गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
96 - वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय
याज्ञवल्क्यजीने कहा - अब मैं संकर जातियोंकी उत्पत्ति एवं गृहस्थादिके श्रेष्ठ धर्मोंका वर्णन करता हूँ।
ब्राह्मण पुरुषसे विवाहिता क्षत्रिय कन्यामें मूर्धावसिक्त, विवाहिता वैश्य कन्यामें अम्बष्ठ और विवाहिता शूद्रामें पारशव निषाद नामक संकरका जन्म होता हैं। (ये अनुलोम संकर कहे जाते हैं।) क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें माहिष्य तथा शूद्रामें(याज्ञवल्क्यस्मृति (4 । 92 )- के अनुसार क्षत्रियसे शूद्रामें उग्र नामकी संकर जातिकी संतान उत्पन्न होती है।)
म्लेच्छकी उत्पत्ति होती है। वैश्य पुरुषसे शूद्रवर्णा स्त्रीमें करण नामक संकर जातिकी संतानका जन्म होता है।
(मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ, निषाद, माहिष्य, उग्र एवं करण - ये छः अनुलोमज पुत्र हैं।) क्षत्रिय पुरुषसे ब्राह्मण स्त्रीमें सूत, वैश्य पुरुषसे ब्राह्मणीमें वैदेहक तथा शूद्र पुरुषसे ब्राह्मणीमें सर्ववर्णनिन्दनीय चाण्डालकी उत्पत्ति होती है। क्षत्रिय स्त्रीमें वैश्यसे मागध और शूद्रसे क्षत्ता नामक संकर संतानका जन्म होता है। इसी प्रकार वैश्य स्त्री शूद्र पुरुषके संसर्गसे आयोगव (सूत, वैदेहक, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता एवं आयोगव - ये छ: प्रतिलोमज पुत्र हैं।) नामक वर्णसंकर पुत्रको जन्म देती है।
क्षत्रिय पुरुषसे वैश्य कन्यामें उत्पन्न हुए माहिष्य संकरके द्वारा करणी (वैश्यसे शूद्रामें उत्पन्न) स्त्रीके साथ संसर्ग होनेपर रथकारका जन्म होता है।
जो उच्चवर्णोय पुरुषसे निम्नवर्णा स्त्रीमें संतान उत्पन्न होती है, वह अप्रतिलोमज अथवा अनुलोमज संतान है और जो निम्नवर्गीय पुरुषसे उच्चवर्णा स्त्रीमें संतान जन्म ग्रहण करती है, वह प्रतिलोमज संतान है। प्रतिलोमज असत् हैं और अनुलोमज सत् हैं।
जातिका उत्कर्ष सातवें, पाँचवें अथवा छठे जन्ममें होता है। यहाँ जाति शब्दसे अभी वर्णित मूर्धावसिक्त आदि जातियाँ ली गयी हैं। प्रकृतमें संक्षेपसे यह समझना चाहिये - ब्राह्मणसे शूद्रामें उत्पन्न संतान निषाद कही जाती है। यह संतान यदि कन्या है तो इसे निषादी कहा जाता है। इसका यदि ब्राह्मणसे विवाह हो और उससे उत्पन्न कन्याका पुन: ब्राह्मणसे विवाह हो, आगे उससे भी उत्पन्न कन्याका पुनः ब्राह्मणसे ही विवाह हो - इसी क्रमसे उत्पन्न छठी कन्यासे विवाहित ब्राह्मणके द्वारा उत्पादित सातवीं संतान शुद्ध ब्राह्मण वर्णकी होगी। ऐसे ही ब्राह्मणसे वैश्य जातीय कन्यामें उत्पन्न अम्बष्ठ जातिकी पाँचवीं कन्याकी छठी संतान शुद्ध ब्राह्मण होगी। मूर्धावसिक्ता कन्याकी भी इसी क्रमसे उत्पन्न चौथी कन्याकी पाँचवीं संतान शुद्ध ब्राह्मण ही होगी। ठीक यही स्थिति उग्रा और माहिष्याकी है। ये दोनों उग्र एवं माहिष्य जातिकी कन्याएँ यदि क्षत्रियसे ही विवाहित होती गयीं तो इनकी छठी और पाँचवीं संतति शुद्ध क्षत्रिय ही होगी। ऐसे ही करण जातिकी कन्या वैश्यवर्णके पुरुषसे विवाहित होकर यथाक्रम पाँचवें संतानको शुद्ध वैश्यरूपमें ही उत्पन्न करेगी।
