गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
59 - ज्योतिश्चक्रमें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ - अशुभ योगों तथा मुहूर्तोंका वर्णन
श्रीसूतजीने कहा - [ऋषियो!] केशवने भगवान् शिवसे पृथिवीका परिमाण बताकर कहा कि हे रुद्र! ज्योतिष् - शास्त्रकी गणना चार लाखमें है, पर उनमेंसे मैं अब ज्योतिश्चक्र अर्थात् नक्षत्रोंसे युक्त राशिचक्रका संक्षेपसे वर्णन करूँगा, जो सब कुछ देनेवाला है।
श्रीहरिने कहा - हे शिव! कृत्तिका नक्षत्रके देवता अग्नि हैं। रोहिणी नक्षत्रके देवता ब्रह्मा हैं। मृगशिराके चन्द्रमा तथा आद्रकि रुद्र देवता कहे गये हैं। इसी प्रकार पुनर्वसुके आदित्य तथा तिष्य पुष्यके गुरु हैं। आश्लेषा नक्षत्रके सर्प तथा मघा नक्षत्रके देवता पितृगण हैं। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रके देवता भाग्य (भग), उत्तराफाल्गुनीके अर्यमा, हस्तके सविता और चित्राके देवता त्वष्टा हैं। स्वाती नक्षत्रके देवता वायु और विशाखा नक्षत्रके देवता इन्द्राग्नि हैं। अनुराधा नक्षत्रके देवता मित्र और ज्येष्ठाके शक्र (इन्द्र) देवता कहे गये हैं। नक्षत्रज्ञ विद्वानोंने मूल नक्षत्रका देवता निर्ॠतिको बताया है। पूर्वाषाढ नक्षत्रकें देवता आप तथा उत्तराषाढके विश्वेदेव हैं। अभिजित्के देवता ब्रह्मा और श्रवणके विष्णु कहे गये हैं। धनिष्ठा नक्षत्रके देवता वसु तथा शतभिषाके वरुण कहे गये हैं। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रके देवता अजपाद, उत्तराभाद्रपदके अहिर्बुध्न्य, रेवतीके पूषा, अश्विनीके अश्विनीकुमार और भरणीके यम देवता कहे गये हैं।
प्रतिपदा तथा नवमी तिथिमें ब्रह्माणी नामकी योगिनी पूर्व दिशामें अवस्थित रहती है। द्वितीया और दशमी तिथिमें माहेश्वरी नामक योगिनी उत्तर दिशामें रहती है। पञ्चमी तथा त्रयोदशी तिथिमें वाराही नामक योगिनी दक्षिण दिशामें स्थित रहती है।
षष्ठी और चतुर्दशी तिथिमें इन्द्राणी नामकी योगिनीका वास पश्चिममें होता है। सप्तमी और पौर्णमासी तिथिमें चामुण्डा नामसे अभिहित योगिनीका निवास वायुगोचर अर्थात् वायव्यकोणमें रहता है। अष्टमी तथा अमावास्यामें महालक्ष्मी नामकी योगिनी ईशानकोणमें रहती है। एकादशी एवं तृतीया तिथिमें वैष्णवी नामकी योगिनी अग्निकोणमें वास करती है। द्वादशी और चतुर्थी तिथिमें कौमारी नामवाली योगिनीका निवास नैऋत्यकोणमें रहता है। योगिनीके सम्मुख रहनेपर यात्रा नहीं करनी चाहिये।
अश्विनी, अनुराधा, रेवती, मृगशिरा, मूल, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त और ज्येष्ठा नक्षत्र प्रस्थान (यात्रा) - के लिये प्रशस्त कहे गये हैं।
हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा - ये पाँच नक्षत्र तथा उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, धनिष्ठा और पुनर्वसु नक्षत्र नवीन वस्त्र धारण करनेके लिये श्रेष्ठ हैं।
कृत्तिका, भरणी, अश्लेषा, मघा, मूल, विशाखा तथा पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ और पूर्वाफाल्गुनी - इन नक्षत्रोंको अधोमुखी कहा गया है। इन अधोमुखी नक्षत्रोंमें वापी, तडाग, सरोवर, कूप, भूमि, तृण आदिका खनन, देवालयके लिये नींवादिके खननका शुभारम्भ, भूमि आदिमें गड़ी हुई धन - सम्पत्तिकी खुदाई, ज्योतिश्चक्रका गणनारम्भ और सुवर्ण, रजत, पन्ना तथा अन्य धातुओंको प्राप्त करनेके लिये भू - खदानोंमें प्रविष्ट होना आदि अन्य अधोमुखी कार्य इन अधोमुखी नक्षत्रोंमें करने चाहिये। रेवती, अश्विनी, चित्रा, स्वाती, हस्त, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा एवं ज्येष्ठा नक्षत्र पार्श्वमुखी हैं। इन पार्श्रमुखी नक्षत्रोंमें हाथी, ऊँट, अश्व, बैल तथा भैंसेको वशमें करनेका उपाय करना चाहिये।(अर्थात् इनके नाक आदिमें छेद करके छल्ला या रस्सी डालनेका कार्य करना चाहिये।)
खेतोंमें बीज बोना, गमनागमन, चक्रयन्त्र (चरखी, चरसा, रहट आदि यन्त्र) अथवा रथ एवं नौकादिका क्रय और निर्माण उक्त पार्श्रमुखी नक्षत्रोंमें करना चाहिये और अन्य पार्श्व कार्योंको भी इन पार्श्व नक्षत्रोंमें करना चाहिये।
रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, शतभिष (वारुण) तथा श्रवण - ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुखी कहे गये हैं। इन नक्षत्रोंमें राज्याभिषेक और पट्टबन्ध आदि शुभ कार्य करवाने चाहिये। ऊर्ध्वमुखी अर्थात् अभ्युदय प्रदान करनेवाले अन्य विशिष्ट कार्योंको भी इन नक्षत्रोंमें कराना प्रशस्त होता है।
चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावास्या तथा पूर्णिमा तिथि अशुभ होती है। इन तिथियोंमें शुभ कार्य नहीं करने चाहिये। कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तथा बुधवारसे युक्त द्वितीया तिथि शुभ होती है। यदि भूमिपुत्र मंगलसे युक्त तृतीया हो, शनैश्चरको चतुर्थी हो, गुरुवारको पञ्चमी पड़ रही हो, षष्ठीको मंगल या शुक्रवार हो तो वे तिथियाँ भी शुभ होती हैं। बुधवारको सप्तमी, मंगल तथा रविवारको अष्टमी, सोमवारको नवमी और गुरुवारको पड़नेवाली दशमी तिथि शुभ होती है। एकादशी तिथिमें गुरु तथा शुक्र होनेपर, बुधवारको द्वादशी तिथि पड़नेपर, शुक्र तथा मंगलवारको त्रयोदशी और शनिवारको चतुर्दशी तिथि शुभ होती है। इसी प्रकार बृहस्पतिको पूर्णिमा या अमावास्या तिथिका होना भी शुभ होता है।
द्वादशी तिथि रविवार, एकादशी सोमवार, दशमी मंगलवार, नवमी बुधवार, अष्टमी गुरुवार, सप्तमी शुक्रवार और षष्ठी तिथि शनिवारसे दग्ध होती है। ऐसे तिथि - दग्ध - योगमें यात्रादिका शुभारम्भ नहीं करना चाहिये। प्रतिपदा, नवमी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियोंमें यदि बुधवारका संयोग हो तो उस तिथिमें प्रस्थानके विचारका दूरसे ही परित्याग करना चाहिये। मेष और कर्क - संक्रान्तिकी षष्ठी, कन्या और मिथुन - संक्रान्तिकी अष्टमी, वृष तथा कुम्भ - संक्रान्तिकी चतुर्थी, मकर और तुला - संक्रान्तिकी द्वादशी, वृश्चिक और सिंह - संक्रान्तिकी दशमी तथा धनु और मीन - संक्रान्तिकी चतुर्दशी - ये दग्ध तिथियाँ हैं। इन तिथियोंमें यात्रादि नहीं करनी चाहिये। ये कष्टदायक होती हैं।
हे शिव! रविवारको विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठाका योग, सोमवारके दिन पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ तथा श्रवण नक्षत्रका योग, मंगलवारको धनिष्ठा, शतभिष और पूर्वाभाद्रपदका योग, बुधवारमें रेवती, अश्विनी तथा भरणीका योग, बृहस्पतिवारको रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्राका योग, शुक्रवारमें पुष्य, अश्लेषा एवं मघाका योग, शनिवारको उत्तराफाल्गुनी, हस्त तथा चित्रा नक्षत्रका योग होनेपर औत्पातिक योग होता है। इन योगोंमें गमनादि कार्य करनेसे उत्पात, मृत्यु और रोगकी उत्पत्ति होती है।
हे रुद्र! रविवारको मूल, सोमवारको श्रवण, मंगलवारको उत्तराभाद्रपद, बुधवारको कृत्तिका, बृहस्पतिके दिन पुनर्वसु, शुक्रवारको पूर्वाफाल्गुनी तथा शनिवारको स्वाती नक्षत्र हो तो अमृत योग होता है। ये सभी कार्योंको सिद्ध करनेवाले हैं।
विष्कुम्भ योगकी पाँच घटी, शूल योगकी सात घटी, गण्ड तथा अतिगण्ड योगकी छ: - छ: घटी, व्याघात और वज्र योगकी नौ - नौ घटी एवं व्यतीपात, परिघ और वैधृति योग - ये मृत्युतुल्य कष्टदायी होते हैं, इनमें सभी कर्मोंका परित्याग करना चाहिये।
रविवारको हस्त, गुरुवारको पुष्य, बुधवारको अनुराधा नक्षत्र - ये शुभ होते हैं। शनिवारको रोहिणी उत्तम और सोमवारको मृगशिरा नक्षत्र शुभ है। उसी प्रकार शुक्रवारको रेवती तथा मंगलवारको अश्विनी नक्षत्र शुभ फल देता है। इस प्रकारका योग होनेपर सिद्धि योग बनता है। ये सिद्धि योग सभी प्रकारके दोषोंका विनाश करनेवाले होते हैं।
हे वृषभध्वज! शुक्रवारको भरणी, सोमवारको चित्रा, मंगलवारको उत्तराषाढ, बुधवारको धनिष्ठा, बृहस्पतिको शतभिष, शुक्रवारको रोहिणी और शनिवारको रेवती नक्षत्र होनेपर विषयोग होता है।
पुष्य, पुनर्वसु, रेवती, चित्रा, श्रवण, धनिष्ठा, हस्त, अश्विनी, मृगशिरा एवं शतभिष नक्षत्र होनेपर जातकर्म आदि संस्कार करनेके लिये उत्तम माने गये हैं।
हे शिव! विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, मघा, आर्द्रा, भरणी, अश्लेषा और कृत्तिका नक्षत्रमें यात्रा करनेपर मृत्युका भय रहता है।