गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
5 - मानस - सृष्टि - वर्णन, दक्ष प्रजापति द्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार
श्रीहरिने पुन: कहा - हे रुद्र! प्रजापति ब्रह्माने परलोकमें रहनेवाली मानस - प्रजाओंकी सृष्टिके अनन्तर सृष्टि - विस्तार करनेवाले मानस - पुत्रोंकी सृष्टि की। उनसे धर्म, रुद्र, मनु, सनक, सनातन, भृगु, सनत्कुमार, रुचि, श्रद्धा, मरीचि, अत्रि, अंङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ और नारदका प्रादर्भाव हुआ। साथ ही बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, क्रव्याद, आज्यप, सुकालिन, उपहूत एवं दीप्य नामक (सात पितृगण) उत्पन्न हुए। इन बह्रिषदादि सप्त पितृगणोंमें प्रथम तीन पितृगण अमूर्तरूप और शेष चार मूर्तिमान् हैं।
कमलयोनि ब्रह्माके दक्षिण अँगूठेसे ऐश्वर्यसम्पन्न दक्ष प्रजापति और वाम अँगूठेसे उनकी भार्याका जन्म हुआ। प्रजापतिने अपनी उस पत्नीके गर्भसे अनेक शुभ लक्षणोंवाली कन्याओंको उत्पन्न किया और उन्हें ब्रह्माके मानस पुत्रोंको समर्पित कर दिया। उन्होंने सती नामक पुत्रीका विवाह रुद्रके साथ किया, उनसे रुद्रके असंख्याक महापराक्रमशाली पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई।
दक्षने असाधारण रूपवती सुन्दर लक्षणोंवाली ख्याति नामक पुत्री भृगुको समर्पित की, जिससे भृगुके धाता और विधाता नामक दो पुत्र हुए। उसी ख्यातिसे भगवान् नारायणकी जो श्री नामक पत्नी हैं, उनकी भी उत्पत्ति हुई। उन श्रीके गर्भसे हरिने 'बल' और 'उन्माद' नामके दो पुत्रोंको उत्पन्न किया है।
महात्मा मनुके आयति और नियति नामवाली दो कन्याएँ हुईं, जिनका विवाह भृगुपुत्र धाता और विधाता के साथ हुआ। उन दोनोंसे एक-एक पुत्रका जन्म हुआ। आयतिके गर्भसे धाताने प्राण और नियति के गर्भसे विधाताने ‘मुकाणडु’ को उत्पन्न किया । उन्हीं मृकण्डुसे महामुनि मार्कण्डेयकी उत्पत्ति हुई।
मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमास नामक एक पुत्रको जन्म दिया। उस महात्मा पौर्णमासके दो पुत्र हुए, जिनका नाम विरजा और सर्वग है।
अंग्डिराने दक्षकन्या स्मृतिसे अनेक पुत्र और सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति नामक चार कन्याओंको जन्म दिया।
अनसूयाने अत्रिसे चन्द्रमा, दुर्वासा एवं योगी दत्तात्रेय नामक तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया । पुलस्त्यकी पत्नी प्रीतिसे दत्तोली नामक पुत्र हुआ। प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमासे कर्मश, अर्थवीर तथा सहिष्णु नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए । क्रतुकी पत्नी सुमतिसे साठ हजार बालखिल्य ऋषियों की उत्पत्ति हुई। ये सभी ऊर्ध्वरेता, अँगुष्ठपर्व परिमाणवाले तथा देदीप्यमान सूर्यके समान तेजस्वी हैं ।
वसिष्ठकी पत्नी ऊर्जासे रज, गात्र, ऊर्ध्वबाहु, शरण, अनघ, सुतपा और शुक्र -ये सात पुत्र हुए । ये सभी सप्तर्षि थे।
हे हर ! उस दक्ष प्रजापतिने शरीरधारी अग्निको स्वाहा नामक पुत्री प्रदान की थी । उस स्वाहादेवीने अग्रिदेवसे पावक, पवमान तथा शुचि (पावक, पवमान और शुचि नामक तीन अग्रियाँ कही गयी हैं । उनमें विद्युत्-सम्बन्धी अग्निको ‘पावक’ तथा मन्थनसे उत्पन्न अग्रिको ‘पवमान’ कहा जाता है और जो यह सूर्य चमकता है वही ‘शुचि’(नामक) अग्नि कहलाता है- ‘पावक: पवमानश्च शुचिरग्निश्व ते त्रय:। निर्मथ्य: पवमान: स्याद् वैद्युत: पावक: स्मृतः ॥ यश्वासौ तपते सूर्य: शुचिरग्निस्त्वसौ स्मृत: । - कूर्मपुराण, पूर्वविभाग 12-14-16) नामक ओजस्वी तीन पुत्रोंको प्राप्त किया।