इसके अतिरिक्त यह भी जानने योग्य है कि कर्मका व्यत्यय होनेसे भी जिस वर्णका कर्म किया जा रहा है, वही वर्ण सातवें, छठे तथा पाँचवें जन्मकी संतानका हो जाता है। स्पष्टरूपमें इस प्रकार समझा जा सकता है - धर्मशास्त्रके अनुसार ब्राह्मणको अपनी मुख्यवृत्ति याजन तथा अध्यापन आदिसे जीविका चलानी चाहिये। आपत्कालमें अपनी मुख्यवृत्तिस जीविका न चल पानेपर क्षत्रियवृत्ती वैश्यवृत्ति या शूद्रवृत्ति भी ब्राह्मण स्वीकार कर सकता है। यही क्षत्रिय एवं वैश्यके बारेमें भी व्यवस्था है। जब कोई वर्ण अपनी मुख्यवृत्तिका परित्याग कर अन्य द्वितीय, तृतीय वर्णकी वृत्ति स्वीकार करता है तो यह हीनवर्णकी वृत्ति मानी जाती है और यह हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार करना ही 'कर्म - व्यत्यय' है। इस प्रकारके कर्म - व्यत्यय होनेपर आपत्तिकालके अभावमें भी यदि कोई हीनवर्णकी वृत्तिका परित्याग नहीं करता है तो उसकी सातवीं, छठी, पाँचवीं कुल - परम्परामें उत्पन्न संतति उस हीनवर्णकी ही होगी जिस हीनवर्णकी वृत्ति स्वीकार कर जीविका निर्वाह किया जा रहा है। दृष्टान्तके रूपमें यह कहा जा सकता है - यदि कोई ब्राह्मण शूद्रवृत्तिसे जीविका चला रहा है और उसका परित्याग बिना किये पुत्र उत्पन्न कर रहा है तथा यह पुत्र भी शूद्रवृत्तिसे अपना जीवन चलाता हुआ अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है एवं यह तीसरा पुत्र भी शूद्र - वृत्तिमें रहकर ही अपना पुत्र उत्पन्न कर रहा है तो ऐसी परम्परामें सातवें जन्ममें शूद्र ही उत्पन्न होगा।
वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी दशामें छठे जन्ममें वैश्य ही उत्पन्न होगा। क्षत्रियवृत्तिसे जीविका निर्वाहकी स्थितिमें पाँचवें जन्ममें क्षत्रिय ही उत्पन्न होगा। क्षत्रिय भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर छठे वंशमें शूद्रवर्णकी एवं वैश्यवृत्तिसे जीविका निर्वाह करनेपर पाँचवें वंशमें वैश्यवर्णकी संतान उत्पन्न करेगा। ऐसे ही वैश्य भी शूद्रवृत्तिसे जीविका निर्वाह करते हुए अपनी पुत्र - परम्पराके पाँचवें जन्ममें शूद्रको ही उत्पन्न करेगा।
