77 - पुलकमणिके लक्षण तथा उसकी परीक्षा - विधि

सूतजीने कहा - वायुदेवने दानवराज बलासुरके नखसे लेकर भुजापर्यन्त गतिमान्‌ रत्नमयी प्रकाशकी विधिवत्‌ पूजा करके उसको श्रेष्ठ पर्वतों, नदियों तथा उत्तरदेशके अन्य प्रसिद्ध स्थानोंमें स्थापित किया था। अतएव दाशार्ण, वागदर, मेकल, कलिङ्ग आदि देशोंमें उस प्रकाशरूपी बीजसे उत्पन्न पुलकमणियाँ गुंञ्जाफल, अञ्जन, क्षौद्र (मधु) और कमलनालके समान तथा गन्धर्व एवं अग्निदेशमें उत्पन्न हुई मणियाँ केलेके समान कान्तिवाली होती हैं। इन सभी पुलकमणियोंको प्रशस्त माना गया है।

कुछ पुलकमणियोंकी भंगिमा शंख, पद्म, भ्रमर तथा सूर्यके समान विचित्र होती है। ऐसी परम पवित्र मणियोंको सूत्रोंमें गूँथकर धारण करनेसे सब प्रकारका कल्याण होता है; क्योंकि वे पुलकमणियाँ माङ्गलिक एवं धन - धान्यादि ऐश्वर्यकी अभिवृद्धि करनेवाली होती हैं।

कौआ, घोड़ा, गधा, सियार, भेड़िया तथा भयंकर रूप धारण करनेवाले और मांस - रुधिरादिसे संलिप्त मुखवाले गृध्रोंके समान वर्णवाली जो पुलकमणियाँ होती हैं, वे मृत्युदायक होती हैं। विद्वान्‌ व्यक्तिको उनका परित्याग कर देना चाहिये। श्रेष्ठ एक पल प्रमाणवाली पुलकमणिका मूल्य पाँच सौ मुद्रा कहा गया है।