169 - पदार्थोंके गुण - दोष और औषधि - सेवनमें अनुपानका महत्त्व

धन्वन्तरिजीने कहा - [हे सुश्रुत!] अब मैं शरीरके लिये हितकारी एवं अहितकारी ज्ञान प्रदान करनेके निमित्त अनुपान - विधिका वर्णन करता हूँ, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनिये।

लाल साठी चाव (च०सू०अ० 27 , सु०सू०अ० 46 , अ०सं० सू०।० 712 , च०सू०अ०25) ल वात - पित्त एवं कफजन्य त्रिदोषोंका विनाशक तथा तृष्णा और मेदाको दूर करनेवाला है। महाशालि अत्यन्त शक्तिशाली होता है। कलम अर्थात्‌ धिक पानीमें होनेवाला जड़हनी चावल कफ तथा पित्तके दोषका शमन करता है। सफेद साठी चावल प्राय: शीतल, भारी और वात, पित्त एवं कफ - इन तीनों दोषोंकों दूर करता है।

श्यामाक अर्थात्‌ साँवाँ शरीरशोषक, रूक्ष, वातदोषोत्पादक, कफ तथा पित्तजनित दोषका निवारक है। उसी प्रकार प्रियंगु, नीवार और कोदो नामक अन्न भी शरीरके दोषोंको दूर करते हैं। यव (जौ) शीतल, कफ और पित्तज दोषका अपहारक होता है। गेहूँ शक्तिशाली, शीतल, भारी, मधुर और वातनाशक होता है। मूँग कफ, पित्त तथा रक्तको जीतनेवाला, कषाय, मधुर और लघु होता है। उड़द अत्यन्त शक्तिशाली, ओज - वृद्धि करनेवाला, पित्त - कफ - विनाशक तथा भारी होता है। राजमाष अर्थात्‌ राजमा शुक्रनाशक, पित्तश्लेष्पकारक और वायुरोगका अपहारक है।

कुलथी(अ० ह० सू० अ० 618) प्राणीके श्वास, हिचकी, शुक्राश्मरी, हृदयस्थ कफ, गुल्म एवं वात - दोषको दूर करनेमें समर्थ होती है। मकुष्ठक अर्थात्‌ मकुनी रक्त, पित्त तथा ज्वरको दूर करनेवाला, शीतल और ग्राह्य है। चना पुरुषत्व, रक्त, कफ और पित्तका अपहर्ता तथा वात - दोषका वर्धक माना जाता है। मसूर मधुर, शीतल, संग्राही और कफ तथा पित्तका निवारक है। मसूर - जैसे ही सभी गुणोंकी अधिकता कलाय (मटर) - में भी होती है - यह अधिक वायुवर्धक होता है। अरहर कफ तथा पित्त - विनाशक और शुक्रवर्धक है। अलसी पित्त - वृद्धिकारक और सरसों कफ तथा वायुके दोषका निवारक है।

तिल (अ०हृ०सू० अ० 621) क्षार, मधुर और स्निग्ध - गुणसे युक्त होता है। यह बलवर्धक, उष्ण तथा पित्तकारक भी है। अन्य विभिन्न प्रकारके अन्नोंकी जो प्रजातियाँ हैं, वे बलनाशक, रूक्ष और शीतल होती हैं।