इसी प्रसंगसे यह भी ज्ञातव्य है - तीन प्रकारकी जातियाँ हैं - 1. संकर जाति, 2. संकीर्ण संकर जाति तथा 3. वर्ण संकोर्ण संकर जाति। संकर जातिके मूर्धावसिक्त अम्बष्ठ आदि छ: भेद ऊपर बताये गये हैं। इन्हें अनुलोमज कहा जाता है। ऐसे ही सूत, वैदेहक आदि भी छ: संकर जातिके भेद पहले ही कहे जा चुके हैं। ये प्रतिलोमज हैं। संकीर्ण संकर जातिके जो लोग होते हैं, उनका निर्देश पहले रथकारकी उत्पत्ति बताकर किया गया है। अब वर्ण संकीर्ण संकर जातिके लोगोंको इस प्रकार समझनी चाहिये - मूर्धावसिक्ता स्त्रीमें क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्रसे जो उत्पादित हैं, ऐसे ही अम्बष्ठ जातिकी स्त्रीमें वैश्य अथवा शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं और पारशव निषाद जातिकी स्त्रीमें शूद्रके द्वारा जो उत्पादित हैं, वे वर्ण संकीर्ण संकर जातिके होते हैं। इन्हें, अधर प्रतिलोमज कहते हैं। इसी प्रकार मूर्धावसिक्त, अम्बष्ठ एवं पारशव निषाद जातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मणके द्वारा जो उत्पादित हैं, माहिष्य एवं उग्रजातिकी स्त्रियोंमें ब्राह्मण अथवा क्षत्रियसे जो उत्पादित हैं और करणजातिकी स्त्रीमें ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्यसे जो उत्पादित हैं, उन्हें उत्तर अनुलोमज कहते हैं। उनमें अधर प्रतिलोमज असत् तथा उत्तर प्रतिलोमज सत् माने जाते हैं।
गृहस्थाश्रमीको प्रतिदिन विवाहाग्रिमें अथवा सम्पत्ति विभागके समय स्वयं लायी गयी संस्कृत - अग्निमें स्मार्तकर्म वैश्वदेव आदि सम्पन्न करना चाहिये। श्रौतकर्मानुष्ठान अग्निहोत्र आदि बैतानाग्नि (आहवनीय आदि अग्नियों) - में करना चाहिये। शरीर चिंता (प्रात: - सायं अवश्य करणीय मल - मूत्र विसर्जन) - को शास्त्रीय विधिसे सम्पन्न कर, गन्ध - लेपनिवृत्तिपर्यन्त शुद्धि प्रातकर दन्तधावन एवं स्नानकर द्विजको प्रात:काल संध्योपासन करना चाहिये तथा अनन्तर अग्निमें हवन (अग्निहोत्र) करके समाहितचित्तसे सूर्यदेवताके मन्त्रोंका('उदु त्यं जातवेदसं०' आदि।) जप करना चाहिये। उसके बाद गृहस्थाश्रमी वेदार्थ (निरुक्त, व्याकरण आदि) तथा अन्य विविध प्रकारके शास्त्रोंका अध्ययन करे। योगक्षेम आदिकी सिद्धिके लिये उसको ईश्वरकी उपासना करनी चाहिये।
वह स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा पूजन करे। तदनन्तर उसको वेद, पुराण तथा इतिहासका यथाशक्ति अध्ययन एवं अध्यात्मिकी विद्याका जप (चिन्तन) करना चाहिये। तत्पश्चात् भूत, पितर, देव, ब्रह्म और मनुष्य जातिके लिये गृहस्थ बलिकर्म,(बलिकर्म - भूतयज्ञ, स्वधा - पितृयज्ञ, होम - देवयज्ञ, स्वाध्याय - ब्रह्मयज्ञ, अतिथि - सत्कार - मनुष्य - यज्ञ।)
स्वधा, होम, स्वाध्याय तथा अतिथि - सत्कार करे। देवताओंके लिये अग्निमें हवन करना चाहिये। भूतबलि, श्वान (कुत्ता), चाण्डाल एवं काक आदिके लिये पका हुआ अन्न भूमिपर दे। पितृगण एवं मनुष्योंको अन्नके सहित जल भी प्रतिदिन प्रदान करना चाहिये। प्रतिदिन स्वाध्याय करे, केवल अपने लिये अन्नपाक न करे। स्ववासिनी (अपने पितृगृहमें रहनेवाली विवाहिता स्त्री), वृद्ध, गर्भिणी, व्याधिपीड़ित, कन्या, अतिथि तथा भृत्योंको भोजन प्रदानकर गृहस्वामिनी और उसका पति शेष बचे हुए अन्नका भोजन करे। अग्निमें पञ्चप्राणाहुति देकर अन्नकी निन्दा न करते हुए भोजन करना चाहिये।
