235 - ब्रह्मज्ञान निरूपण तथा षडङ्गयोग

सूतजीने कहा - [हे शौनक!] अब मैं वेदान्त और सांख्यसिद्धान्तके अनुसार ब्रह्मज्ञानका वर्णन करता हूँ।

‘मैं ही ज्योतिर्मय परब्रह्मस्वरूप विष्णु हूँ’ - ऐसा चिन्तन करते हुए ‘सूर्य, हृदयाकाश और वन्हिमें एक ही ज्योति तीन रूपमें स्थित है’, ऐसा निश्चय करना चाहिये। जैसे गायोंके शरीरमें घृत रहनेपर भी घृत गायको बल प्रदान नहीं करता, परंतु उसी घृतको निकालकर विधिके अनुसार गायोंके निमित्त प्रयोग करनेपर वह घृत महाबलप्रद हो जाता है, वैसे ही विष्णु सभी जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहनेपर भी बिना आराधनाके कल्याणकारी नहीं हो सकते। जो योगरूप वृक्षपर चढ़नेके इच्छुक हैं, उनके लिये कर्मज्ञान आवश्यक है, किंतु जो योगरूपी वृक्षपर आरूढ़ हो चुके हैं, उनके लिये त्याग (वैराग्य) एवं ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है। जो शब्दादि विषयोंको जाननेकी इच्छा करता है, उसमें राग - द्वेषादि प्रादुर्भूत हो जाते हैं, इसी कारण मनुष्य लोभ - मोह तथा क्रोधके वशीभूत होकर पापाचार करता है।

जिसके हाथ, उपस्थ, ( मूत्रेन्द्रिय।) उदर और वाक्य - ये चार सुसंयत रहते हैं, वही बुद्धिमानोंके द्वारा विप्र कहा जाता है। जो दूसरेके द्रव्यको ग्रहण नहीं करते, हिंसा नहीं करते, जुएमें अनुरक्त नहीं रहते, वास्तवमें उन्हींके दोनों हाथ सुसंयत रहते हैं। जो दूसरेकी स्त्रीके प्रति कामका भाव नहीं रखता, उसीकी उपस्थेन्द्रिय सुसंयत है। जो लोभरहित होकर परिमित भोजन करते हैं, उन्हींके उदरको संयत कहा जाता है। जो हित - परिमित और सत्य वाक्य बोलता है, उसीकी वाणी संयत कही जाती है।

जिसके हाथ आदि संयत रहते हैं, उसके लिये तपस्या या यज्ञादिका कोई प्रयोजन नहीं है अर्थात्‌ तपस्या, यज्ञ आदि तभी सफल होते हैं, जब हाथ, उपस्थ, उदर एवं वाक्य संयत हों।

मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका आत्यन्तिक ऐक्य अर्थात्‌ सदा ध्येयतत्त्वमें लगा रहना ध्यान कहलाता है। वह ध्यान दो प्रकारका होता है - सबीज ( अविद्या आदि क्लेश ही बीज हैं। इनका अनुभव होते रहनेपर सबीज ध्यान कहा जाता है। ) तथा निर्बीज।

( क्लेशरूप बीजका अनुभव न हो तो निर्बीज ध्यान कहा जाता है।) चिन्तनकी मूल आधार - शक्ति ‘बुद्धि’ भौहोंके मध्यमें रहती है। इसे यदि जीव विषयोंमें लगाये रहता है तो यही जाग्रत् -अवस्था होती है। जब जीवकी इन्द्रियाँ शान्‍त हों, केवल मन चञ्चल हो और इसी कारण बाहरी एवं भीतरी विषयोंको केवल स्वप्रमें जीव देखता रहे तो यही स्वप्रावस्था है। जब मन हृदयमें स्थित हो तथा तमोगुणसे मोहित होनेके कारण कुछ भी स्मरण न कर सके, तब सुषुप्ति - अवस्था समझनी चाहिये।

जो जितेन्द्रिय होता है उसको जाग्रत्‌ - अवस्थामें तन्द्रा, मोह और भ्रम नहीं उत्पन्न होते। वह शब्दार्थादि विषयोंमें आसक्त नहीं होता।

ज्ञानी इन्द्रियों और मनको विषयोंसे खींचकर बुद्धिके द्वारा अहंकारको एवं प्रकृतिके द्वारा बुद्धिको संयत कर और चित् -शक्तिके द्वारा प्रकृतिको भी संयत कर केवल आत्मरूपमें अवस्थित रहता है। इस स्थितिमें ज्ञानी मनसे स्वप्रकाश आत्मा (परमात्मा) - को देख सकता है। आत्मा स्वप्रकाश है, ज्ञेय है, ज्ञाता है और ज्ञानाधिकरण है। चिद्रूप अमृत शुद्ध निष्क्रिय सर्वव्यापी शिवप्रद आत्माको जानकर मनुष्य तुरीय (परम शान्त, शिवस्वरूप अद्दैतावस्था।) - अवस्थामें आ जाता है, इसमें संशय नहीं है।

