गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
232 - कुलामृत स्तोत्र
सूतजीने कहा - हे शौनक! अब मैं उस कुलामृत नामक स्तोत्रका वर्णन करूँगा, जिसका वर्णन देवर्षि नारदके पूछनेपर शिवने किया था। उसे आप सुनें।
नारदजीने कहा - हे त्रिपुरान्तक भगवन्! जो दुर्मतिपूर्ण मनुष्य संसारमें काम - क्रोध और शुभाशुभ दून्दोंसे तथा शब्दादि विषयोंसे बँधकर सदासे पीड़ित हो रहे हैं, उनकी जन्म - मृत्युरूपी संसार - सागरसे जिस उपायद्दारा क्षणमात्रमें विमुक्ति हो जाय, उसको हम आपसे सुनना चाहते हैं।
इसपर भगवान् शंकर बोले - हे ऋषिश्रेष्ठ! भव - बन्धनको नष्ट करनेवाले और दु:खका विनाश करनेवाले परम गोपनीय रहस्यको मैं कहता हूँ, सुनो - तिनकेसे लेकर ब्रह्मातक चार प्रकारकी चराचर सृष्टि इस जगत्में जिन प्रभुकी मायासे अज्ञानके वशीभूत होकर सदैव सोती रहती है, उन विष्णुकी कृपासे यदि कोई जग जाता है तो वही संसारसे पार होता है। यह संसार देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुस्तर है। भोग और ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त तथा तत्त्वज्ञानसे पराड्मुख, स्त्री, पुत्र और कुट्ठम्बियोंके व्यामोहमें भ्रमित होकर सभी प्राणी नाना प्रकारके दुःख झेलते हैं। इस व्यामोहमें फँसे हुए सभी जीवोंकी वैसी ही गति होती है, जैसी गति समुद्रमें स्नान करनेके लिये आये हुए वृद्ध जंगली हाथियोंकी होती है। जो मनुष्य हरिकीर्तन करनेके समय अपने मुखको बंद रखता है अर्थात् हरिकीर्तनसे पराड्मुख रहता है, वह कोशमें स्थित कीडेके समान होता है। उसकी मुक्ति तो करोड़ों जन्म लेनेपर भी सम्भव नहीं है। अत: हे नारद! प्रसन्न -चित्त होकर सदैव देवदेवेश अव्यय भगवान् विष्णुकी प्रसन्नता पूर्वक सम्यक् आराधना करनी चाहिये।
जो विश्वरूप, अनादि, अनन्त, अजन्मा तथा हृदयमें स्थित, अविचल, सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। शरीर रहित, विधाता, सर्वज्ञान सम्पन्न, मनके रमणके अनन्य आश्रय, अचल, सर्वत्र व्याप्त भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मुक्त हो जाता है। निर्विकल्प (निर्विशेष), निराभास, निष्प्रपञ्च तथा निर्दोष, वासुदेव, परम गुरु भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे मनुष्य मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। सर्वात्मक एवं प्राणिमात्रके ज्ञानके एकमात्र प्रतिनिधि, शुभ, एकाक्षर (एक अक्षर ‘अ’ मात्रसे बोध्य) विष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है। वाक्यातीत (किसी भी वाक्यसे अवर्णनीय), तीनों कालोंको जाननेवाले, लोकसाक्षी, विश्वेश्वर तथा सभीसे श्रेष्ठ विष्णुका सदा ध्यान करनेसे मुक्ति हो जाती है।
ब्रह्मा आदि देव, गन्धर्व, मुनि, सिद्ध, चारण एवं योगियोंके द्वारा सदा सेवित श्रीविष्णुका ध्यान करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। संसार - बन्धनसे मुक्ति चाहनेवाले सभी लोगोंको वरद श्रीविष्णुकी इसी प्रकार सदा स्तुति करनी चाहिये। यदि कोई भी संसार - बन्धनसे मुक्ति चाहता है तो उसे समाहितचित्त होकर अनन्त, अव्यय, देवाधिदेव, अनन्त ब्रह्माण्डमें सर्वोच्च देवके रूपमें सुप्रतिष्ठित, समस्त जगत्के नियन्ता, अज श्रीविष्णुका सदा ध्यान करना चाहिये।
(यस्तु विश्वमनाद्यन्तमजमात्मनि संस्थितमू।
सर्वज्ञमचलं विष्णुं सदा ध्यायेत् स मुच्यते॥
देवं गर्भोचितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते।
अशरीरं विधातारं सर्वज्ञानमनोरतिम्।
अचलं सर्वगं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
निर्विकल्पं निराभासं निष्प्रपञ्च निरामयम्।
वासुदेवं गुरु विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥
सर्वात्मकं च वै यावदात्मचैतन्यरूपकम्।
शुभमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥)
सूतजीने कहा - प्राचीन कालमें देवर्षि नारदके। द्वारा पूछनेपर वृषभध्वज शिवने नारदसे श्रीविष्णुका। जैसा वर्णन किया था वैसा मैंने आपसे कर दिया है। हे तात! निरन्तर उन अक्षय, निष्कल, सनातन,अव्यय, ब्रह्मस्वरूप विष्णुका ध्यान करते हुए आप निश्चित ही उनके शाश्वत पदको प्राप्त करेंगे। हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यकों जो फल प्राप्त होता है, वह एकाग्रचित्त होकर विष्णुका क्षणमात्र ध्यान करनेसे प्राप्त होनेवाले फलके सोलहवें भागकी भी समानता करनेमें समर्थ नहीं है।
भगवान् शिवसे विष्णुके इस माहात्म्यको सुनकर सिद्ध देवर्षि नारदने उनकी सम्यक् आराधना करते हुए परम पदको प्राप्त किया। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक नित्य इस स्तुतिका पाठ करता है, उसके करोड़ों जन्ममें किये गये पाप नष्ट हो जाते हैं। महादेवके द्वारा कही गयी यह स्तुति बड़ी दिव्य है। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक इस स्तुतिका नित्य पाठ करता है, वह अमृतत्त्व अर्थात् परम वैष्णव पदको प्राप्त कर लेता है।