गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
204 - औषधियोंके पर्यायवाची नाम
सूतजीने कहा - हे ऋषियो! भगवान् धन्वन्तरिने इस प्रकार महर्षि सुश्रुतको वैद्यकशास्त्र सुनाया था। अब मैं औषधियोंके पर्यायवाची नाम संक्षिप्त रूपमें आप सभीको सुनाऊँगा। स्थिरा - विदारीगन्धा, शालपर्णी तथा अंशुमती एक ही औषधिके नाम हैं। लाङ्गलि नामक औषधि ही कलसी, क्रोष्ट्रापुच्छा तथा गुहा नामसे कही जाती है। पुनर्नवाको वर्षाभू, कठिल्या और करुणा कहा जाता है। उरुवूक, आम तथा वर्द्धमानक - ये एरण्डके नाम हैं। झषा और नागबलाको एक ही औषधि मानना चाहिये। गोक्षुर अर्थात् गोखरूको श्वदंष्ट्रा कहा गया है। शतावरी नामक औषधि वरा, भीरु, पीवरी, इन्दीवरी तथा वरीके नामसे प्रसिद्ध है।
व्याघ्री, कृष्णा, हंसपादी और मधुस्रवा वृहती नामक औषधिके पर्याय हैं । कण्टकारी या कटेरीको क्षुद्रा, सिंही तथा निदिग्धिका कहा जाता है। वृश्चिका, त्र्यमृता, काली और विषघ्नी सर्पदन्ता नामक औषधिके नाम हैं। मर्कटी, आत्मगुप्ता, आर्षेयी तथा कपिकच्छुका - ये शब्द एक ही अर्थके वाचक हैं। मुद्गपर्णी और क्षुद्रसहा मूँगके तथा माषपर्णी एवं महासहा उड़दके पर्याय हैं। दण्डयोन्यङ्क (दण्डिनी) - को त्यजा, परा और महा नामसे स्वीकार किया गया है।
न्यग्रोध और वट बरगदका तथा अश्वत्थ और कपिल पीपलका वाचक है। प्लक्षको गर्दभाण्ड,पर्कटी तथा कपीतन कहा जाता है। अर्जुन वृक्षका नाम पार्थ, ककुभ और धन्वी है। नन्दीवृक्षको प्ररोही तथा पुष्टिकारी कहते हैं। वंजुल और वेतस एक ही औषधिके वाचक हैं। भललातक तथा अरूष्कर भिलावाको कहा जाता है। लोध्र सारवक, धृष्ट और तिरीट नामसे अभिहित है तथा बृहत्फला, महाजम्बु और बालफला एक अर्थके वाचक हैं। जलजम्बु नादेयीका नाम है।
कणा, कृष्णा, उपकुंची, शौण्डी और मागधिका - ये नाम पिप्पलीके हैं। उसके जाननेवाले लोग उस औषधिकी मूलको ग्रन्थिक कहते हैं। ऊषण नामक औषधिको मरिच तथा विश्वा नामक महौषधिको शुण्ठी या सोंठ कहा जाता है। व्योष, कटत्रय तथा त्र्यूषण इसी औषधिका नाम है। लांगलीको हलिनी और शेयसीको गजपिप्पली कहते हैं। त्रायन्तीका त्रायमाणा तथा उत्साका नाम सुवहा है।
चित्रकका नाम शिखी है। इसको वह्नि तथा अग्नि नामसे भी कहा जाता है। षड्ग्रन्था, उग्रा, श्वेता और हैमवती-ये नाम वचाके हैं। कुटजको शक्र, वत्सक तथा गिरिमल्लिका कहा जाता है। उसके बीजोंका नाम कलिङ्ग, इन्द्रयव और अरिष्ट है। मुस्तक और मेघ नाम मोथाके वाचक हैं। कौन्ती नामक औषधि हरेणुका नामसे कही जाती है। एला और बहुला शब्द बड़ी इलायची तथा सूक्ष्मैला एवं त्रुटि शब्द छोटी इलायचीके वाचक हैं। भार्ङ्गीका नाम पद्मा