जीवका अन्तिम लक्ष्य मुक्ति है। यह मुक्ति जीवको तभी प्राप्त होती है, जब वह पुर्यष्टक एवं त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका परित्याग कर देता है। यह पुर्यष्टक एक ‘कमल’ के रूपमें माना गया है। संसारावस्थामें जीव इसी कमलरूपी पुर्यष्टक की कर्णिकामें स्थित रहता है। तीनों गुणों (सत्त्व, रज एवं तम) - की साम्यावस्थारूप प्रकृति ही पुर्यष्टकरूपी कमलकी कर्णिका है। इस पुर्यष्टकरूप कमलके आठ पत्र (दल) हैं। ये हैं - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सत्व, रज तथा तम। इस प्रतीकात्मक वर्णनका निष्कर्ष यह है कि जीवको मुक्ति प्राप्त करनेके लिये प्रकृतिसे स्वयंको अलग करना अनिवार्य है इस हेतु शब्द आदि विषयोंके प्रति अनासक्त होना होगा।

प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, समाधि और ध्यान-ये छ: योगके साधन हैं।

इन्द्रियसंयमसे पापक्षय और पापक्षयसे देवप्रीति सुलभ होती है। देवप्रीति मुक्ति एवं मुक्तिसाधनकी ओर उन्मुख होनेके लिये भी प्रथम एवं अनिवार्य साधन है। योगका मुख्यतम साधन है प्राणायाम। यह दो प्रकारका है - गर्भ और अगर्भ। जप एवं ध्यानयुक्त जो प्राणायाम है, वही गर्भ प्राणायाम है और इससे अतिरिक्त होनेपर अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। जो प्राणायाम छत्तीस मात्रासे युक्त रहता है वही श्रेष्ठ है, जो चौबीस मात्रासे युक्त रहता है वह मध्यम है और जो प्राणायाम बारह (मात्राका विवेक योगसूत्रसे प्राणायामकी प्रक्रिया समझनेमें स्पष्ट होगा।) मात्रासे युक्त रहता है वह निम्न है। सदा ॐ कारका जप कर प्राणायाम करे। ॐ कार परब्रह्मका वाचक है। इस ब्रह्मवाचक ॐ कारका परिज्ञान होनेपर वाच्य ब्रह्म प्रसन्न हो जाता है।

‘ॐ नमो विष्णवे ‘ - इस षडक्षर और द्वादशाक्षर गायत्रीका जप करना चाहिये। सभी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सांसारिक विषयोंकी ओर रहती है। मनके द्वारा इन प्रवृत्तियोंकी निवृत्तिको ही प्रत्याहार कहा गया है। इन्द्रियोंको अपने विषयोंसे समाहरण कर मनको बुद्धिके साथ प्रत्याहारमें स्थित रखते हुए बारह बार प्राणायाम करनेमें जितना समय लगता है, उतने समयतक ब्रह्ममें मनको निविष्ट करना ही द्वादशधारणात्मक ध्यान है - ऐसा ब्रह्माने कहा है। नियतरूपसे ब्रह्माकारवृत्तिमें जो संतुष्टिका अनुभव होता है, उसीको समाधि कहा जाता है। ध्यान करते - करते यदि मन चञ्चल नहीं होता है, सदा ध्यानमें ही प्रवृत्ति रहती है अर्थात्‌ अभीष्ट प्राप्तितक ध्यानसे निवृत्ति नहीं होती तो इसीका नाम धारणा है। मन यदि ध्येयतत्त्वमें ही आसक्त रहता है अर्थात्‌ ध्येयतत्त्वका ही चिन्तन सदा होता रहता है, अन्य किसी भी पदार्थका भान नहीं होता तो इसीको ध्यान कहा जाता है।

ध्यानपरायण मुनिगण, ध्येय पदार्थका चिन्तन करते - करते जब मन उसी ध्येयमें निश्चल हो जाता है तो इसे ही परम ध्यान कहते हैं। ध्यान करते - करते जब सर्वत्र ध्येयपदार्थ ही दिखायी देने लगे,ध्याता भी ध्येयमय प्रतीत हो और किसी प्रकारका द्वैतज्ञान नहीं रहे तो इस अवस्थाको समाधि कहा जाता है। जिसका मन संकल्परहित होकर इन्द्रियोंके विषयचिन्तनसे विरत हो जाता है तथा ब्रह्ममें लीन हो जाता है, वही समाधिमें स्थित कहा जाता है।

जिस योगीका मन आत्मामें अवस्थित परमात्माका ध्यान करते - करते तन्‍मय हो जाता है, वह योगी समाधिस्थ कहा जाता है। चित्तकी अस्थिरता, भ्रान्ति, दौर्मनस्थ और प्रमाद - ये सभी योगियोंके दोष कहे गये हैं, ये योगमें विघ्नकारक हैं।