भोजनके आदि और अन्तमें आपोऽशान - विधिसे आचमन करे तथा सम्यक् प्रकारसे पका हुआ, हितकारी, स्वल्प भोजन बालकोंके साथ करना चाहिये।
पात्रादिसे आच्छादित अमृततुल्य भोजन द्विजको कराना चाहिये। यथाशक्ति अतिथि एवं अन्य वर्णोंको क्रमशः भोजन देना चाहिये। सायंकाल भी आये हुए अतिथिको लौटाना नहीं चाहिये। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। सुव्रत! (ब्रह्मचारी एवं संन्यासी) भिक्षुकको सत्कारपूर्वक भिक्षा प्रदान करनी चाहिये। द्वारपर पधारे सभीको भोजन कराना चाहिये। प्रतिवर्ष स्नातक, आचार्य एवं राजाकी पूजा करनी चाहिये। ऐसे ही मित्र, जामाता एवं ऋत्विक् प्रतिवर्ष पूजनीय हैं। पथिकको अतिथ तथा वेदपारंगताको श्रोत्रिय कहा जाता है। ब्रह्यलोककी कामना करनेवाले गृहस्थजनोंके लिये ये दोनों मान्य हैं।
ससम्मान आमन्त्रणके बिना ब्राह्मणको दूसरेके यहाँ बने हुए पक्वान्नको प्राप्त करनेकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। गृहस्थको वाणी, हाथ, पैरकी चञ्चलता एवं अतिभोजन करनेसे बचना चाहिये। संतुष्ट श्रोत्रिय तथा अतिथिको विदा करते समय ग्रामकी सीमातक उनका अनुगमन करना चाहिये।
गृहस्थ अपने इष्ट - मित्र एवं बन्धुओंके साथ दिनका शेष भाग व्यतीत करे। तदनन्तर सायंकालीन संध्योपासना करके वह पुनः अग्निहोत्रकर भोजन ग्रहण करे। इसके बाद उसको अपने सुबुद्ध भृत्योंके साथ बैठकर अपने हितका विचार करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्ममुहूर्तमें निद्राका परित्यागकर वह धनादिसे ब्राह्मणको संतुष्ट करे तथा वृद्ध, दुःखी एवं भार ढोनेवाले पथिकोंको भलीभाँति मार्ग दिखाकर प्रसन्न करे।
यज्ञानुष्ठाना, अध्ययन और दान वैश्य तथा क्षत्रियका कर्म माना गया है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये याजन, अध्यापन तथा प्रतिग्रह - ये तीन कर्म अधिक बताये गये हैं।
क्षत्रियका प्रधान कर्म प्रजापालन है। वैश्यवर्णके लिये कुसीद (सूद), कृषि, वाणिज्य और पशुपालन मुख्य कर्म कहा गया है। शूद्रवर्णका प्रधान कर्म ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यकी सेवा करना है। द्विजोंको यज्ञादि कर्तव्योंमें प्रमाद नहीं करना चाहिये। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियसंयम, दम, क्षमा, सरलता और दान सभीके लिये धर्मके साधन हैं। अपने वर्णधर्मानुसार जीविकाका आश्रयणकर कुटिल और दुष्टवृत्तिका परित्याग करना चाहिये -
प्रधानं क्षत्रियं कर्म प्रजानां परिपालनम्॥
कुसीदकृषिवाणिज्यं पशुपाल्यं विश: स्मृतम्।
शूद्रस्थ द्विजशुश्रूषा द्विजो यज्ञान् न हापयेत्॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियसंयम:।
दम: क्षमार्जवं दानं सर्वेषां धर्मसाधनम्॥
