106 - अशौच तथा आपद्वृत्ति - निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा - हे यतियो! अब मैं मृत्युके पश्चात्‌ होनेवाले मरणाशौचका वर्णन करता हूँ, उसका श्रवण करें।

दो वर्षसे कम आयुवाले बालककी मृत्यु होनेपर उसको मिट्टीमें गाड़ देना चाहिये। उसके लिये जलांजलि न दे(ऐसे शवको गन्ध, माल्य, अनुलेपन आदिसे अलंकृत करके श्मशानसे अन्यत्र हड्डियोंके समूहसे रहित, ग्राम या नगरके बाहरकी भूमिमें गड्ढा खोदकर रखना चाहिये।(मनुस्मृति 5।68-69))। दो वर्षसे अधिक आयुके बालककी मृत्यु होनेपर उसे सभी बन्धुगण मिलकर श्मशानभूमिमें ले जाकर लौकिक अग्निसे ‘यमसूक्त’ का पाठ करते हुए चितामें जला दें। यज्ञोपवीत होनेके अनन्तर मृत्यु होनेपर सभी क्रियाएँ आहिताग्निके समान करे। मरणतिथिके सातवें दिन अथवा दसवें दिनके पहले अपने कुल एवं गोत्रमें आनेवाले परिजन(समानगोत्र, समानपिण्ड एवं समानोदकवाले लोग।) ‘अप नः शोशुचदघम्‌’(ऋग्वेद 1।97।1—8)) मन्त्रसे दक्षिण दिशाकी ओर अभिमुख होकर यथासम्भव घरसे बाहर जलाशयपर जाकर जलाञ्जलि दे। इसी प्रकार मातामह तथा आचार्य - पत्नी आदिकी भी उदकक्रिया करनी चाहिये।

मित्र, विवाहित स्त्री (लड़की, बहन आदि), भागिनेय, श्वशुर और ऋत्विक् का यदि मरण हुआ है तो इनके अभ्युदयके लिये इन्हें सविधि जलांजलि देनी चाहिये और वह जलांजलि इनके नाम, गोत्रका उल्लेख करते हुए एक ही बार देनी चाहिये। पाखण्डी एवं पतितजनोंकी मृत्यु होनेपर उनकी उदकक्रिया नहीं होती। ब्रह्मचारी, व्रात्य तथा स्वेच्छाचारिणी स्त्रीके लिये भी उदकक्रियाका निषेध है। मद्यपी और आत्महत्या करनेवाले अशौच और उदकक्रियाके पात्र नहीं होते।

व्यक्तिके निधनपर रोना निषिद्ध है, क्योंकि जीवोंकी स्थिति अनित्य होती है। यथाशक्ति श्मशानभूमिमें दाहादिक क्रिया करके स्वजनोंको घर आना चाहिये। द्वारपर पहुँचकर वे सबसे पहले निम्बकी पत्ती चबाकर, तदनन्तर आचमन करके अग्नि, जल, गोबर और श्वेत सरसोंका स्पर्श कर पत्थरपर पैर रखकर धीरेसे घरमें प्रवेश करें। प्रेतका संस्पर्श करनेपर भी मनुष्यको घरमें प्रविष्ट होनेके पूर्व उक्त विहित - कर्म कर लेना चाहिये। सपिण्डमें आनेवाले जो लोग पुण्यप्राप्त करनेमात्रकी दृष्टिसे प्रेतका अनुगमन अर्थात्‌ उसकी दाह - क्रिया आदियमें सम्मिलित होते हैं और वे यदि तत्काल अपनी शुद्धि चाहते हैं तो दाह - क्रिया सम्पन्न करानेके अनन्तर उन्हें स्नान एवं प्राणायाम कर लेना चाहिये।

