गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
44 - ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण
श्रीहरिने कहा - हे रुद्र! भगवान्की पवित्रक आदिसे पूजाकर ब्रह्मका ध्यान करके साधक हरि बन जाता है (मेरा स्वरूप हो जाता है)। अब मैं मायाजालको नष्ट करनेवाले ब्रह्मके ध्यानका वर्णन करता हूँ। आप सुनें -
ब्रह्मके ध्यानके लिये प्रवृत्त प्राज्ञ (विशेष साधक) अपनी वाणी एवं मनको नियन्त्रितकर अपनी आत्मामें ही ज्ञान स्वरूप ब्रह्मका यजन करे और जिस प्राज्ञको यह उत्कट इच्छा हो कि मैं अपनी आत्मामें ब्रह्मका दर्शन (जीव ब्रह्मका अभेद दर्शन) करूँ, उसे महद्ब्रह्म (प्रत्यक् -चैतन्याभिन्न परब्रह्म)- में ज्ञानकी भावना (ब्रह्म एवं निर्विषय - नित्य-ज्ञानमें अभेदभाव) करनी चाहिये।
ब्रह्मका ध्यान ही समाधि है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस रूपमें सदा स्वयंकी अवस्थिति ही ब्रह्मका ध्यान है। स्वयंसे अभिन्न ब्रह्म देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण, अहङ्कार, पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश), पञ्चतन्मात्र (गन्ध तन्मात्र, रस तन्मात्र, रूप तन्मात्र, स्पर्श तन्मात्र एवं शब्द तन्मात्र) विविध गुण, जन्म और भोजन, शयन आदि भोगसे सर्वथा रहित, स्वप्रकाश, निराकार, सदा निरतिशय,नित्य आनन्द स्वरूप, अनादि, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सर्वत:परिपूर्ण, सत्यस्वरूप, परमसुखस्वरूप, परमपद एवं तुरीय (कूटस्थ निरञ्जन परब्रह्म) - के रूपमें वेदोंमें वर्णित है।
हे वृषभध्वज! अपनी आत्माको रथी और शरीरको रथ समझना चाहिये। बुद्धि उसमें सारथि तथा मन लगाम है। इन्द्रियोंको उस रथमें जुते हुए अश्वके रूपमें स्वीकार किया गया है। ये इन्द्रियाँ ही रूप, रस, गन्ध आदि विषयका अनुभव करती हैं।
इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको ही मनीषियोंने भोक्ता कहा है। जो मनुष्य विज्ञान रूपी सारथिसे युक्त है, मनरूपी लगामको अपने वशमें रखता है, वही उस परमपदको प्राप्त करता है, फिर वह उत्पन्न नहीं होता। जो विज्ञानरूपी सारथिसे नियन्त्रित मनरूपी लगामवाला मनुष्य है, वह स्वर्धुनी(शब्दकल्पद्रुमके - 'धूनयति कम्पयति शत्रून्'- इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'धुनी'शब्द कम्पित कर देनेवालेके लिये प्रयुक्त होता है। इसलिये यहाँ प्रसंगानुसार 'स्वः' शब्दका मोक्ष अर्थ मानकर मोक्षको कम्पित (प्रतिबन्धित) करनेवाले अज्ञानको 'स्वर्धुनी' कह सकते हैं। इस तरह अज्ञानको पार कर लेना ही 'स्वर्धुनी' को पार करना समझना चाहिये।) (अज्ञान)-से पार हो जाता है और वही विष्णुका परमपद है।
(आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं च सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचरा:॥
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तो भोक्तित्याहुर्मनीषिण:।
यस्तु विज्ञानवानात्मा युक्तेन मनसा सदा॥
स तु तत्पदमाप्नोति स हि भूयो न जायते।
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नर:॥
स्वर्धुन्या: परमाप्नोति तद्विष्णो: परमं पदम्।)
इस योगकी परम साधनामें अहिंसादि धर्मोंको यम तथा शौचादिक कर्मोंको नियम कहा गया है। पद्मादि आसन हैं। प्राण, अपानादिक वायुपर विजय प्राप्त करना प्राणायाम है। इन्द्रियोंपर विजय प्रत्याहार और ईश्वरका चिन्तन करना ध्यानावस्था है। मनको नियन्त्रित करना ही धारणा है और ब्रह्ममें मनको केन्द्रित करनेकी जो स्थिति होती है, वह समाधि है। यदि पहले इस योगके द्वारा चञ्चल चित्त स्थिर नहीं होता तो उस मूर्ति (परमेश्वर) - का इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये-
जो हृदय कमलकी कर्णिकाके मध्य विराजमान रहनेवाले हैं तथा शंख, चक्र, गदा और कमलसे सुशोभित हैं, जो श्रीवत्स तथा कौस्तुभ मणि, वनमाला एवं लक्ष्मीसे विभूषित हैं, जो नित्य - शुद्ध, ऐश्वर्य सम्पन्न, सत्य, परमानन्द स्वरूप, आत्म स्वरूप,परमब्रह्म तथा परम ज्योतिः स्वरूप हैं - ऐसे वे चौबीस स्वरूप (अवतार) - वाले, शालग्रामकी शिलामें विराजमान, द्वारकादि (शब्दकल्पद्रुमके अनुसार द्वारकामें होनेवाली तक्षशिला भी भगवान् विष्णुकी मूर्ति मानी जाती है। इसीलिये जैसे गण्डकी नदीमें होनेवाली चक्रयुक्त शिला (शालग्राम शिला) - में विष्णुका सदा संनिधान है, वैसे ही द्वारकाकी शिलामें भी विष्णुका संनिधान है।) शिलाओंपर अवस्थित रहनेवाले परमेश्वर ध्यानके योग्य हैं और पूजनीय हैं। मैं भी वही हूँ - ऐसा समझना चाहिये।
इस प्रकार आत्मस्वरूप नारायणका यम - नियम इत्यादिक योगके साधनोंसे एकाग्रचित्त होकर जो ध्यान करता है, वह मनोऽभिलषित इच्छाओंको प्राप्तकर वैमानिक(वैमानिक देव - शब्द कल्पद्रुमके - 'विगतं मानम् उपमा यस्य' - इस व्युत्पत्तिके अनुसार निरुपमेयकों विमान कहा जा सकता है। 'विमान एव वैमानिक:' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वैमानिक शब्द भी निरुपमेय (उपमारहित) - का बोधक हो सकता है। इसलिये प्रकृतमें 'वैमानिक देव' का अर्थ निरुपमेय - उपमारहित - सर्वोत्कृष्ट देव महाविष्णु किया जा सकता है।)देव हो जाता है। यदि निष्काम होकर उन हरिकी मूर्तिका ध्यान और स्तवन करे तो मुक्ति प्राप्त हो जाती है।