गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
110 - नीतिसार
श्रीसूतजीने कहा - जो व्यक्ति सुनिश्चित अर्थका परित्याग कर अनिश्चित पदार्थोंका सेवन करता है, उसका सुनिश्चित अर्थ विनष्ट हो जाता है और अनिश्चित पदार्थ तो नष्ट होता ही है -
यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवाणि निषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति ह्यध्रुवं नष्टमेव च॥
वाग्वैभवसे रहित व्यक्तिकी विद्या और कायर पुरुषके हाथमें विद्यमान अस्त्र वैसे ही उन्हें संतुष्टि नहीं प्रदान करते, जैसे अपने अंधे पतिके साथ रहती हुई उसकी स्त्री अपने रूप - लावण्यसे पतिको संतृप्त नहीं कर पाती।
सुन्दर भोज्य पदार्थ भी उपलब्ध हो और भोजनकी शक्ति भी हो, रूपवती स्त्री भी हो और सहवास करनेकी क्षमता भी हो तथा धन - वैभव भी हो और दान करनेकी सामर्थ्य भी हो - ये अल्प तपके फल नहीं हैं।
वेदोंका फल अगिनहोत्र है, विद्याका फल शील और सदाचार है, स्त्रीका फल रति और पुत्रवान् होना है तथा धनका फल है दान और भोग।
विद्वान् व्यक्तिको श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न कुरूप कन्याके साथ भी विवाह कर लेना चाहिये, किंतु रूपवती एवं अच्छे लक्षणोंवाली उत्तम कुलसेहीन कन्या उसके लिये कभी भी ग्राह्य नहीं है। कन्या उसके लिये कभी भी ग्राह्य नहीं है।
मनुष्यको उस अर्थसे क्या लाभ है, जिस अर्थका साथ अनर्थसे होता है? क्योंकि कोई व्यक्ति सर्पके फणपर विद्यमान मणिको प्राप्त करना नहीं चाहता।
अग्निहोत्रके लिये हविष्यान्न दुष्ट कुलसे भी ग्राह्म है। बालकसे भी सुभाषित ग्रहण करना उचित है। अमेध्य अर्थात् अपवित्र स्थानसे स्वर्ण और हीन कुलसे स्त्रीरूपी रत्र भी मनुष्यके लिये संग्राह्य है। विषसे अमृत ग्राह्य है, अपवित्र स्थलसे भी स्वर्ण ग्राह्म है तथा नीच व्यक्तिसे श्रेष्ठ विद्या भी ग्रहण करने योग्य है और दुष्कुलसे भी स्त्री - रत्न ग्राह्य है।
राजाके साथ मित्रभाव और सर्पका विषहीन होना सम्भव नहीं है। वह कुल पवित्र नहीं रहता, जिस कुलमें स्त्रियाँ ही उत्पन्न होती हैं। अपने कुलके साथ भगवद्भक्तका सम्पर्क कर देना चाहिये, पुत्रको विद्याध्ययनमें लगाना चाहिये, शत्रुको व्यसनमें जोड़ देना चाहिये तथा जो अपने इष्टपुरुष हैं, उन्हें धर्ममें नियोजित करना चाहिये।
विद्वान् मनुष्यको नौकर और आभूषणोंको यथोचित स्थानपर नियुक्त करना चाहिये, क्योंकि चूड़ामणि कभी चरणमें सुशोभित नहीं होती है। चूड़ामणि, समुद्र, अग्नि, घण्टा, अखण्ड अम्बर और राजा - ये सिरपर धारण करने योग्य होते हैं अर्थात् आदरणीय हैं। प्रमादवश भी इन्हें चरणमें स्थान नहीं देना चाहिये। मनस्वी व्यक्तिकी पुष्प - स्तबकके समान दो ही स्थितियाँ होती हैं - या तो वह सबके सिरपर ही रहता है अथवा वनमें ही चला जाता है। मणि स्वर्णाभूषणमें संनिविष्ट करनेके योग्य होती है। यदि वह मणि लाखसे निर्मित आभूषणमें संनिहित की जाती है तो उस कुसंगतिके कारण वह न स्वयं संक्षुब्ध होकर विलाप करती है और न सुशोभित ही होती है। अश्व, गज, लौह, काष्ठ, पाषाण, वस्त्र, नारी, पुरुष तथा जल-इनमें परस्पर बहुत बड़ा अन्तर है।