उस दिन खरीदे हुए पदार्थोंका भोजन करके (बिना माँगे हुए अन्नमात्रका भोजन करना चाहिये।)सभी परिजनोंकों अलग - अलग भूमिपर सोना चाहिये। पिण्डयज्ञके पश्चात्‌ मृत व्यक्तिके उद्देश्यसे विहित पिण्डदानकी प्रक्रियाके अनुसार अपसव्य आदिके रूपमें तीन दिनतक पिण्डरूप अन्न पृथ्वीपर मौन धारण करते हुए दे। श्राद्धके लिये अधिकृत व्यक्ति खुले हुए आकाशके नीचे एक शिक्य आदिके मिट्टीके पात्रमें जल और दूसरे मिट्टीके पात्रमें दूध उस प्रेतात्माको समर्पित करे। श्राद्धकर्ताको अशुचि होनेपर भी श्रौत अग्नि एवं स्मार्त अग्निमें किये जानेवाले नित्यकर्म ( अग्निहोत्र, दर्श पूर्णमास, स्मार्त अग्निमें विहित सायं - प्रात: होम ) - का अनुष्ठान श्रुतिकी आज्ञाके अनुसार करना ही चाहिये।

यदि जन्मके पश्चात्‌ और दाँत निकलनेके पूर्व बालककी मृत्यु हो जाती है तो उनके सम्बन्धियोंकी सद्यः शुद्धि हो जाती है। दाँत निकलनेके पश्चात्‌ चूड़ाकरणतक एक अहोरात्रका अशौच होता है और उपनयन - संस्कारके पहले और चूड़ाकरणके बाद बालककी मृत्यु होनेपर तीन रात्रिके बाद अशौच समाप्त होता है। उपनयन - संस्कारके पश्चात्‌ मृत्यु होनेपर दस रात्रियोंका अशौच होता है। सपिण्डोंके लिये दस रात्रिका एवं समानोदक लोगोंके लिये तीन रात्रिका अशौच होता है।

दो वर्षसे कम आयुवाले पुत्र एवं पुत्रीकी मृत्युपर माता - पिता दोनोंको दस रात्रिका अशौच होता है। यदि इस मरणाशौचके मध्य परिवारमें किसी बालकका जन्म या किसीकी मृत्यु होती है तो प्रथम अशौचके शेष दिनोंके पश्चात्‌ ही शुद्धि हो जाती है।

सपिण्डकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये क्रमश: - दस, बारह, पंद्रह तथा तीस दिनोंका अशौच माना गया है। पाणिग्रहण - संस्कारके पूर्व और वाग्दानके पूर्व तथा चूड़ाकरणके बाद कन्याकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रमें ही शुद्धि हो जाती है। या0 स्मृति 24 वें श्लोककी मिताक्षराके अनुसार दाँत निकलनेके पूर्व यदि बालकका मरण हुआ और उसका अग्नि - संस्कार किया गया तो एक दिनमें शुद्धि हो जाती है। गुरु ( पिता ही यदि गुरु होते हैं तो उनकी मृत्युपर पिताकी मृत्युपर होनेवाला अशौच होगा।) और अन्‍तेवासी (शिष्य) वेदाङ्गोका प्रवक्ता, मामा,(हाँ मामा मात्रको नहीं लेना है, अपितु मातृ - पक्ष एवं पितृ - पक्षके जितने भी बन्धु हैं उन सबको लेना है।) श्रोत्रिय(वेदकी एक शाखामात्रका अध्येता।) एवं अनौरस पुत्र(औरसके अतिरिक्त क्षेत्रज, दत्तक आदि पुत्र।), अपनी वह भार्या जो प्रतिलोम संकरसे अतिरिक्त किसी अन्यके आश्रयमें रह रही है, उसके तथा अपने देशके राजाकी मृत्युपर एक दिनका अशौच होता है। राजा (अभिसिक्त क्षत्रिय आदि राजा), गौ (पशुमात्र), ब्राह्मण (मनुष्यमात्र) - के द्वारा जो आहत होता है, उसके सम्बन्धियोंकी स्नानमात्रसे तत्काल शुद्धि हो जाती है। ऐसे ही जिसने विष या बन्धन आदिके द्वारा बुद्धिपूर्वक आत्मघात कर लिया है, उसके सम्बन्धियोंकी भी तत्काल स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है और समस्त पृथ्वी या पृथ्वीके एक देशके अभिषिक्त अधिपति क्षत्रिय आदिको मरण या उत्पत्तिनिमित्तिक अशौच नहीं होता। सत्री (लगातार अन्नसत्र चलानेवाले), व्रती (कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रतमें प्रवृत्त), ब्रह्मचर्यव्रतमें प्रवृत्त, दाता (वह वानप्रस्थाश्रमी जो केवल दान ही देता है, प्रतिग्रह कभी भी नहीं करता), ब्रह्मविद्‌ (संन्यासी) किसी भी प्रकारके अशौचसे ग्रस्त नहीं होते। दान (किसीको देनेके लिये पूर्वमें संकल्पित द्रव्य),विवाह (विवाहके निमित्त एकत्रित सामग्री), यज्ञ आदि विशेष कृत्योंके लिये एकत्रित सामग्री, संग्राम (युद्धकाल) - में, देशमें अतिभयंकर या राजभयसे उत्पन्न विप्लवकी दशामें, अतिकष्टकर आपत्तिमें किसी भी प्रकारके अशौचकी निवृत्ति तत्काल ही हो जाती है अर्थात्‌ अशौच नहीं होता।