आचरेत् सदृशीं वृत्तिमजिह्यामशठां तथा।
जो मनुष्य तीन वर्षसे अधिक कालतकके लिये अन्नका भण्डारण करता है, वह सोमरस पान करनेकी योग्यता रखता है। जिसके पास मात्र एक वर्षभरके लिये ही अन्न रहता है, उसे मुख्यतः सोमयागकी प्राकृक्रिया (प्राक्क्रिया - सोमयागके पूर्व करणीय अगिनहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रायण, चातुर्मास्य आदि।) करनी चाहिये। द्विजको प्रतिवर्ष सोमयाग, पशुयाग, आग्रायणेष्टि (नया सस्य उत्पन्न होनेपर आग्रायणेष्टिका विधान है।) तथा चातुर्मास्ययाग यत्नपूर्वक करना चाहिये। यदि इन यागोंको करना प्रतिवर्ष असम्भव हो तो इन यागोंके कालमें वैश्वानरी इष्टि ही कर लेनी चाहिये।
मुख्य कल्पके सम्पादनमें असमर्थके लिये जो द्वितीय कल्प विहित है, वह हीन कल्प है। सोमयाग, आग्रायणेष्टि आदि मुख्य कल्प हैं। वैश्वानरी इष्टि हीनकल्प है। यदि मुख्यकल्पके सम्पादनयोग्य द्रव्य है तो हीनकल्पका सम्पादन नहीं करना चाहिये। जितने भी फलप्रद (काम्य) अनुष्ठान हैं, फलकी कामना रहनेपर उन्हींका सम्पादन करना होगा। उनको न कर हीनकल्पका सम्पादन करनेपर फल नहीं प्राप्त हो सकता।
ब्राह्मणफो अपनी जीविकाके लिये उस अप्रतिषिद्ध अर्थकी भी इच्छा नहीं करनी चाहिये जो स्वाध्याय - विरोधी हो। ऐसे जिस - किसी भी व्यक्तिसे अर्थ पानेकी इच्छा नहीं करनी चाहिये, जिसका आचरण संदिग्ध हो। विरुद्धवृत्ति (अयाज्य याजन आदि) - से भी अर्थ - अर्जन नहीं करना चाहिये। ऐसे ही नृत्य, गीत आदि (प्रसंग) - से भी अर्थ - अर्जन नहीं करना चाहिये। जो द्विज यज्ञके लिये शूद्रसे धनकी याचना करता है, वह मृत्युके पश्चात् चाण्डाल - योनिमें जन्म लेता है। यज्ञके लिये लाये हुए अन्नको जो सम्पूर्णरूपसे यज्ञमें नहीं लगाता, वह कुक्कुर, गृध्र अथवा काकयोनिमें जन्म ग्रहण करता है।
ब्राह्मणको एक कुसूल(कुसूलधान्य बारह दिनके लिये अन्न, कुम्भीधान्य छः दिनके लिये अन्न।) (कोष्ठक)-भर, एक मटका - भर, तीन दिनतकके लिये या एक दिनतकके लिये अन्न संग्रह करना चाहिये। अथवा वह शिलोञ्च्छवृत्तिसे ('शिलोञ्ज्छवृत्ति' भरण - पोषणकी एक ब्राह्मण - वृत्ति (साधन) है। 'शिलवृत्ति' उसे कहते हैं, जिसमें ब्राह्मण फसल कट जानेके बाद खेतमें गिरे हुए अन्नकी वल्लरी (बाल) - को एकत्र करके अपने कुटुम्बका भरण-पोषण करता है। 'उञ्ज्छवृत्ति' उसे कहते हैं, जिसमें अन्नकी वल्लरी छोड़कर एक - एक कणमात्र एकत्र कर उसीसे अपने कुटुम्बका भरण - पोषण करता है। 'शिल' और 'उञ्च्छ ' - यही 'शिलोञ्च्छवृत्ति' है।) अपना जीवन - निर्वाह करे। इन वृत्तियोंमें उत्तरोत्तर वृत्ति श्रेष्ठ है।