तिरस्कृत होनेपर भी धैर्यसम्पन्न सज्जन व्यक्तिके गुण कभी भी आन्दोलित नहीं होते। दुष्टके द्वार नीचे कर दी गयी अग्निकी भी शिखा कभी नीचे नहीं जाती।
उत्तम जातिका अश्व अपने स्वामीका चाबुक - प्रहार, सिंह - हाथीकी गर्जगा और वीर पुरुष शत्रुपक्षकी भयंकर गर्जना सहन नहीं कर सकता।
यदि सज्जन मनुष्य दुर्भाग्यवश कदाचित् वैभवरहित हो जाता है तो भी वह न तो दुष्ट जनोंकी सेवा करनेकी अभिलाषा रखता है और न नीच जनोंका सहारा लेता है। भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर भी सिंह घास नहीं खाता, अपितु हाथियोंके गर्म रक्तका ही पान करता है।
जिस मित्रमें एक बार भी दुष्ट भाव परिलक्षित हो जाता है और पुनः उसीसे मैत्री सम्बन्ध स्थापित करनेकी जो इच्छा करता है, वह मानो अश्वतरी (खच्चरी ) - के द्वारा धारण किये गये गर्भके सदृश मृत्युको ही प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है।
शत्रुकी मृदुभाषी संतानोंकी उपेक्षा करना बुद्धिमान् जनोंके लिये उचित नहीं है; अर्थात् प्रिय बोलनेवाले शत्रुपुत्रोंसे भी सावधान रहना चाहिये; क्योंकि समय आनेपर वे ही असह्य दुःख - प्रदाता एवं विषपात्रके समान भयंकर विपत्ति उत्पन्न करनेवाले हो जाते हैं। उपकारके द्वार वशीभूत हुए शत्रुसे अन्य शत्रुको समूल उखाड़ फेंकना चाहिये, क्योंकि पैरमें गड़े हुए काँटेको मनुष्य हाथमें लिये हुए काँटेसे ही निकालता है।
सज्जन व्यक्तिको अपकारपरायण मनुष्यके नाशकी चिंता कभी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह नदीके तटपर अवस्थित वृशक्षोंकी भाँति स्वयं ही नष्ट हो जाता है।
अर्थका रूप धारण करनेवाले अनर्थ और अनर्थका रूप धारण करनेवाले अर्थ - ये दैवाधीन पुरुषके विनाशके लिये होते हैं। कभी-कभी कार्यकालके भेदसे निष्पाप बुद्धि उत्पन्न हो जाती है; क्योंकि दैवके अनुकूल रहनेपर पुरुषका सर्वत्र कल्याण ही होता है। धनार्जन करते समय, किसी भी प्रकारका प्रयोग करते समय, अपने कार्यको सिद्ध करते समय, भोजनके समय और सांसारिक व्यवहारके समय मनुष्यको लज्जाका परित्याग कर देना चाहिये।
जिस देश, प्रान्त, नगर एवं ग्राममें धनवान्, श्रोत्रिय, राजा, नदी तथा वैद्य - ये पाँच नहीं रहते हैं, वहाँ बुद्धिमान् व्यक्तिका रहना उचित नहीं है।
(धनिन: श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चम:।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र संस्थितिम्॥)
जहाँ आना - जाना न हो, जहाँ अनुचित आचरणको रोकनेके लिये भयकी सम्भावना न हो, लज्जा न हो तथा दानकी प्रवृत्ति न हो, वहाँ तो एक भी दिन निवास नहीं करना चाहिये। जिस देश - प्रान्तादिमें दैवज्ञ, वेदज्ञ, राजा, नदी एवं सज्जन व्यक्ति - इन पाँचका निवास नहीं है, वहाँपर निवास नहीं करना चाहिये।
हे शौनक! एक ही व्यक्तिमें सभी ज्ञान प्रतिष्ठित रूपमें नहीं रहते हैं। इसलिये यह सर्वमान्य है कि सभी व्यक्ति सब कुछ नहीं जानते हैं और कहींपर भी सभी सर्वज्ञ नहीं हैं। इस संसारमें न तो कोई सर्वविद् है और न कोई अत्यन्त मूर्ख ही है। उत्तम, मध्यम तथा निम्नस्तरीय ज्ञानसे जो व्यक्ति जितना जानता है, उसे उतनेमें विद्वान् समझा जाना चाहिये।