जो अकार्यकारी अर्थात्‌ निषिद्ध कार्य करनेवाले हैं, उनकी शुद्धि दान देनेसे होती है। ग्रीष्म - ऋतु आदिके प्रभावसे जो नदी अत्यल्प जलवाली हो जाती है और उसके किनारे आदि अपवित्र वस्तुओंसे उपहत हो जाते हैं वह नदी जलकेवेगपूर्ण उस प्रवाहसे शुद्ध हो जाती है जो प्रवाह नदीको जलमय बना दे और उसके किनारोंको काट देनेमें समर्थ हो।

आपत्कालमें ब्राह्मणको क्षत्रिय एवं वैश्यवर्णकी वृत्तिसे जीविकाका निर्वाह करना चाहिये, किंतु वैश्यवृत्ति करनेवाले ब्राह्मणके लिये फल, सोमलता, क्षौमवस्त्र (सभी वस्त्र), वेत्र आदिकी लताएँ, औषधि लता, दधि, दुग्ध, घृत, जल, तिल,ओदन, रस, क्षार, मधु, लाक्षा, पकाया हुआ हविष्यान्न, वस्त्र, मणि आदि प्रस्तरमात्र, आसव, पुष्प, शाक, मिट्टी, चर्म, पादुका, मृगचर्म, कौशेय (वस्त्र), लवण, मांस, तिलकुट (पिण्याक), मूल और सुगन्धित द्रव्य - पदार्थोंका विक्रय वर्जित है।

ब्राह्मणके द्वारा अपने श्रौत- स्मार्त - यज्ञकी पूर्णताके लिये अपेक्षित धान्य या अन्य किसी अत्यावश्यक औषधि आदिकी व्यवस्थाके लिये अपेक्षित धान्यके बराबर तिलका विक्रय करके धान्यका संग्रह किया जा सकता है। किंतु आपत्कालमें भी लवणादिका व्यापार ब्राह्मणके लिये अवश्य वर्जित है। (आपत्तियोंके कारण नमकादिके अतिरिक्त) ब्राह्मण अन्य जो कुछ हीन आवैश्यवृत्ति करता है, उसमें वह उसी प्रकार निष्कलुष रहता है जैसे सूर्य। आपत्कालमें ब्राह्मण कृषि एवं पशुपालनादि कार्य कर सकता है, किंतु उसके द्वारा अश्वोंका विक्रय त्याज्य है।

यदि किसी कारण ब्राह्मण कृषि आदिसे भी अपने जीवनकी रक्षा न कर सके तो तीन दिन बुभुक्षित ही रहे। तदनन्तर ब्राह्मणके अतिरिक्त और किसीके यहाँसे केवल एक दिनके लिये धान्य प्राप्त करे तथा अब्राह्मणसे प्राप्त इस धान्यका उपभोग करते समय वह प्रकाशित भी करे कि मैंने अब्राह्मणसे धान्य लेकर आज जीवन - निर्वाह किया है। ऐसे वृत्तिसंकरसे ग्रस्त ब्राह्मणके वृत्त, कुल, रीति, शास्त्राध्ययन, वेदाध्यवयन और तप आदि विशेषताओंको जानकर राजाका यह कर्तव्य होता है कि वह उस ब्राह्मणके लिये धर्मानुकूल जीवन - यापनकी व्यवस्था करे।