गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
104 - कर्मविपाक - निरूपण
याज्ञवल्क्यजीने कहा - पापकर्मसे उत्पन्न होनेवाली नारकीय यातनाओंको भोगनेसे उस पापकर्मका क्षय होता है। शेष बचे हुए पापोंका शमन करनेंके निमित्त प्राणी पुनः विभिन्न योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है। यथा -
ब्रह्महन्ता नरकभोगके पश्चात् श्वान, गर्दभ और ऊँट - योनिमें उत्पन्न होता है। मदिरापायी व्यक्ति मेढक और जुआँ होता है। सुवर्णका चोर कृमि - कीट तथा गुरुतल्पगामी घास - फूसादिकी योनिमें जन्म लेता है। इन योनियोंमें पाप - शमन होनेके पश्चात् वे ब्रह्महत्यादिके पापी पुन: यथाक्रम क्षयरोगी, काले दाँतवाले, कुत्सित नखवाले तथा शिपिविष्टक (कुष्ठरोगी) होकर जन्म ग्रहण करते हैं अथवा ये सभी दोष उक्त प्राणियोंकी संततिमें प्रकट होते हैं।
अन्नकी चोरी करनेवाला रोगी, वचन देकर उसका पालन न कलेवाला गूँगा, धान्यका अपहरणकर्ता अधिक अंगोंवाला, चुगलखोर दुर्गन्धसे युक्त नाकवाला, तेलका चोर तैलपायी अर्थात् तिलचट्टा कीट, अविद्यमान दोषकी सूचना देनेवाला दुर्गन्धयुक्त मुखवाला होता है।
ब्राह्मणके धनका हरण करनेवाला तथा कन्याको खरीदनेवाला व्यक्ति वनमें राक्षस तथा बैल होता है। रत्नका अपहरणकर्ता हीनजाति और शाक - पातका चोर मयूर - योनिमें जन्म लेता है। पुष्पका चोर छछुन्दरी, धान्यापहारी मूषक, फलका चोर वानर, पशुओंका हरण करनेवाला बकरी तथा दूधहर्ता काकयोनिमें उत्पन्न होता है।
मांस, वस्त्र और नमककी चोरी करनेवाले मनुष्य यथाक्रम -गृध्र, श्वेतकुष्ठी तथा चीरी की योनि प्राप्त करते हैं। उस फलको भोगकर वे तिर्यक्योनिमें उत्पन्न होते हैं।
इस प्रकार भोग भोगनेके पश्चात् ये लक्षणभ्रष्ट पतितजन दूसरे जन्ममें दरिद्र या पुरुषाधम होते हैं। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंसे निष्कलुष होकर वे योगीके महान् कुलमें जन्म लेते हैं और सुलक्षणोंसे युक्त होते हुए वे धन - धान्यसे सम्पन्न हो जाते हैं।