188 - व्रण आदि रोगोंकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा - हे रुद्र! प्रहारसे हुआ घाव और मवादयुक्त फोड़ा घीके प्रयोगसे ठीक हो जाता है। दोनों हाथोंसे अपामार्गकी जड़ मलकर उसके रससे चोटके घावको भरनेपर रक्तस्राव रुक जाता है। हे शंकर! लाङ्गलिका मूल तथा इक्षुदर्भ नामक औषधिको पीसकर उसके लेपसे शल्य - काँटायुक्त व्रणका मुख संलिप्त करनेपर काँटा निकल जाता है तथा बहुत दिनोंका गड़ा हुआ भी काँटा घावसे बाहर हो जाता है।

नाड़ीके घावमें बालमूल (मोथा) - की जड़को अथवा मेषश्रृङ्गी (मेढ़ासिंगी) - की जड़ जलमें घिसकर उसका लेप लगानेसे पुराना घाव भी सूख जाता है। भैंसके दहीमें कोदोका भात मिलाकर खानेसे और हींगकी जड़का चूर्ण घावमें भरनेसे भी नाड़ीका व्रण सूख जाता है।

ब्राह्मीके फलको जलके साथ पीसकर और रगड़कर लेप करनेसे रक्तदोष शान्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

हे शंकर! सहिजनका बीज, अलसी और सफेद सरसोंको अम्लरहित मट्ठेमें पीसकर उसका लेप ग्रन्थिक रोगपर लगानेसे वह रोग निश्चित ही नष्ट हो जाता है। श्वेत अपराजिताकी जड़ चावलकी धोवनमें पीसकर उसका नस्य लेनेसे भूत भाग जाते हैं।

हे शिव! काली मिर्चके साथ अगस्त्य - पुष्पके रसका नस्य शूल रोगका विनाशक है। साँपकी केंचुल, हींग, नीमकी पत्ती, यव तथा सफेद सरसों लेकर इनका लेप करनेसे भूत - प्रेतकी बाधा दूर हो जाती है। हे शिव! गोरोचन, मरिच, पिप्पली, सेंधा नमक और मधु - इन सभीका अंजन बनाकर आँखमें आँजनेसे प्रेतबाधा दूर हो जाती है। गुग्गुलकी धूप ग्रह - बाधाका नाशक है। काले वस्त्रको ओढ़नेसे चौथिया ज्वर दूर हो जाता है।