45 - विविध शालग्राम शिलाओंके लक्षण

श्रीहरिने कहा - हे वृषभध्वज! अब मैं प्रसंगवश शालग्रामका लक्षण कहता हूँ। शालग्राम शिलाओंके स्पर्श मात्रसे करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। केशव, नारायण, गोविन्द तथा मधुसूदन आदि नामोंवाली विभिन्न शालग्राम शिलाएँ होती हैं, जो शंख, चक्र आदि चिह्नोंसे सुशोभित रहती हैं। इन शिलाओंके लक्षण इस प्रकार हैं -

शंख, चक्र, गदा तथा पद्मके चिह्नसे सुशोभित शिला 'केशव', पद्म, कौमोदकी (श्रीविष्णुकी गदाका नाम 'कौमोदकी' है।) गदा, चक्र तथा शंखके चिह्नसे सुशोभित शिला 'नारायण', चक्र, शंख, पद्म तथा गदाके चिहसे विभूषित शिला 'माधव' और गदा, पद्म, शंख तथा चक्रके चिह्नसे शोभायमान शिला 'गोविन्द' नामसे जानी जाती है।

पद्म, शंख, चक्र, गदासे युक्त 'विष्णु' नामकी, शंख, पद्म, गदा तथा चक्रसे युक्त 'मधुसूदन' नामकी, गदा, चक्र, शंख, पद्मसे संयुक्त 'त्रिविक्रम' नामकी, चक्र, गदा, पद्म, शंखसे चिह्नित 'वामन' नामकी, चक्र, पद्म, शंख एवं गदासे समन्वित 'श्रीधर' नामकी और पद्म, गदा, शंख, चक्रसे अंकित 'हृषीकेश' नामकी शालग्राम - मूर्ति कही गयी हैं। इन देवमूर्तियोंकों बार - बार नमन है।

पद्म, चक्र, गदा, शंख - चिह्नपूरित शालग्राम शिला 'पद्मनाभ', शंख, चक्र, गदा, पद्मयुक्त शालग्राम शिला 'दामोदर', चक्र, शंख, गदा तथा पद्मसे संयुक्त शालग्राम शिला 'वासुदेव', शंख, पद्म, चक्र, गदा - चिह्नसे समन्वित शालग्राम शिला 'संकर्षण', शंख, गदा, पद्म, चक्रसे सुशोभित शालग्राम शिला 'प्रद्युम्न' तथा गदा, शंख, पद्म और चक्रसे शोभित शालग्राम शिला 'अनिरुद्ध' नामसे अभिहित है। इन्हें बारम्बार प्रणाम है।

पद्म, शंख, गदा, चक्रके चिह्नसे विभूषित 'पुरुषोत्तम' नामकी, गदा, शंख, चक्र, पद्म - चिह्नसे विभूषित 'अधोक्षज' नामकी, पद्म, गदा, शंख, चक्रसे विभूषित 'नृसिंह' नामकी, पद्म, चक्र, शंख, गदासे अंकित 'अच्युत' नामकी और शंख, चक्र, पद्म, गदासे संयुक्त 'जनार्दन' की शालग्राम - मूर्ति है - इन देवनामोंसे अभिहित मूर्तियोंको नमस्कार है।

गदा, चक्र, पद्म, शंखसे अंकित शालग्राम 'उपेन्द्र', चक्र, पद्म, गदा, शंखसे युक्त शालग्राम 'हरि', गदा, पद्म, चक्र, शंख - चिह्न से शोभित शालग्राम 'श्रीकृष्ण' नामसे प्रसिद्ध हैं और शालग्राम शिलाके द्वारदेशपर चिह्नित दो चक्र धारण करनेवाले, शुक्लवर्ण वाले भगवान्‌ वासुदेव हैं। इन सभी रूपों एवं नामोंको धारण करनेवाले हे गदाधर भगवान्‌ विष्णु! हम सबकी आप रक्षा करें।

दो चक्रोंसे युक्त, रक्त आभावाली और पूर्वभागमें पद्म - चिह्नसे अंकित शालग्राम शिला 'संकर्षण' की मूर्ति होती है, किंतु छोटे - छोटे चक्रोंवाली तथा पीतवर्णकी होनेपर वह शिला 'प्रद्युम्न' कही जाती है। यदि शालग्राम शिला बड़ी तथा छिद्रसे संयुक्त शिरोभागवाली और वर्तुलाकार हो तो उसे 'अनिरुद्ध' नामक शालग्राम - मूर्ति कहते हैं। जो द्वारमुखपर नीलवर्णकी तीन रेखाओंसे युक्त होती है और जिसका शेष सम्पूर्ण भाग कृष्णवर्णसे सुशोभित रहता है, वह शालग्राम शिला 'नारायण'

