गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
149 - कास (खाँसी) - निदान
धन्वन्तरिजीने कहा - कास (खाँसी) - रोग यथाशीघ्र प्राणीपर अपना कुप्रभाव दिखाता है, इसलिये उसी रोगको अब कहा जायगा।
खाँसी वातज, पित्तज, कफज, क्षतज तथा धातु - क्षयज होनेसे पाँच प्रकारकी मानी गयी है। यदि इन पाँचोंके विनाशकी उपेक्षा कर दी जाती है तो ये क्षयको उत्पन्न कर देती हैं, यह उत्तरोत्तर बलवान् हो जाती हैं। इसका भावी रूप इस प्रकार होता है-
कासरोग होनेपर कण्ठमें खुजलाहट और अरुचि होती है। कान, मुख तथा कण्ठमें शुष्कता आ जाती है। शरीरमें वायु प्रायः अधोगामी होता है। इस रोगमें ऊर्ध्वगामी होकर वक्ष:स्थलमें जा पहुँचता है, वहाँ अभिघात करते हुए वायु कण्ठमें रोगकी सृष्टि करता हुआ मस्तिष्क तथा रक्तवाही आदि शरीरके तेरहों स्रोतोंमें जाता है। तदनन्तर सभी अङ्ग- प्रत्यङ्गोमें प्रविष्ट होकर आक्षेप एवं उनको कष्ट पहुँचाता है।
इसका प्रकोप होते ही नेत्रोंमें उत्क्षेप करता हुआ और पीठ तथा हृदय एवं पार्श्वोंमें पीड़ा उत्पन्न करता हुआ मुखसे निकलता है। बोलनेमें (अ०हृ०नि०अ0 3।21, सु०उ0 52।) भी रोगीको कष्ट होता है, फूटे हुए काँसेकी ध्वनिके समान मुखसे वाणी निकलती है, हृदयके पार्श्वभाग तथा शिरोभागमें पीड़ा उठती है, मोह और क्षोभ होता है एवं स्वरभंग हो जाता है। यह रोगीको अत्यन्त तेज पीड़ाके साथ सूखी खाँसी खाँसनेके लिये विवश कर देता है। रोगीको रोमाञ्च हो जाता है। खाँसनेपर बड़ी ही कठिनतासे अंदरसे सूखा हुआ कफ बाहर निकलता है, जिससे खाँसी कुछ कम हो जाती है।
पित्तजन्य(अ०हृ0 नि०अ0 3, 24-25 ; सु०उ0 52।) कास होनेसे नेत्र पीले पड़ जाते हैं, मुखमें तीतापन रहता है, ज्वर और भ्रम होता है, रोगी पित्त तथा रक्तसंश्रित वमन करता है, उसे प्यास लगती है, कण्ठसे निकलनेवाली ध्वनि टूटी रहती है, उसको सब ओर धुआँ - ही - धुआँ दिखायी देता है और धूमायित एवं खट्टी डकार आती है तथा उसमें एक प्रकारका मद छाया रहता है। जब रोगीको खाँसीका वेग आता है तो उसी खाँसीके बीच आँखोंके सामने चमकता हुआ छोटा - छोटा प्रकाशपुञ्ज दिखायी देता है।
कफजन्य कासरोग होनेपर वक्ष:स्थलमें सामान्य वेदना होती है, सिरमें भारीपन तथा हृदयमें जकड़न आ जाती है। कण्ठमें किसी द्रव्य पदार्थके लेपका अनुभव होता है। एक प्रकारका मद - जैसा शरीरपर छाया रहता है तथा पीनस, वमन, अरुचि, रोमाञ्च और घने स्निग्ध कफकी प्रवृत्ति होती है।
युद्धादि अत्यन्त साहसिक विभिन्न कर्मोंको करनेवाले लोगोंद्वारा जब शक्तिसे अधिक कर्म किया जाता है तो उससे वक्ष:स्थलमें क्षत हो जाता है। पित्तसें अनुगमित होकर वायु बलवान् हो जाता है। तदनन्तर उसके कारण रोगीको खाँसी आने लगती है, जिसके द्वारा मुखसे रक्तसंश्रित कफ अधिक निकलता है। प्रायः यह कफ पीला, पिंगल, शुष्क, ग्रथित (लोथड़ेकी भाँति) और अत्यन्त दूषित होता है।
