80 - विद्रुममणिकी परीक्षा

सूतजीने पुनः कहा - हे शौनक! शेषनागने उस बलासुरके अन्त्रभागको ग्रहणकर केरल आदि देशोंमें छोड़ा था, अतएव उन स्थानोंपर महागुणसम्पन्न विद्रुममणियोंका जन्म हुआ। उन विद्रुममणियोंमें जो खरगोशके रक्तके समान लोहित होती हैं अथवा गुन्जाफल या जपापुष्पकी आभाको धारण करती हैं, उन्हें श्रेष्ठ माना गया है। नील देश, देवक तथा रोमक नामक स्थान इन मणियोंकी जन्मभूमि है। उनमें उत्पन्न हुई विद्रुममणि अत्यन्त लाल वर्णकी होती है। अन्य स्थानोंसे प्राप्त होनेवाली मणियाँ प्रशस्त नहीं मानी गयी हैं। शिल्पकलाके विशेष योग - कौशलपर ही इनके मूल्यका निर्धारण होता है।

जो विद्रुममणि सुन्दर, कोमल, स्निग्ध तथा लाल - लाल वर्णकी होती है, वह निश्चित ही इस संसारमें मनुष्यको धन - धान्यसम्पन्न बनानेवाली तथा उसके विषादिक दुःखोंको दूर करनेवाली होती है।