शिलाके नामसे जानी जाती है।

जिस शिलाके मध्यमें गदाके समान रेखा हो, यथास्थान नाभिचक्र उन्नत हो तथा वक्ष:स्थल विस्तृत हो, वह 'नृसिंह' नामवाली शालग्राम शिला है और इन चिह्नोंके साथ ही उसमें तीन विन्दु अथवा पाँच विन्दु हों तो वह 'कपिल' नामक शिला है, वह शिला हम सबकी रक्षा करे। उसका पूजन ब्रह्मचारियोंको करना चाहिये। विषम परिमाणवाले दो चक्रोंसे चिह्नित शक्ति - चिह्नसे युक्त शिलाको 'वाराह' शिला कहते हैं। वह हम सबकी रक्षा करे। नीलवर्णवाली, तीन रेखाओंसे युत्तू स्थूल तथा विन्दुयुत्तू शिला 'कूर्ममूर्ति' है और वही अगर वर्तुलाकार है तथा उसका पीछेका भाग झुका हुआ हो तो वह शिला 'कृष्ण' कही गयी है, वह हम सबकी रक्षा करे। पाँच रेखावाली शिला 'श्रीधर' नामकी कही जाती है। गदासे अंकित शिला 'वनमाली' है - ये हम सबकी रक्षा करें। गोलाकार तथा छोटी शिला 'वामन' शिला है, बायें भागमें चक्रांकित शिला 'सुरेश्वर' की मूर्ति है। विभिन्न रंगोंवाली, अनेक रूपोंवाली, नागके समान 'फणोंसे युत्तू शिला 'अनन्तक' है। स्थूल हो, नीलवर्णकी हो और मध्यमें नीलवर्णका चक्र हो तो वह 'दामोदर' - शिला है। संकुचित द्वारवाली, रत्तूवर्णवाली, लम्बी रेखाओंवाली, छिद्रयुक्त, एक चक्र तथा एक कमलवाली विस्तीर्ण शिला 'ब्रह्मशिला' है, ये सब हम सबकी रक्षा करें। विस्तृत छिद्रवाली तथा स्थूल चक्रवाली शिला 'कृष्णशिला' तथा बिल्वाकार शिला 'विष्णुशिला' है। अंकुशके आकारवाली, पाँच रेखाओंवाली तथा कौस्तुभ - चिह्नसे युत्तू शिला 'हयग्रीव' शिला है। एक चक्र तथा एक कमलसे अंकित, मणि तथा रत्नोंकी आभासे युक्त कृष्णवर्णकी शिला 'वैकुण्ठ' शिला और द्वारपर रेखावाली, विस्तृत कमलसदृश शिला 'मत्स्यशिला' है - ये हम सबकी रक्षा करें। दाहिनी ओर रेखायुत्तू, श्यामवर्णसे समन्वित, रामचक्रसे अंकित 'त्रिविक्रम' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे। द्वारकामें स्थित, शालग्राममें निवास करनेवाले गदाधारी भगवान्‌को नमस्कार है। एक द्वारवाली, चार चक्रोंसे युत्तू, वनमालासे विभूषित, स्वर्णरेखासमन्वित, गोपदसे सुशोभित तथा कदम्बके पुष्पकी आकृतिवाली 'लक्ष्मीनारायण' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे।

एक चक्रवाले शालग्रामको 'सुदर्शन' कहते हैं, उनके रूपमें वे गदाधारी श्रीविष्णु हम सबकी रक्षा करें। दो चक्र होनेसे शालग्रामशिलाकी 'लक्ष्मीनारायण' संज्ञा होती है। जिसमें तीन चक्र हैं, वह(शिला) 'त्रिविक्रम' की मूर्ति है, चार चक्रवाली चतुर्व्यूह, पाँच चक्रवाली 'वासुदेव', छः चक्रवाली शालग्रामशिला 'प्रद्यम्न', सात चक्रवाली शिला 'संकर्षण', आठ चक्रवाली 'पुरुषोत्तम', नव चक्रवाली शिला 'नवव्यूह', दस चक्रवाली 'दशावतार' तथा ग्यारह चक्रवाली शिला 'अनिरुद्ध' कहलाती है - ये हम सबकी रक्षा करें। बारह चक्रोंसे युत्तू शिला 'द्वादशात्मा' है। बारहसे अधिक चक्रकी शिला 'अनन्त' नामवाली है।

जो मनुष्य इस विष्णुमूर्तिमय स्तोत्रका पाठ करता है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।