चित्रक, इंगुदी (हिंगोट), कमलनाल, पिप्पली, मधु, सहिजन, चव्याचरण (गजपिप्पली), निर्गुण्डी, तर्कारी (जयन्ती), काशमर्दक और बिल्व - ये कफ - पित्त तथा कृमिनाशक, लघु और जठराग्निको उद्दीप्त करते हैं। वर्षाभू (पुनर्नवा) तथा मार्कर (मकरा) वात और कफ - दोषका विनाश करते हैं। एरण्ड तिक्त और रसयुक्त एवं काकमाची (मकोय) त्रिदोषनाशक होता है। चांगेरी कफ और वातविनाशक है। सरसों सभी दोषोंसे युक्त होता है। सरसोंके समान कुसुम्भ (बर्रै) भी होता है। राजिका (काला सरसों) वात और पित्तको बढ़ानेवाला है। नाडीच कफ - पित्त - विनाशक तथा चुचु (पालकीकी जातिका एक शाक) मधुर और शीतल होता है। कमल - पत्र सभी दोषोंका हन्ता और त्रिपुट (मटरकी एक जाति) अत्यन्त वातकारक है। वास्तुक अर्थात्‌ बथुआ क्षारयुक्त, अतिशय रुचिकारक और कृमिनाशक होता है। इसमें सभी दोषोंको विनष्ट करनेकी क्षमता होती है।

तण्डुलीय (चौलाई) - का शाक विषनाशक होता है। पालक तथा अन्य इसी प्रकारके शाकोंमें भी यह गुण रहता है। मूलक (मूली) आम - दोषका उत्पादक तथा वात - कफनाशक है। जब यह शाक अग्निपर पक जाता है तो सभी दोषोंको दूर करनेमें समर्थ तथा हृदय और कण्ठको प्रिय होता है। कर्कोटक (ककड़ी ), बैगन, परवल और करैला कुष्ठ, मेह, ज्वर, श्वास, कास, पित्त तथा कफके नाशक हैं। कुम्हड़ा सर्वदोषविनाशक, वस्तिशोधक और स्वादयुक्त होता है। कलिंगा (तरबूज) और अलाबुनी (लौकी) पित्त विनाशिनी और वातकारिणी होती है। त्रपुष (खीरा) तथा उर्वारुक (ककड़ी - फूट) वात और कफ बढ़ानेवाली तथा पित्त - दोषको दूर करनेवाली है।

वृक्षाम्ल (अमलवेंत) और जम्बीर (नीबू) कफ तथा वात - दोष - निवारक हैं। दाडिम वात - दोषका नाशक तथा स्वादिष्ट होता है। नारंगीके फलमें भारीपनका दोष रहता है। केशर और मातुलुंग (बिजौरा नीबू) कफ - वात - विनाशक एवं जठराग्निको प्रदीप्त करते हैं। माष (उड़द) वात और पित्तका नाशक होता है। इसके सेवनसे त्वचाभागमें स्निग्धवा आती है और शरीरके अंदर विद्यमान उष्णता तथा वात - दोष विनष्ट हो जाता है। आँवला बलकारी, मधुर, रोचक और अम्लरससे युक्त होता है। हरीतकी (हर्रै) भोजनको भली प्रकारसे पचानेवाली, पुण्यदायिनी अमृतके समान तथा कफ और वात - दोषको दूर करनेमें समर्थ एवं विरेचक है। बहेड़ा भी उसी प्रकारका होता है। इसमें वात, पित्त और कफ - इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करनेकी क्षमता होती है। तिन्तिडी (सु० सू० 46 , च० सू० 27) (इमली) - फल वात तथा कफका विनाशक, अम्लरससे युक्त और विरेचक होता है।

लकुच अर्थात्‌ बड़हल दोषोत्पादक तथा स्वादयुक्त, बकुल कफ - वात - विनाशक, बीजपूरक (बिजौरा नीबू) गुल्म, वात, कफ, श्वास और कासरोगोंका नाशक है। कपित्थ (कैथ) ग्राह्य तथा सभी दोषोंका हरण करनेवाला होता है। पकनेपर यह भारी एवं विषको दूर करनेवाला होता है। पकनेके पूर्व अपने बाल्यकालमें यह कफ और पित्तको उत्पन्न करता है। उसके बाद प्रौढावस्थामें यह पित्तवर्धक है।

