91 - भगवान्‌ विष्णुका अमूर्त ध्यान - स्वरूप

सूतजीने कहा - हे शौनक! स्वायम्भुव मनु आदि मुनिजन व्रत, यम, नियम, पूजा, ध्यान, स्तुति तथा जपमें निरत रहकर भगवान्‌ हरिका ध्यान करते हैं। वे हरि देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकारसे रहित हैं। वे आकाश, तेज, जल, वायु तथा पृथिवी नामक सभी पञ्चभूतोंसे असम्बद्ध हैं तथा उनके धर्मसे भी रहित हैं। वे सभी प्राणियोंके स्वामी, सबको आबद्धकर नियमन करनेवाले नियन्ता एवं इस जगत् के प्रभु हैं। वे चैतन्यरूप, सबके स्वामी और निराकार हैं। वे सभी आसक्तियोंसे रहित, सभी देवोंसे पूजित तथा महेश्वर हैं। वे तेज:स्वरूप तथा तीनों गुणोंसे भिन्न हैं। वे सभी रूपोंसे रहित एवं कर्तृत्वादिसे शून्य हैं।

वे वासनाविहीन, शुद्ध, सर्वदोषरहित, पिपासावर्जित तथा शोक - मोहादिसे दूर रहते हैं। वे हरि जरा - मरणसे रहित कूटस्थ तथा मोहवर्जित हैं। वे सृष्टि एवं प्रलयसे रहित एवं सत्यस्वरूप हैं, निष्कल परमेश्वर हैं। वे जाग्रत् , स्वप्र एवं सुषुप्ति आदि अवस्थाओंसे रहित तथा नामरहित हैं। वे जाग्रत् आदि अवस्थाओंके अध्यक्ष, शान्तस्वरूप देवाधिदेव हैं। वे जाग्रत्‌ आदि अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले हैं तथा नित्य हैं और कार्य - कारणभावसे रहित हैं।

वे सभीके द्वारा देखने योग्य, मूर्तस्वरूप, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम हैं। वे ज्ञानदृष्टिवाले कर्णेन्द्रियके लिये सुनने योग्य विज्ञान और परमानन्दस्वरूप हैं। वे संसारसे रहित तथा तैजससे भी वर्जित हैं। वे प्रकृष्ट ज्ञाससे अप्राप्य, तुरीयावस्थामें विद्यमान रहनेवाले परमाक्षरस्वरूप ब्रह्म हैं। वे सभीके रक्षक एवं सभीके हन्ता हैं। वे सभी प्राणियोंकि आत्मस्वरूप हैं, बुद्धि और धर्मसे रहित हैं। वे हरि निराधार हैं। साक्षात्‌ कल्याणस्वरूप शिव हैं। वे विकारहीन, वेदान्तियोंके द्वारा जानने योग्य, वेदरूप, इन्द्रियातीत, सर्वकल्याणप्रद, परमशुभ, भूतेश्वर, शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्ध - इन पाँच तन्मात्राओंसे रहित अनादि ब्रह्म हैं। वे योगियोंके द्वारा सम्पुटित ब्रह्मरन्ध्रमें अवस्थित ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ ऐसे परिज्ञानमात्र हैं।

है महादेव! इस प्रकार ज्ञान प्राप्तकर जितेन्द्रिय मनुष्यको उन हरिका ध्यान करना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकारसे उन हरिका ध्यान करता है, वह निश्चित ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।