मनके स्थिर होनेके लिये प्रथम ध्येयके स्थूलस्वरूपका चिन्तन करें, इसके बाद मनके निश्चल होनेपर तेज: स्वरूप परमात्माके अनुरक्त होकर स्थिर हो जाना चाहिये। जगत्में परमात्माके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, वह परमात्मा ही विश्वरूप है - इस प्रकारका निश्चय कर परमात्मासे अतिरिक्त सभी पदार्थोंको असत्‌ मानकर उनका परित्याग कर देना चाहिये। हृदय - पद्ममें स्थित ॐकाररूपी व्यापक परमनब्रह्मका ध्यान करना चाहिये। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञसे रहित तीन मात्रासे युक्त ॐकारका जप करना चाहिये। प्रथम अपने हृदयमें ॐकारस्वरूप प्रधान पुरुषका ध्यान करे। इसके बाद उसके ऊपर कृष्णवर्ण, रक्तवर्ण तथा श्वेतवर्णवाले तमोगुण, रजोगुण और स्त्वगुणके तीन मण्डलोंका ध्यान कर उनमें जीवात्मा पुरुषका ध्यान करे। मण्डलके ऊपर ऐश्वर्य आदि आठ गुणोंसे युक्त अष्टदल कमलकी भावना की जाती है।

इस कमलकी कर्णिका ज्ञान है, केसर विज्ञान है, नाल वैराग्य है एवं इसका कन्द वैष्णव धर्म है। मुक्तिसाधक व्यक्ति इस हत्पद्मकी कर्णिकामें स्थित प्रणवरूप ब्रह्मका ध्यान, चेतन निश्चल तथा व्यापक रूपमें करे। इस ॐकारस्वरूप ब्रह्मका ध्यान ‘करते-करते यदि कोई प्राणोंका परित्याग कर देता है तो वह ब्रह्मसायुज्य प्राप्त करता है। योगी देहगत यद्मके मध्यमें हरिको बैठाकर भक्तिभावसे उनका ध्यान करे। कुछ लोग ध्यान - रूपी चक्षुसे - आत्मासे आत्मा (परमात्मा) - को देखते हैं। सांख्यदर्शन - वेत्तालोग प्रकृति - पुरुषके विवेकसे तथा योगवेत्ता योगके प्रभावसे आत्मदर्शन करते हैं। आत्मा ज्ञानरूप है। वास्तवमें ज्ञानका ही माहात्म्य है। ज्ञान ही ब्रह्मका प्रकाशक है और ज्ञान ही भवबन्धनको काटनेवाला है। इसीलिये ध्यान - साधनमें एकचित्तता ही प्रधान योग है। यही योग योगियोंको मुक्ति प्रदान करता है, इसमें संशय नहीं है। यह एकचित्तताका योग आत्मदर्शनमें ही पर्यवसित है।

जो इन्द्रियादिको जीत कर ज्ञानसे प्रदीप्त हो जाता है, परमात्मामें अवस्थित इसी योगीको मुक्त कहा जाता है। आसन, स्थान आदिकी विधियाँ योगकी साधक नहीं होतीं, प्रत्युत ये तो योगसिद्धिमें विलम्ब करनेवाली हैं। ये सब विधियाँ साधनके विस्तार मात्र हैं । शिशुपालने स्मरणाभ्यासके प्रभावसे सिद्धि - लाभ किया था। योगाभ्यास करनेवाले योगीजन आत्मासे आत्माको देखते हैं। योगीजन सभी प्राणियोंमें करुणाभाव, विषयोंके प्रति विद्वेष एवं शिशन और उदरकी परायणताका परित्याग करते हुए मुक्ति प्राप्त करते हैं। जब योगी मनुष्य इन्द्रियोंसे इन्द्रियोंके विषयका अनुभव नहीं करता, तब काष्ठकी भाँति सुख, दुःखके अनुभवसे अतीत होकर ब्रह्ममें लीन हो जाता है अर्थात्‌ मुक्त हो जाता है।

मेधावी साधक सभी प्रकारके वर्णभेद, सभी प्रकारके ऐश्वर्यभेद एवं सभी अशुभ तथा पापोंको ध्यानाग्निके द्वारा भस्मसात्‌ कर परमगतिको प्राप्त करता है। जैसे काष्ठसे काष्ठमें घर्षण करनेसे अग्निका दर्शन होता है, वैसे ही ध्यानसे परमात्मस्वरूप हरिंका दर्शन किया जा सकता है। जब ब्रह्म और परमात्मस्वरूप हरिका दर्शन किया जाता है, जब ब्रह्म और आत्माके एकत्वका ज्ञान होता है तभी योगका उत्कर्ष जानना चाहिये। किसी भी बाह्य उपायसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं हो सकती, मुक्तिकी प्राप्ति आभ्यन्तरिक यम - नियम आदि उपायोंके द्वारा ही होती है। सांख्यज्ञान, योगाभ्यास और वेदान्तादिके श्रवणसे जो आत्माका प्रत्यक्ष होता है, उसे मुक्ति कहा जाता है। मुक्ति होनेपर अनात्मामें आत्माका और असत्‌ - पदार्थमें सत्‌ - तत्त्वका दर्शन होता है।