यदि वह भूखसे पीड़ित है तो उसको राजा, अपने छात्र या यज्ञ करनेवाले यजमानसे ही अन्न - धनकी याचना करनी चाहिये और दाम्भिक(दाम्भिक - केवल किसीको प्रसन्न करनेके लिये ही धर्मानुष्ठान।), हैतुक ( हैतुक - निराधार तर्कोंसे धार्मिक कृत्योंमें संशयकर्ता।), पाखण्डिक (पाखण्डिक - वेदशास्त्रोंक विरुद्ध अनेक प्रकारके लुभावने वैशका धारक।) एवं वकवृत्तिवालेका (वकवृत्ति - वकके समान वर्तन (व्यवहार) करनेवाला।) सभी लौकिक - शास्त्रीय कर्ममें सर्वथा परित्याग करना चाहिये। वह स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करे। सिर, दाढ़ी आदिके केश एवं नखोंको यथा - विधान कटवाये रहे। भार्याके साथ भोजन नहीं करना चाहिये। एक वस्त्र धारण कर तथा खड़े होकर भोजन नहीं करना चाहिये।
कभी भी अप्रिय वचन नहीं बोलना चाहिये। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणको विनीत होना चाहिये। दण्ड और कमण्डलु धारण करना चाहिये। देव आदिको अपने दाहिने करके चलना चाहिये। वह नदी, वृक्षच्छाया, भस्म, गोष्ठ, जल तथा मार्गके मध्यमें मूत्रका परित्याग न करे। अग्नि, सूर्य, गौ, चन्द्र, संध्या, जल, स्त्री और द्विजोंके सम्मुख भी मूत्रका त्याग करना वर्जित है। वह अग्नि एवं उदय तथा अस्त हो रहे सूर्यका दर्शन न करे। उसके लिये नग्न तथा मैथुनासक्त स्त्री, मूत्र और विष्ठाका दर्शन भी त्याज्य है। पश्चिम सिर करके नहीं सोना चाहिये। थूक, रक्त, विष्ठा, मूत्र और विषको जलमें छोड़ना अनुचित है। आगपर पैरोंको सेंकना तथा उसे लाँघना निषिद्ध है।
अञ्चलिद्वारा जल नहीं पीना चाहिये औरनिद्रा - निमग्न व्यक्तिको जगाना नहीं चाहिये। धूर्त - वञ्चकका साथ नहीं करना चाहिये। रोगी जनोंके साथ शयन नहीं करना चाहिये। धर्म - विरुद्ध कर्मोंका परित्याग कर देना चाहिये। चिताग्निका धुआँ तथा नदीमें तैरना वर्जित है। केशपर, भस्मपर, भूसीपर, प्रज्वलित अग्निके अंगारेपर और कपालपर स्थित नहीं होना चाहिये। किसीसे बछड़ेको दूध पिलाती हुई गायको बताना नहीं चाहिये और किसीके घरमें द्वारेक अतिरिक्त अन्य गवाक्षादि मार्गोंसे प्रवेश नहीं करना चाहिये। लोभी तथा शास्त्र - विरुद्ध कर्मकरनेवाले राजासे प्रतिग्रह नहीं लेना चाहिये।
वेद तथा धर्म - शास्त्रादिका अध्ययन करनेवालोंका उपाकर्म - संस्कार श्रवणनक्षत्रसे युक्त श्रावणी पूर्णिमाको होना चाहिये। संस्कार - विहित औषधियों - सामग्रियोंके उपलब्ध रहनेपर यह कार्य श्रावणमासकी हस्तनक्षत्रसे युक्त पदञ्चमी - तिथिमें भी सम्पन्न होसकता है। पौषमासके रोहिणीनक्षत्रमें अथवा अष्टकाके दिन ग्रामसे बाहर जलाशयके पास वेदोंका उत्सर्ग - कर्म गृह्यसूत्रके अनुसार करना चाहिये।
शिष्य, ऋत्विक्, गुरु तथा बन्धु - बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर तीन दिनका अनध्याय उपाकर्म तथा उत्सर्ग - कर्म करनेपर होता है। ऐसे ही अपनी शाखाके श्रोत्रिय ब्राह्मणकी मृत्यु होनेपर तीन दिनका अनध्याय होता है। संध्याके समय मेघ - गर्जन होनेपर, आकाशमें उत्पातकी ध्वनि होनेपर, भूकम्प होनेपर तथा उल्कापात होनेपर अनध्याय रखना चाहिये। वेद और आरण्यकका अध्ययन पूर्ण होनेपर एक दिन एवं एक रात्रि (अहोरात्र) - का अनध्याय होता है।
अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा, चन्द्र - सूर्यग्रहण, ऋतुसंधिकी प्रतिपद्में तथा श्राद्ध - भोजन अथवा श्राद्धका प्रतिग्रह लेनेपर एक दिन और एक रात्रि (अहोरात्र) - का अनध्यायकाल मानना चाहिये। ( यह व्यवस्था एकोद्दिष्ट श्राद्धसे अतिरिक्त श्राद्धके लिये है। एकोदिष्ट श्राद्धछा भोजन अथवा प्रतिग्रहमें तीन रात्रिका अनध्याय होता है।) पशु, मेढक, नेवला, कुत्ता, सर्प, बिडाल और सूअरके बीचमें आनेपर तथा शक्रध्वजके अवरोपणका दिन आनेपर एवं उत्सवका दिन होनेपर भी एक ही दिन - रात्रिका अनध्यायकाल होता है।
कुत्ता, सियार, गर्दभ, उलूक, सामवेद तथा बच्चोंक कोलाहल और पीड़ितजनोंकी दुःखभरी ध्वनि होनेपर, अपवित्र वस्तु, शव, शूद्र, अन्त्यज, श्मशान और पतित व्यक्तिका सामीप्य होनेपर तत्काल अनध्याय होता है। अपवित्र देशमें, अपवित्रावस्थामें, बार - बार बिजली चमकनेपर, दो प्रहरतक बार - बार मेघ - गर्जन होनेपर, भोजन करनेके बाद हाथ गीला रहनेपर, जलके मध्यमें, अर्धरात्रिमें तथा मध्यके दो प्रहरमें और आँधी-तूफानके बीच भी उतने कालतक अध्ययन नहीं होना चाहिये। दिग्दाह ( दिग्दाह - दिशाएँ यदि जलती हुई प्रतीत होती हों।) होनेपर, उत्पात - जैसी धूलिकी वर्षा होनेपर, संध्याकालीन कोहरा होनेपर अथवा चोर, राजा आदिके कारण होनेवाले उपद्रवोंके समयमें तत्काल अनध्याय होता है। स्वयं दौड़ते हुए, अपवित्र मदिरा आदिका गन्ध आनेपर तथा शिष्ट व्यक्तिके घर आ जानेपर अध्ययन करना वर्जित है। गधा, ऊँट, वाहन (रथ), हाथी, घोड़ा, नौका, वृक्ष और पर्वतारोहणका काल अनध्यायका ही काल होता है। उपर्युक्त सैंतीस अनध्यायोंको तात्कालिक अनध्याय माना गया है अर्थात् ये निमित्त जिस समय हों, उस समय अनध्याय समझना चाहिये।
देवताकी मूर्ति, ऋत्विक्, स्नातक, आचार्य एवं राजाकी छाया, पर - स्त्रीकी छाया, रक्त, विष्ठा, मूत्र, थूक और उबटनकी सामग्रीका अतिक्रमण नहीं करना चाहिये। बहुश्रुत ब्राह्मण, सर्प, क्षत्रिय (नृपति) - की अवमानना कदापि न करे। ऐसे ही अपनी भी अवमानना न करे। ऊच्छिष्ट (जूठन), विष्ठा, मूत्र और चरण - प्रक्षालित जल दूरसे ही त्यागने योग्य हैं। श्रुति और स्मृतिमें कहे गये सदाचारका पालन करना चाहिये। किसीके गोपनीय रहस्यको प्रकाशित कर उसे कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिये। किसीकी निन्दा या ताड़ना नहीं करनी चाहिये, किंतु पुत्र अथवा शिष्यको दण्ड देना चाहिये। मनुष्यको सर्वदा धर्मका ही आचरण करना चाहिये। धर्मविरुद्ध आचरण उसके लिये त्याज्य है। गृहस्थ व्यक्तिको माता - पिता, अतिथि और धनी पुरुषके साथ विवाद नहीं करना चाहिये।
दूसरेके सरोवरमेंसे पाँच पिण्ड मिट्टी बिना निकाले उसमें स्नान नहीं करना चाहिये। नदी, झरना, देव - सरोवर और पोखर - तालाबमें स्नान करना चाहिये।