दक्षकन्या स्वधाने पितरोंसे मेना तथा वैतरणी नामवाली दो पुत्रियोंको जन्म दिया । वे दोनों कन्याएँ ‘ब्रह्मवादिनी’' थीं । मेनाका विवाह हिमाचलके साथ हुआ । हिमाचलने मेनासे मैनाक नामक पुत्र उत्पन्न किया था तथा गौरी (पार्वती )-नामसे प्रसिद्ध पुत्रीको उत्पन्न किया, जो पूर्वजन्ममें सती थीं ।
हे शिव! तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने अपने ही समान गुणवाले स्वायम्भुव मनुको जन्म दिया और उन्हें प्रजापालनके कार्यमें नियुक्त किया । उन्हीं ब्रह्मासे देवी शतरूपाका आविर्भाव हुआ । सर्ववैभवसम्पन्न महाराज स्वायम्भुव मनुने तपस्याके प्रभावसे परम शुद्ध तपस्विनी उस शतरूपा नामक कन्याको पत्नीरूपमें ग्रहण किया, जिससे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र तथा प्रसूति, आकूति और देवहूति नामकी तीन पुत्रियोंका जन्म हुआ । उनमेंसे मनुने आकूति नामक कन्याका विवाह प्रजापति ‘रुचि’ के साथ किया । प्रसूति तथा देवहूति क्रमश: दक्ष एवं कर्दममुनिको प्रदान की गयीं ।
रुचिसे यज्ञ और दक्षिणाका जन्म हुआ । यज्ञसे दक्षिणाके बारह पुत्र हुए, जो महाबलशाली ‘याम’ (देवगण विशेष)-के नामसे प्रसिद्ध हैं ।
दक्ष प्रजापतिने (प्रसूतिसे) चौबीस श्रेष्ठ कन्याओंकी उत्पत्ति की । उन कन्याओंमें श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, ऋद्धि और कीर्ति नामकी जो तेरह कन्याएँ थीं, उनको पत्नीके रूपमें दक्षिणाके पुत्र धर्मने स्वीकार किया । इसके बाद शेष जो ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा,स्वाहा और स्वधा नामक ग्यारह कन्याएँ थीं, उनका विवाह क्रमश: मुनिश्रेष्ठ भृगु, महादेव, मरीचि, अग्डीरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, अग्नि और पितृगणोंके साथ हुआ।
श्रद्धाने काम, लक्ष्मीने दर्प, धृतिने नियम, तुष्टिने संतोष तथा पुष्टिने लोभको उत्पन्न किया। मेधासे श्रुतका तथा क्रियासे दण्ड, लय और विनय नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ। बुद्धिने बोधको, लज्जाने विनयको, वपुने व्यवसाय एवं शान्तिने क्षेमको उत्पन्न किया। ऋद्धिसे सुख और कीर्तिसे यश उत्पन्न हुए। ये सभी धर्मके पुत्र हैं। धर्मके पुत्र कामकी पत्नीका नाम रति है, उसके पुत्रको हर्ष कहा गया है।
दक्ष प्रजापतिने किसी समय अश्वमेध - यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें रुद्र और सतीके अतिरिक्त निमन्त्रित दक्षके सभी जामाता अपनी पत्नियोंके साथ उपस्थित हुए। ऐसा देखकर बिना बुलाये ही सती भी उस यज्ञमें जा पहुँचीं, किंतु वहाँ अपने पिता दक्षके द्वारा किये गये तिरस्कारपूर्ण व्यवहारको देखकर उनसे न रहा गया और उन्होंने वहींपर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। वे ही सती पुन: हिमालयसे मेनाके गर्भमें उत्पन्न हुईं और गौरी के नामसे प्रसिद्ध होकर शम्भु की पत्नी बनीं। तदनन्तर उनसे गणेश और कार्तिकेय हुए। (सतीके देहत्यागसे) अत्यन्त क्रुद्ध महातेजस्वी भृङ्गीश्वर पिनाक पाणि भगवान् शङ्करने यज्ञका विध्वंस करके उस दक्षको यह शाप दिया कि तुम ध्रुवके वंशमें मनुष्य होकर जन्म ग्रहण करोगे।