पका हुआ आम(सु० सू० 46 , च० सू० 27 भा० प्र०। )वात - दोषको उत्पन्न करनेवाला तथा मांस, वीर्य, वर्ण और शक्तिको बढ़ानेवाला होता है। जामुन वात, पित्त और कफका विनाशक तथा विष्टम्भ - दोषका उत्पादक होता है। तिन्दुक कफ - वातका नाशक और बेर वात तथा पित्तदोषको दूर करता है। बिल्व विष्टम्भ - दोषमें वात - दोषको बढ़ानेवाला है। प्रियाल (चिरौंजी) वातज दोषका नाशक है। राजादन (खिरनी), मोच (केला), कटहल और नारियल स्वादयुक्त, स्निग्ध तथा भारी होते हैं। ये सभी वीर्य और मांसके अभिवर्धक कहे जाते हैं।

द्राक्षा ( अंगूर), मधूक (महुआ), खर्जूर (खजूर) तथा कुंकुम वात और रक्त - दोषको जीतनेवाले होते हैं। मागधी (पिप्पली) माधुर्य - गुणसे युक्त होती है। यह पकनेपर श्वास तथा पित्त - दोषको दूर करेमें श्रेष्ठ है। आर्द्रक ( अदरक) रोचक, पुष्टिकारक, अग्निदीपक तथा कफ और वात - विनाशक होता है। सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च कफ तथा वात - दोषको जीतनेवाले माने गये हैं। लाल मिर्च शरीरको पौष्टिक तत्त्व देनेमें असमर्थ होता है, ऐसा वैद्यक - शास्त्रका मत है। हींग गुल्म, शूल तथा मलावरोधको दूर करनेवाली और वात तथा कफकी विनाशिनी है।

यमानी, धनिया और अजाघृत वात तथा कफज दोषको दूर करनेमें विशेष रूपसे गुणकारी हैं। सेंधा नमक नेत्रज्योतिवर्धक, पुष्टिकाकक और वात - पित्त तथा कफ - इन तीनों दोषोंका शमन करनेवाला माना गया है। सौवर्चल अर्थात्‌ काला नमक वायु - अवरोधका विनाशक, उष्ण और हृदय - शूलका शामक है। विडंग उष्ण, तीक्ष्ण, शूलनाशक तथा वातदोषका अपहारक है। रोमक लवण वातवर्धक, स्वादिष्ठ, रोचक, गलानेवाला और भारी होता है।

इसके द्वारा हृदय - रोग, पाण्डु और गलेका दोष दूर हो जाता है। यवक्षार अग्निदीपक है। सर्जिक्षार (रेह) पाचक, अग्निदीपक, तीक्ष्ण और विदारक होता है।

वर्षाका जल तीनों दोषोंका नाशक, लघु, स्वादिष्ठ विषापहारक है। नदीका जल वातवर्धक, रूक्ष, सरस, मधुर और लघु होता है। वापीका जल वात - कफ - विनाशक तथा पोखरका जल वातवर्धक माना गया है। झरनेका जल रुचिकर, अग्निदीपक, रूक्ष, कफनाशक और लघु होता है। कुएँका जल अग्निदीपक, पित्तवर्धक तथा उद्भिज (पातालतोड़ कुआँ) - का जल पित्तविनाशक है। यह जल दिनमें सूर्य - किरण और रात्रिमें चन्द्र - किरणसे सम्पृक्त होकर सभी दोषोंसे विमुक्त हो जाता है। इसकी तुलना तो आकाशसे गिरनेवाले जलसे ही की जा सकती है।

गरम जल ज्वर, श्वास, मेदा - दोष तथा वात और कफ- विनाशक है। जलको गर्म करके ठंडा करनेके पश्चात्‌ वह प्राणीके वात - पित्त तथा कफ - इन तीनों दोषोंका विनाश करता है, किंतु बासी हो जानेपर वही जल दोषयुक्त हो जाता है।