इस रोगमें रोगी रुग्ण - कण्ठसे कफरूपी मलको बाहर निकालता है, वायुदोषफे कारण हृदय फटा - सा प्रतीत होता है और शरीरमें सुइयोंके चुभने - जैसे कष्टकी अनुभूति होती है तथा कष्टकारी शूलके आघातसे मर्मस्थलमें पीड़ा होती है, रोगीके पर्व - पर्वमें दर्द होता है और ज्वर भी रहता है। उसकी साँस फूलती है। प्यास बढ़ जाती है। उसकी वाणीमें स्वर - भंग होने लगता है तथा शरीरमें कम्पन रहता है।
रोगी (अ०हृ०नि०अ0 3, सु०उ0 52।) इस रोगमें कबूतरके समान कहरने लगता है। उसके पार्श्वभागमें शूल उठने लगता है।
कफादि विकारोंके कारण उसको वमन होता है। उसकी शक्ति क्षीण होने लगती है और शरीरका वर्ण कान्तिहीन हो जाता है।
राजयक्ष्मारोग होनेसे रोगीका शरीर क्षीण होने लगता है। उसके पेशाबमें रक्त आता है। साँस फूलनेसे पीठ और कमरमें पीड़ा होती है। जिनको शास्त्रमें आयु कहा गया है, वे आयुरूपी धातुएँ शरीरमें प्रकुपित होकर दौड़ने लगती हैं। यक्ष्मासे पीड़ित रोगी घरको खाँसी और खखारसे भर देता है। वह खखार (पीब) - के समान दुर्गन्धयुक्त तथा हरे और लाल रंगका होता है। ऐसे रोगीको सोनेमें विशेष कष्ट होता है अर्थात् सुप्तावस्थामें भी रोगीको कष्ट होता रहता है। यह रोग रोगीके हृदयको गिरते हुएके समान कष्ट देता है। अचानक रोगीमें उष्ण और शीतल भोजन एवं पेय - पदार्थ ग्रहण करनेकी इच्छा होने लगती है। वह बहुत खाता है। उसका बल क्षीण होने लगता है। मुखपर स्निग्धता बनी रहती है। उसके नेत्र भी शोभा - सम्पन्न रहते हैं, किंतु रोगके बलवान् होनेके बाद सभी विनाशकारी राजयक्ष्माके लक्षण रोगीके शरीरमें जन्म लेते हैं।
क्षयजन्य (अ०हृ०नि०अ0 3, 36-37, सु०उ0 52।) कासका रूप ऐसा ही है। इस रोगसे क्षीण हुए शरीरवाले रोगियोंकी मृत्यु निश्चित ही हो जाती है अथवा रोगियोंके बलवान् होनेपर यह रोग याप्य - साध्य रहता है। क्षतजन्य कासरोग भी उसी प्रकारका होता है। कास जब रोगीपर अपना प्रथम कुप्रभाव दिखाना प्रारम्भ करे, उसी कालमें इसकी चिकित्सा अपेक्षित है।
रोगीमें (अ०हृ०नि0 3 , च०चि०अ०18 , सु०उ0 52।) उपचारका सामर्थ्य होनेपर यह रोग साध्य भी है। अतः रोगीको यथासामर्थ्य इस रोगका उपशमन अवश्य करना चाहिये, किंतु उपचार प्रारम्भ करनेके पूर्व उसके वात आदि सभी प्रकारोंपर विचार करके ही पृथक् - पृथक् रूपसे प्रयोज्य औषधि तथा पशथ्यापथ्य आहार ग्रहण करना हितकर होता है। वृद्ध प्राणीके शरीरमें जो मिश्रित भावसे वातजादि कासरोग होते हैं, वह याप्य है। उनकी उपेक्षा करनेसे खाँसी, श्वास, क्षय, वमन तथा स्वरभंगादिक प्रतिश्यायका प्रकोप होता है। इसकी उपेक्षा करनेसे कासरोग असाध्य हो जाता है। इसलिये शीघ्र ही इसका उपचार कर लेना चाहिये।