दूसरेकी शय्यापर शयन नहीं करना चाहिये। अनापत्तिकालमें परान्न भोजन नहीं करना चाहिये। कृपण, बन्दी, चोर, अग्रिहोत्र न करनेवाले ब्राह्मण, बाँसका काम करनेवाले, न्यायालयमें जिसका दोष सिद्ध हो चुका है, सूदखोर, वेश्या, सामूहिक दीक्षा देनेवाला, चिकित्सक, रोगी, क्रोधी, नपुंसक, रंगमंचसे जीविका चलानेवाला, उग्र, निर्दय, पतित, व्रात्य, दम्भी, उच्छिष्टभोजी, शस्त्र - विक्रेता, स्त्रीके वशमें रहनेवाला, ग्राम्य- याजक ( ग्रामके देवताओंकी शान्तिके लिये अनुष्ठान करनेवाला), निर्दयी राजा, धोबी, कृतघ्न, कसाई, चुगलखोर, झूठ बोलनेवाला, सोम - विक्रेता, वन्दी तथा स्वर्णकार - इनका अन्न कदापि नहीं खाना चाहिये। बाल तथा कृमि (कीड़े) आदिसे युक्त भोजन एवं मांस नहीं खाना चाहिये।
बासी, उच्छीष्ट, शुक्त (पका हुआ वह अन्न जो अधिक काल बीतनेके कारण विकृत हो गया है), कुत्तेद्वारा स्पृष्ट, पतितद्वारा देखा हुआ, रजस्वलासे स्पृष्ट, संघुष्ट ( संघुष्ट - 'भोजन बचा हुआ है, जो भोजन करना चाहे वह आकर ले ले'। इस प्रकारकी घोषणा करके जो भोजन दिया जाता है, वह 'संघुष्ट' कहा जाता है।) तथा पर्यायान्न (पर्यायात्न - किसी दूसरेके उद्देशयसे रखा भोजन यदि बिना उसकी स्वीकृतिके दूसरेको दिया जाय तो ऐसे अन्नको 'पर्यायात्र' कहा जाता है।) - भोजन त्याज्य है। गायसे सूँघा गया, पक्षियोंके द्वारा उच्छिष्ट और जानकर पैरसे छुआ गया अन्न भी त्यागने योग्य होता है। यद्यपि शूद्रका अन्न नहीं लेना चाहिये, तथापि जो शूद्र परम्परासे ही अपने यहाँ सेवक है, गोपालन करनेवाला है, कुल - परम्परासे ही जो मित्रके समान व्यवहार करनेवाला है, परम्परासे अपने यहाँ हलवाहेका काम करनेवाला है, कुल - परम्परासे जो निर्धारित नाई है - इनकेअतिरिक्त वह शूद्र जिसने मन, वाणी, शरीर एवं कर्मसे सर्वथा अपनेको समर्पित कर रखा है - ऐसे शूद्रोंका अन्न स्वीकार किया जा सकता है। घी आदि स्तरिग्ध पदार्थोंसे युक्त अन्न यदि बासी है या बहुत कालसे रखा हुआ है तो भी ग्रहण करने योग्य होता है। किंतु घृत या तेल आदिसे संमिश्रित न होनेपर भी गेहूँ, जौ और गोरससे तैयार किये गये पदार्थ यदि बहुत देरतक रखे गये हैं, तब भी ग्रहण किये जा सकते हैं; यदि विकृत न हुए हों।
देव और अतिथिको बिना समर्पित किया हुआ तिल - तण्डुलमिश्रित पदार्थ, यवागू, खीर, पुआ तथा पूड़ीका भोजन व्यर्थ हो जाता है।
पलाण्डु (प्याज) और लहसुन आदि उग्र पदार्थोंका सेवन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो पुरुष पशु - हत्या करता है, वह पशुके रोम - परिमित कालतक घोर यातनाओंको सहन करते हुए नरकमें वास करता है। अभोज्य पदार्थोंका परित्याग करके अपनी सद्गातिकी भावनासे प्रभुसे क्षमा-याचना और प्रार्थना करता हुआ व्यक्ति भगवान्को प्राप्त करता है।