गोदुग्ध वात और पित्तका विनाशक, स्तिग्ध और गुरुपाकी रसायन है। भैंसका दूध गोदुग्धकी अपेक्षा अत्यधिक भारी, स्निग्ध तथा मन्दाग्नि - दोषका उत्पादक होता है। बकरीका दूध रक्तातिसार, कास, श्वास तथा कफका अपहारक है। स्त्रियोंका दूध नेत्रोंकी ज्योतिको तीव्र करनेवाला, जीवनस्वरूप और रक्त - पित्त - विनाशक है।

दही परम गुणकारी होता है। यह वात - दोषको दूर करनेवाला पौष्टिक तथा पित्त एवं कफका वर्धक है। मट्टा तीनों दोषोंका नाशक और उसकी मही (छाछ) रक्तादिक स्रोतोंका शोधक होता है। नया निकाला गया नवनीत (मक्खन) ग्रहणी - बवासीर और अर्दित रोगजन्य पीड़ाका अपहारक है। दूधके किलाट (दुग्धविकार विशेष) आदि विकार भारी तथा कुष्ठरोगके कारण हैं। प्राचीन विद्वान्‌ तक्रको ग्रहणी, शोथ, बवासीर, पाण्डुरोग, अतिसार और गुल्मरोगका विनाशक तथा वात - पित्त एवं कफजन्य त्रिदोषका उत्तम शामक मानते हैं।

घृत पौष्टिक, मधुर और वात - पित्त तथा कफका अपहारक होता है। गोघृत बुद्धिवर्धक और नेत्रज्योति - प्रदायक है। अग्निपर तप्त करनेके बाद तो यह तीनों दोषोंको दूर करनेमें पूर्ण समर्थ हो जाता है। संस्कृत घृतसे अपस्मार - रोगमें होनेवाले उन्माद तथा मूर्च्छाजनित दोष दूर हो जाते हैं। बकरी और भेंड आदिसे प्राप्त होनेवाला घृत भी गोदुग्धसे तैयार होनेवाले घृतके समान ही गुणकारी होता है। ये घृत कफ तथा वात - विनाशक और मूत्रदोषके अपहर्ता तथा सभी प्रकारके कृमि और विषजनित दोषोंके निवारक हैं।

तिलका तेल बलशाली, केशमें लगाने लायक, वात और कफका विनाशक, पाण्डुत्व, उदररोग, कुष्ठ, अर्श, शोथ, गुल्म तथा प्रमेह-रोगका नाशक होता है। सरसोंका तेल कृमि और पाण्डुरोगको दूर करनेवाला तथा कफ, मेदा और वात - दोषका भी नाशक है। अलसीका तेल नेत्रशक्तिको हानि पहुँचानेवाला तथा वात और पित्तका विनाशक है। बहेड़ेका तेल कफ - पित्तको दूर करनेवाला, केशवर्धक, त्वक्‌ और कर्णदोषका निवारक होता है। इसे त्रिदोषका शमन करनेवाला, मधुर और वातवर्धक कहा जाता है। इसके प्रयोगसे हिचकी, श्वास, कृमि, छर्दि, मेह, तृष्णा और विष - दोष भी दूर हो जाते हैं।

‘इक्षुरस’ रक्त और पित्त - दोषनाशक, बलप्रद, पौष्टिक तथा कफवर्धक होता है। इस रसका दूध - मिश्रित बना हुआ सिखरन पित्तवर्धक, उसकी मदिरा तीव्र (उत्तेजक) तथा शर्करा मछलीके अंडेके समान श्वेत और हल्की होती है। इसकी खाँड पौष्टिक, स्निग्ध, स्वादिष्ठ तथा रक्त - पित्त और वात - दोषपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ होती है। गुड़ वात - पित्तहर्ता, रूक्ष तथा कफवर्धक होता है। यह पित्त - विनाशक तो है ही, जो गुड़ पुराना हो गया है, वह अधिक प्रशस्त और पथ्य है। इसके सेवनसे रक्तकी शुद्धि हो जाती है। गुड़ और शर्करा दोनों रक्त एवं पित्त - दोषके अपहर्ता, पौष्टिक तथा स्नेहयुक्त होते हैं। इसकी मदिरा सब प्रकारसे पित्त - दोषको उत्पन्न करनेवाली तथा अपनी अम्लताके कारण कफ और वात - दोषको दूर करनेवाली है।