तथा काँजीका नाम ब्राह्मणयष्टिका है। मूर्वा नामक औषधि मधुरसा और त्तेजनीका नाम तिक्तवल्लिका है। महानिम्बको बृहन्निम्ब तथा दीप्यकको यवानिका (अजवाइन) कहा जाता है। विडङ्गका नाम क्रिमिशत्रु है। हिंगु अर्थात् हींगको रामठ भी कहते हैं। अजाजी जीरक अर्थात् जीरेका पर्यायवाची शब्द है। उपकुंचिकाको कारवी कहा जाता है। कटुला, तिक्ता तथा कटुरोहिणी - ये तीन कठुकी नामक औषधिके वाचक हैं। तगरका नाम नत और वक्र है। चोच, त्वच तथा वराङ्गक, दारुचीनी नामक औषधि कहलाती है। उदीच्यको बालक (मोथा) तथा हीबेरको अम्बुबालकके नामसे अभिहित किया गया है। पत्रक और दल नाम तेजपत्ताके हैं। आरकको तस्कर कहा जाता है। हेमाभ नामक औषधिका नाम नाग भी है। इसलिये इसको लोग नागकेशर कहते हैं। असृक् तथा काश्मीर बाह्लीक शब्द कुंकुमके वाचक हैं।
पुर, कुटनट, महिषाक्ष तथा पलङ्कषा शब्दगुग्गुलके वाचक हैं। काश्मीरी और कट्फला श्रीपर्णीको कहा जाता है। शल्लकी, गजभक्ष्या, पत्री, सुरभी तथा श्रवा नाम गजारी औषधिके हैं। आंवलाको धात्री और आमलकी तथा अक्ष एवं विभीतक बहेड़ाको कहा जाता है। पथ्या, अभया, पूतना और हरीतकी शब्द हर्रैके पर्यायवाची हैं। इन तीनों फलोंको एकमें मिलाकर त्रिफला कहा जाता है। करंज या कंजा उदकीर्य्य तथा दीर्घवृत्तके नामसे भी प्रसिद्ध हैं। यष्टी, यष्ट्याह्वय, मधुक और मधुयष्टी - ये जेठी मधुके वाचक हैं। धातकी, ताम्रपर्णी, समङ्गा तथा कुंजरा धातीफूलके नाम माने गये हैं। सित, मलयज, शीत और गोशीर्षको श्वेतचन्दन कहा जाता है। जो चन्दन रक्तके सदृश लाल होता है उसका नाम रक्तचन्दन है। काकोली नामकी औषधिको वीरा, वयस्या और अर्कपुष्पिकाके नामसे भी कहा जाता है। श्रृंगी नामक औषधि कर्कटश्रूंगी तथा महाघोषाके नामसे प्रसिद्ध है। वंशलोचनको तुगाक्षीरी, शुभा और वांशीके नामसे भी जाना जाता है। द्राक्षाका नाम मृद्वीका तथा गोस्तनिका है।
उशीर अर्थात् खस नामक औषधिका नाम मृणाल और लामज्जक है। सारको गोपवल्ली, गोपी और भद्रा कहा जाता है। दन्ती नामक औषधिका नाम कटङ्कटेरी भी है। हल्दीको दारु, निशा, हरिद्रा, रजनी, पीतिका और रात्रि कहा गया है। वृक्षादनी, छिन्नरुहा, नीलवल्ली तथा अमृतरसा नामवाली औषधि ही गुडूची है। वसुकोट, वाशिर और काम्पिल्ल नामक औषधि एक ही हैं। पाषाणभेदक, अरिष्ट, अश्मभित् तथा कुट्टभेदक - ये सभी नाम पथरचट्टा या पत्थरचूनाके वाचक हैं। घण्टाकको शुष्कक और सूचकको वचा (वच) नामसे अभिहित किया गया है। पीतशालको सुरस तथा बीजक नामसे कहा जाता है। वज्रवृक्षको महावृक्ष, स्नुहीको खुक् (थूहड़) और सुधाको गुडा माना गया है। तुलसीको सुरसा तथा उपस्था कहा जाता है। लोग इसीको