गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
186 - प्रमेह, मूत्रनिरोध, शर्करा, गण्डमाला, भगंदर तथा अर्श आदि रोगोंका निदान
श्रीहरिने कहा - हे शिव! मधुके साथ गुडूचीका रस पीनेसे प्रमेह रोग विनष्ट हो जाता है। गोहालिका(जलपिप्पली) - की जड़को तिल, दही तथा घीके साथ पान करनेसे यह वस्तिभागमें अवरुद्ध मूत्रको बाहर करता है। काले नमकके साथ इस जड़का पान करनेसे हिचकी रोग भी दूर हो जाता है। गोरक्ष अर्थात् गोरखमुण्डी तथा कर्कटी (ककड़ी) - की जड़को शीतल जलके साथ पीसकर तीन दिन पीनेसे ही शर्करा नामक रोग नष्ट हो जाता है। ग्रीष्मकालमें मालतीकी जड़को भलीभाँति पीसकर
शर्करा और बकरीके दूधमें पीनेसे मूत्रनिरोध, शर्करा - विकार और पाण्डु रोग विनष्ट हो जाता है।
ब्रह्मयष्टी अर्थात् ब्राह्मीकी जड़को चावलके पानीमें घिसकर तैयार किया गया लेप असाध्य गण्डमाला तथा गलगण्डक रोगको दूर करता है। हे रुद्र! करवीर (कनेर) - की जड़का लेप तथा सुपारीका लेप भी पुरुषत्वसे सम्बन्धित विकारको नष्ट करता है। अब मैं अन्य औषधिक योगोंको कहता हूँ।
दन्तीमूल, हल्दी और चित्रकके लेपसे भगंदर रोग विनष्ट होता है। हे उमापते! हे वृषभध्वज! स्नुही (थूहड़ - सेहुँड़) - के दूधसे अनेक बार भावित हल्दीकी वटीका लेप अर्श रोगको दूर करता है। घोषाफल और सेंधा नमकको पीसकर बनाया गया लेप अर्श रोगको नष्ट करनेका श्रेष्ठतम योग है। हे शिव! पलाश और क्षारसे बने क्वाथके द्वारा शोधित घृतपाकमें तिगुना मिला हुआ त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ और पिप्पली ) -का चूर्ण अर्श रोगको विनष्ट करता है। बेलके फलको भूनकर खानेसे खूनी अर्श विनष्ट होता है। मक्खनके साथ काला तिल खानेसे भी खूनी अर्श रोग नष्ट होता है।
हे वृषभध्वज! प्रात:काल यवक्षार - मिश्रित सोंठके चूर्णको समान मात्रामें गुड़ मिलाकर खानेसे वह जठराग्निकी वृद्धि करता है। सोंठके चूर्णको काढ़ा बनाकर पान करनेसे भी जठराग्निकी वृद्धि होती है। हे रुद्र! हरीतकी, सेंधा नमक, पिप्पली - इन औषधियोंके चूर्णको गरम जलके साथ मिलाकर पान करनेसे भूख बढ़ती है तथा शूकरकन्दका रस घृतके साथ पान करनेसे अति क्षुधा बढ़ती है।