सौवीर प्रान्तमें प्राप्त होनेवाली सभी प्रकारकी मदिराएँ रक्त - पित्तकारक तथा तीक्ष्ण गुणवाली होती हैं।

माँड़ और भूना हुआ चावल पथ्य है, यह अग्निदीपक और पाचक होता है। तक्रके साथ दाडिम, त्रिकटु, गुड़, मधु तथा पिप्पलीके मिश्रणसे तैयार किया गया पेय पदार्थ वात - दोष - विनाशक,लघु और वस्तिभागका शोधक है, किंतु मनुष्यको इस सुन्दर पेयका परित्याग कर देना चाहिये, जो कास, श्वास और नाड़ी - रोगको बल प्रदान करनेवाला है।

पायस अर्थात्‌ खीर कफोत्पादक तथा बलवर्धक होता है। खिचड़ी वातनाशक है। सुधौत अर्थात्‌ दालका सूप स्निग्ध, उष्ण, लघु और रुचिकर होता है। कन्द, मूल और फलसे तैयार किया गया सूप भारी और पाचक माना गया है। कुछ उष्ण सेवन करनेसे वह सूप हल्का हो जाता है और यथाशीघ्र पच जाता है। शाकको उबालकर उसे निचोड़ना चाहिये। तदनन्तर उसको घृत या तेलसे संस्कारित करके प्रयोग करना हितकारी होता है।

दाडिम तथा आँवलेसे तैयार किया गया सूप हृदयको प्रिय अग्निवर्धक और वात - पित्त - विनाशक होता है। मूलीसे बनाये गये सूपके द्वारा ध्रास, कास, प्रतिश्याय तथा कफज दोष दूर हो जाते हैं। यव, कोल और कुलथीका रस सुस्वादु तथा वात - विनाशक होता है। मूँग तथा आँवलेसे तैयार हुआ सूप ग्राह्य है। यह कफ और पित्तका विनाश करनेवाला है।

गुड़मिश्रित दही वातनाशक होता है। सभी प्रकारके सत्तू रूक्ष एवं वातवर्धक होते हैं। पूड़ी पौष्टिक और पाचनमें भारी होती है। मांसयुक्त भोजन बृंहण और भक्ष्यपिष्टक (चावल एवं दाल आदिको पीसकर बनाया पीठा) भारी माना जाता है। तेलमें तलकर तैयार किये गये पिष्टक दृष्टिनाशक हैं। अत्यन्त उष्ण मण्डक पथ्य है। शीतल होनेपर इसे भारी माना जाता है।

उक्त द्रव्य - पदार्थोंके गुणावगुणका विवेचन करके ही मनुष्यको अनुपानकी व्यवस्था करनी चाहिये। अनुपानके साथ औषधका सेवन करनेसे श्रम और तृष्णाका नाश स्वत: ही हो जाता है। यथोचित अन्नपान आदि करनेसे प्राणीमें कोई रोग नहीं होता। वह सभी रोगोंसे विमुक्त हो जाता है।

विष उष्णतारहित तथा मोरके कण्ठके समान नीले वर्णका होता है। वह प्राणीके नैसर्गिक वर्णको परिवर्तित कर देता है। इसका गन्ध, स्पर्श और रस तीव्र होता है। यह खानेवाले व्यक्तिके मनको व्यथित कर देता है। इसे सूँघनेपर नेत्ररोग उत्पन्न हो जाता है। श्रेष्ठ वैद्योंके द्वारा भी इसका शमन अत्यन्त कठिन है। कम्पन तथा जँभाई आदि इसके लक्षण हैं।