प्रदान करता है।

इसलिये मनुष्यको दान अवश्य करना चाहिये -

दानमेव परो धर्मो दानात्सर्वमवाप्यते।

दानास्सवर्गश्च राज्यं च दद्याद्दानं ततो नर:॥

विधिपूर्वक प्रशस्त दक्षिणाके साथ दान तथा भयभीत प्राणीकी प्राणरक्षा - ये दोनों समान हैं। यथाविधि तपस्या, ब्रह्मचर्य, विविध यज्ञ एवं स्नानमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य भयभीत प्राणीके प्राणोंकी रक्षासे प्राप्त होता है। जो लोग धर्मका नाश करते हैं, वे नरकमें जाते हैं।

जो होम, जप, स्नान, देवतार्चन आदि सत्कार्यमें तत्पर रहकर सत्य, क्षमा, दया आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न रहते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं।

(ये च होमजपस्नानदेवतार्चनतत्परा:।

सत्यक्षमादयायुक्तास्ते नरा: स्वर्गगामिन:॥)

कोई भी किसीको सुख या दुःख नहीं देता है और न किसीका सुख - दुःख हरण कर सकता है। सभी अपने किये हुए कर्मके अनुसार सुख - दुःखका भोग करते हैं -

न दाता सुखदुःखानां न च हर्तास्ति कश्चन।

भुञ्जते स्वकृतान्येव दुःखानि च सुखानि च॥

जो धर्मकी रक्षाके लिये जीवनदान करता है, वह सभी विषम परिस्थितियों (कठिनाइयों) - को पार कर जाता है। जिनका चित्त सदा संतुष्ट रहता है, वे फल, मूल, शाक आदिके द्वारा जीवनधारण करके भी सुखकी अनुभूति करते हैं -

धर्मांर्थं जीवितं येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते।

सन्तुष्ट: को न शक्‍नोति फलमूलैश्च वर्तितुम्‌॥

सुखकी लालसामें सभी मनुष्य संकटकी स्थितिमें पड़ते हैं। यह लोभका ही परिणाम है, जो अत्यन्त दुष्कर है।

मनुष्यके चित्तमें लोभ उपस्थित होनेसे ही क्रोध उत्पन्न होता है। लोभके कारण ही मनुष्य हिंसा आदि गर्हित कार्योंमें प्रवृत्त होता है। मोह, माया, अभिमान, मात्सर्य, राग, द्वेष, असत्यभाषण एवं मिथ्याचरण - ये सभी लोभसे उत्पन्न होते हैं। लोभसे ही मनुष्य मोह और मदसे उन्मत्त हो जाता है। (इसलिये लोभका परित्याग करना चाहिये) जो शान्त व्यक्ति लोभका परित्याग करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे रहित होकर परमलोकको प्राप्त करता है।

(लोभात्क्रोध: प्रभवति लोभाद्‌ द्रोहः प्रवर्तते।

लोभान्मोहश्च माया च मानो मत्सर एव च॥

रागद्वेषानृतक्रोधलोभमोहमदोज्झित:।

यः स शान्त: परं लोकं याति पापविवर्जित:॥)

हे महादेव! देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व, गुह्यकगण - ये सभी धार्मिकोंकी पूजा करते हैं, धनाढ्य और कामी व्यक्तिकी अर्चना कोई भी नहीं करता है -

देवता मुनयो नागा गन्धर्वा गुह्यका हर।

धार्मिकं पूजयन्तीह न धनाढ्यं न कामिनम्‌॥

अनन्त बल, वीर्य, प्रज्ञा और पौरुषके द्वारा किसी दुर्लभ वस्तुको यदि मनुष्य प्राप्त कर लेता है तो इसके कारण किसीको ईर्ष्यावश शोकाकुल या दुःखी नहीं होना चाहिये।

सभी प्राणियोंके प्रति दयाका भाव रखना, सभी इन्द्रियोंका निग्रह करना और सर्वत्र अनित्यबुद्धि रखना यह प्राणियोंके लिये परम श्रेयस्कर है। मृत्यु सामने वर्तमान है, यह समझकर जो व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता, उसका जीवन बकरीके गलेमें स्थित स्तनके समान निरर्थक है -

सर्वसत्त्वदयालुत्वं सर्वेन्द्रियविनिग्रह:।

सर्वत्रानित्यबुद्धित्वं श्रेय: परमिदं स्मृतम्‌॥

पश्यन्निवाग्रतो मृत्युं यो धर्मं नाचरेन्नर:।

अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्‌॥

हे वृषध्वज! इस लोकमें गोदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। जो न्यायोपार्जित धनसे प्राप्त गौका दान करते हैं, वे अपने सम्पूर्ण कुलको तार देते हैं।

हे वृषध्वज! अन्न - दानसे श्रेष्ठ और कुछ भी दान नहीं है; क्‍योंकि सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ अन्नके द्वारा ही प्रतिष्ठित है।

(न गोदानात्परं दानं किञ्चिदस्तीति मे मति:।

या गौर्न्यायार्जिता दत्ता कृत्स्नं तारयते कुलम्॥

नान्नदानात्परं दानं किञ्चिदस्ति वृषध्वज।

अन्नेन धार्यते सर्वं चराचरमिदं जगत्‌॥)

कन्यादान, वृषोत्सर्ग, जप, तीर्थ, सेवा, वेदाध्ययन, हाथी, घोड़ा, रथ आदिका दान, मणिरत्न और पृथ्वीदान - ये सभी दान अन्नदानके सोलहवें अंशकी भी बराबरी नहीं कर सकते हैं। अन्नसे ही प्राणियोंके प्राण, बल, तेज, वीर्य, धृति और स्मृति - ये सभी प्रतिष्ठित रहते हैं। जो कूप, वापी, तडाग और उपवनका निर्माणकर लोगोंकी संतुष्टिके लिये प्रदान करते हैं, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।

(कूपवापीतडागादीनारामांश्चैव कारयेत्‌।

त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते॥)

साधुओंका दर्शन करना अतिशय पुण्यदायक है। यह सभी प्रकारके तीर्थोंसे भी उत्तम है। तीर्थ तो समय आनेपर फल प्रदान करता है, किंतु सज्जनोंका संग उसी क्षण फल प्रदान कर देता है -

साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थादपि विशिष्यते।

कालेन तीर्थं फलति सद्यः साधुसमागम:॥

सत्य, दम, तपस्या, शौच, संतोष, क्षमा, सरलता, ज्ञान, शम, दया और दान - इनको सनातनधर्म माना गया है-

सत्यं दमस्तपः शौचं सन्‍तोषश्च क्षमार्जवम्‌।

ज्ञानं शमो दया दानमेष धर्म: सनातन:॥