कुठेरक, अर्जुनक, पर्णी और सौगन्धिपर्णी भी कहते हैं। नील नामक औषधि सिन्धुवार है और निर्गुण्डीको सुगन्धिका कहा जाता है। सुगन्धिपर्णी नामकी औषधि वासन्ती और कुलजा नामसे जानी जाती है। कालीयक नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं - पीतकाष्ठ तथा कतक गायत्री नामकी औषधिका नाम खादिर है। कन्दर अर्थात् कत्था उसीका भेद माना गया है। नीलकमलके वाचक इन्दीवर, कुवलय, पद्म तथा नीलोत्पल माने गये हैं। सौगन्धिक, शतदल और अब्ज कमलको कहा जाता है। अजवर्ण, ऊर्ज, वाजिकर्ण तथा अश्वकर्ण एक ही औषधिके नाम हैं। श्लेष्मान्तक, शेलु और बहुवार एक ही अर्थके वाचक हैं।
सुनन्दक, ककुद्भद्र, छत्राकी तथा छत्र रास्त्रा नामकी औषधिके वाचक हैं। कबरी, कुम्भक,धृष्ट, क्षुद्धा और धनकृत् एक ही औषधिके नाम हैं। कृष्णा्जक तथा कराल नामक औषधि कालमान या काममान नामसे प्रसिद्ध हैं। वरियारा नामकऔषधिको प्राची, बला और नदीक्रान्ता कहा जाता है। काकजंघा नामकी औषधिका पर्यायवाची शब्द वायसी है। मूषिकपर्णी नामक औषधि भ्रमन्ती और आखुपर्णीके नामसे जानी जाती है। विषमुष्टि, द्रावण और केशमुष्टि - ये तीनों एक ही औषधिके वाचक हैं। किंलिही या किणिहीको कटुकी तथा अन्तकको अम्लवेतस कहा जाता है। अश्वत्था और बहुपत्रा एक ही औषधि है, इसीको लोग आमलकी भी कहते हैं। अरूषक्रका नाम पत्रशूक है। क्षीरीको राजादन नामसे स्वीकार किया गया है। महापत्रका नाम दाडिम है, इसीको करक भी कहा जाता है। मसूरी, विदली, शष्पा तथा कालिन्दी नाम एक ही अर्थके वाचक हैं।
कटेरी वृक्षको कण्टका, महाश्यामा और वृक्षपादा कहा जाता है। विद्या, कुन्ती, त्रिभंगी, त्रिपुटी और त्रिवृत् - ये सभी शब्द एक औषधिके वाचक हैं। सप्तला, यवतिक्ता, चर्मा और चर्मकसा - ये सभी नाम समान औषधिके माने गये हैं। अक्षिपीलुको शंखिनी, सुकुमारी और ततिक्ताक्षी कहा जाता है। अपराजिता नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं गवाक्षी, अमृता, श्वेता, गिरिकर्णी तथा गवादिनी। काम्पिल्लको रक्ताङ्ग, गुण्डा और रोचनिका कहा जाता है। हेमक्षीरी या स्वर्णक्षीरी नामकी औषधिको पीता, गौरी तथा कालदुग्धिका नामसे स्वीकार किया गया है। गाङ्गेरुकी, नागबला, विशाला और इन्द्रवारुणी अर्थात् इन्द्रायण एक ही औषधिके वाचक हैं। रसांजन नामक औषधिके पर्याय हैं ताक्ष्य, शैल, नीलवर्ण तथा अंजन। शाल्मली या सेमरवृक्षके निर्यासको मोचरसके (सेमलके गोंदकों मोचरस कहते हैं।) नामसे अभिहित किया जाता है। प्रत्यक्पुष्पीको खरी और अपामार्गको मयूरक कहा गया है। जंगली अड़ूसाका नाम है सिंहास्य वृषवासाक तथा आटरूष। जीवशाक नामक औषधिको जीवक और कर्बुरको शटी नामसे भी कहा गया है। कट्फलका नाम सोमवृक्ष तथा अग्निगन्धाका नाम सुगन्धिका भी है। सौंफको शताङ्ग और शतपुष्पा कहा जाता है। मिसिको मधुरिका माना गया है। पुष्कस्मूलको पुष्कर तथा पुष्कराह्वय नामसे भी स्वीकार करना चाहिये। यास नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं धन्वयास, दुष्पर्श और दुरालभा। वाकुची अर्थात् वकुची, सोमराजी और सोमवल्ली एक ही औषधिके नाम हैं। भँगरइयाको मार्कव, केशराज तथा भृंगराज कहा जाता है।
एडगज नामक औषधिको आयुर्वेद एवं वनस्पतियोंके विद्वान् चक्रमर्दक या चकवड़ कहते हैं। काकतुण्डी नामक औषधिके वाचक हैं सुरंगी, तगर, स्नायु, कलनाशा और वायसी। महाकालको बेल तथा तण्डुलीयको घनस्तन कहा जाता है। इक्ष्वाकुको तिक्ततुम्बी और तिक्तालापु कहा जाता है। धामार्गवको कोषातकी तथा यामिनी कहा जाता है। कृतभेद नामक इस कोषातकी औषधिका एक अन्य भेद है। देवताडक नामक वृक्षके पर्याय हैं जीमूतक तथा खुड्डाक। गृध्रादना, गृध्रनखी, हिङ्गु और काकादनी शब्द हींगके वाचक माने जाते हैं। करवीर (कनेर) - का पर्यायवाची शब्द है अश्वारि तथा अश्वमारक।
सेंधानमकको सिन्धु, सैन्धव, सिन्धूत्थ तथा मणिमन्थ कहा जाता है। यवक्षार लवणका नाम है क्षार और यवाग्रज। सज्जी या छज्जी मिट्टीका नाम है सर्जिका एवं सर्जिकाक्षार। काशीशके नाम हैं पुष्पकाशीश, नेत्रभेषज, धातुकाशीश और काशी। यह पुष्प एवं धातुभेदसे दो प्रकारका है। पङ्कपर्पटी (गुजराती मिट्टी ) - को सौराष्ट्री, मृत्तिकाक्षार तथा काक्षी कहा जाता है। स्वर्णमाक्षिका नामक मिट्टीके पर्याय हैं माक्षिक, ताप्य, ताप्युत्थ और ताप्यसम्भवा। मन:शिला या मैनसिलका नाम है शिला। नेपाली मन:शिलाको कुलटी कहा जाता है। हरितालके लिये आल अथवा मनस्ताल नाम प्रयुक्त होता है। गन्धक, गन्धपाषाण तथा रस पारद या पारा कहलाता है। ताँबेके वाचक हैं ताम्र, औदुम्बर, शुल्ब और म्लेच्छमुख। लोहेको अद्विसार, अयस्, लोहक तथा तीक्ष्ण भी कहा जाता है।
मधु शब्दके पर्यायवाची हैं माक्षिक, मधु, क्षौद्र और पुष्परस। इसके दो उपभेद हैं - ज्येष्ठी मधु तथा उदकी मधु। काँजीको सुवीरक नामसे अभिहित किया गया है। शर्कराको सिता, सितोपला और मत्स्याण्डीके नामसे कहा जाता है।
त्रिसुगन्धि नामक औषधिका निर्माण दारुचीनी नामक वृक्षकी छाल, इलायची तथा तेजपत्ताको समान मात्रामें मिलानेपर होता है, इसे त्रिजातक कहा जाता है, उसमें नागकेशरका मिश्रण कर देनेपर वह चतुर्जातक कहलाता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और नागरके मिश्रित स्वरूपको पञ्चकोल और कोल कहा जाता है। प्रियंगुको कंगुका (काकुन) तथा कोद्रव या कोदोको कोरदूषके नामसे जानना चाहिये। त्रिपुटका नाम पुट है और कलापका लड्गक नाम स्वीकार किया गया है। वेणु अर्थात् बाँसको सतीन तथा वर्तुल भी कहा जाता है।
पिचुक, पित्तल, अक्ष और विडालपदक शब्द तौल - परिमाणमें एक कर्ष (सोलह मासा) - के वाचक हैं। सुवर्ण तथा कवलग्रहका बराबर मान है। पलार्ध अर्थात् आधा पल, एक शुकित तथा आठ माषक भारमें समान है। पल, बिल्व और मुद्ठीका परिमाण समान होता है। दो पलकी मात्राको प्रसृति अर्थात् एक पसर कहा गया है। अंजलि और कुडवका मान चार पलके बराबर होता है। आठ पलको अष्टमान कहा जाता है, उसे मान भी कहा गया है। चार कुडवका एक प्रस्थ (एक सेर) और चार प्रस्थका एक आढ़क अर्थात् एक अढ़ैया होता है। इसीको एक काशपात्र कहा गया है। चार आढ़कका एक द्रोण होता है। एक सौ पलका एक तुला और बीस पलका एक भाग माना गया है। विद्वानोंने प्रस्थ आदिकी मात्रामें प्राप्त होनेवाले द्रव्योंका मान तो इस प्रकारसे कहा है, किंतु द्रव - पदार्थोंकी मात्राको उसका दुगुना स्वीकार किया गया है।
भद्रदारु, देवकाष्ठ तथा दारु देवदारुक वाचक हैं। कुष्ठको आमय और मांसीको नलदंश कहा गया है। शंख नामक औषधिका नाम शुक्तिनख है तथा व्याप्र नामकी औषधि व्याघ्रनखी या व्याघ्रनख शब्दसे कही गयी है। गुग्गुल नामकी औषधिके वाचक पुर, पलङ्कष तथा महिषाक्ष शब्द हैं। रस गन्ध - रसका पर्यायवाची है, इसीको बोल भी कहा जाता है। सर्ज अर्थात् राल सर्जरसका बोधक है। प्रियङ्ग्ु फलिनी, श्यामा, गौरी और कान्ता - इन नामोंसे अभिहित किया जाता है। करंज या कंजेका नाम नक्तमाल, पूतिक तथा चिरबिल्वक है। शिग्रु शोभाञ्जन तथा रोनमान नामसे प्रसिद्ध है। इसे सहिजन भी कहा जाता है। सिन्धुवार नामक औषधिके वाचक हैं - जया, जयन्ती, शरणी और निर्गुण्डी। मोरटा नामक औषधि पीलुपर्णी (मूर्वा) है तथा तुण्डीका नाम तुण्डिकेरी है।
मदन - वृक्षको गालव बोधा, घोटा और घोटी कहा जाता है। चतुसड्गुल नामक औषधि सम्पाक तथा व्याधिघातक नामसे भी प्रसिद्ध है। आरग्वधका नाम राजवृक्ष और रैवत है। दन्तीको लोग काकेन्दु, तिक्ता, कण्टकी और विकङ्कत कहते हैं। निम्बको अरिषप्ट कहा गया है तथा पटोलका एक नाम कोलक (परवल) है। वयस्थाका नाम विशल्या, छिन्ना और छिन्नरुहा है। गुडूचीके पर्यायवाची हैं - वशा, दन्ती तथा अमृता। किराततिक्तका नाम भूनिम्ब और काण्डतिक्त है।
सूतजीने कहा - हे शौनक! ये सभी नाम वनमें उत्पन्न होनेवाली औषधियोंके हैं। इन्हीं वनस्पतियोंका वर्णन भगवान् श्रीहरिने शिवजीसे किया था। अब मैं कुमार अर्थात् भगवान् स्कन्दके द्वारा कहे गये व्याकरणशास्त्रको बतलाऊँगा, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनें।