गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
237 - भगवद्भक्ति निरूपण तथा भक्तोंकी महिमा
सूतजीने कहा - अब मैं विष्णु भक्तिका वर्णन करूँगा, जिससे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। भगवान् विष्णु भक्तिसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना अन्य किसी साधनसे नहीं। भगवान् हरिका निरन्तर स्मरण करना मनुष्योंके लिये महान् श्रेयका मूल है। यह पुण्योंकी उत्पत्तिका साधन है और जीवनका मधुर फल है -
यथा भक्त्या हरिस्तुष्येत् तथा नान्येन केनचित्॥
महतः श्रेयसो मूलं प्रसव: पुण्यसंतते:।
जीवितस्य फलं स्वादु नियतं स्मरणं हरे:॥
इसलिये विद्वानोंने विष्णुकी सेवाको भक्तिका बहुत बड़ा साधन कहा है। भगवान् त्रिलोकीनाथ विष्णुके नाम तथा कर्मादिके कीर्तनमें तन्मय होकर जो लोग प्रसन्नताके आँसू बहाते हैं और रोमानचित होकर गद्गद हो उठते हैं, वे ही उनके भक्त हैं -
ते भक्ता लोकनाथस्य नामकर्मादिकीर्तने॥
मुञ्चन्त्यश्रूणि संहर्षाद्ये प्रहृष्टतनूरुहा:।
अत: हम सभीको जगत्स्रष्टा देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके दिव्य उपदेशोंका अनुसरण करना चाहिये। वे ही वैष्णव हैं, जो वेद - शास्त्रोंके अनुसार अवश्यकरणीय नित्य - कर्मोंका पालन करते हुए श्री विष्णुके प्रति अति स्निग्ध रहते हैं तथा भक्ति प्रवणताके कारण अद्वैत भावसे स्वयंको पृथक्कर जिन नामोंका स्मरण स्वयं भगवान् भी करते हैं, उन मङ्गलमय नामोंका श्रवण - कीर्तन करनेके साथ स्वामि - सेवक भावसे सदा भगवान् श्री विष्णुको प्रणाम किया करते हैं। वे ही महा भागवत हैं, जो श्रीविष्णुके भक्तजनोंके प्रति वात्सल्यभाव रखते हैं तथा श्रीविष्णुके पूजन एवं उनकी आज्ञाका अनुसरण करते हैं। भगवान् श्रीविष्णुकी मङ्गलमयी कथाओंके श्रवणमें ही अतिशय प्रीति पूर्वक सदा लीन रहते हैं तथा अपने नेत्र आदि समस्त अंगोंकी समस्त चेष्टाएँ भगवान्की सेवाके लिये ही समर्पित किये रहते हैं। संक्षेपमें यह समझना चाहिये कि जो लोग पूर्ण समर्पणभावसे श्रीविष्णुकी भक्तिमें ही अपने मनको निरन्तर एकाग्र रखते हैं, वे ही परम भागवत हैं। इन परम महा भागवत लोगोंका मुख्य लक्षण यह है कि ये लोग ब्राह्मणोंमें ही श्री विष्णुका सदा निवास मानकर उनकी सेवामें सदा लगे रहते हैं। ये लोग अपने समस्त साधनोंको भी श्रीविष्णुके चरणोंमें ही समर्पित किये रहते हैं। श्रीविष्णुकी सेवाके लिये ही सांसारिक संगोंसे दूर रहते हैं। श्रीविष्णुको ही अपना एकमात्र आश्रय मानकर उन्हींकी अर्चामें सदा तत्पर रहते हैं।
(प्रणाम पूर्वक॑ भक्त्या यो वदेद्वैष्णवो हि स:।
तद्भक्त जनवात्सल्यं पूजनं चानुमोदनम्॥
तत्कथाश्रवणे प्रीतिरश्रुनेत्राङ्गविक्रिया:।
येन सर्वात्मना विष्णौ भक्त्या भावो निवेशित:॥
विप्रेभ्यश्च कृतात्मत्वान्महाभागवतो हि सः।
विश्वोपकरणं नित्यं तदर्थं सङ्गवर्जनम्।
स्वयमभ्यर्चनं चैव यो विष्णुं चोपजीवति॥)
वैष्णव या महाभागवत जिस श्रीविष्णु भक्तिको अपना सर्वस्व मानते हैं, वह (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य तथा सख्य - भेदसे) आठ प्रकारकी होती है। इसमें म्लेच्छ व्यक्ति भी अधिकारी माना गया है। इस संसारमें तो वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है, वही मुनि है, वही ऐश्वर्यसे सम्पन्न है और वही मोक्षको प्राप्त करता है, जो भगवान् हरिकी भक्तिमें तन्मय रहता है। जो भगवद्भक्त है, उसीको दान देना चाहिये, उसीसे दान लेना चाहिये, उसीकी हरिकी भाँति पूजा करनी चाहिये। भगवद्भक्त द्विजोत्तमका स्मरण कर, उनके साथ भाषण कर, उनका पूजन कर हम अपनेको पवित्र कर लेते हैं। यदि कोई भगवद्भक्त चाण्डाल जातिका है तो वह भी अपनी पवित्र भक्तिकी महिमासे हम सबको पवित्र कर देता है।
(भक्तिरष्टविधा ह्योषा यस्मिन् म्लेच्छोऽपि वर्तते।
स विप्रेन्द्रो मुनि: श्रीमान् स याति परमां गतिम्॥
तस्मै देयं ततो ग्राह्यां स च पूज्यो यथा हरि।
स्मृत: सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तम:॥
पुनाति भगवद्धक्तश्चण्डालोऽपि यदृच्छया॥)
‘हे नाथ! आप मुझपर दया करें, मैं आपकी शरणमें हूँ’ऐसा जो प्राणी कहता है, उसको भगवान् हरि सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देते हैं, किसीसे भी उसको भय नहीं होता, यह भगवान्की प्रतिज्ञा है -
दयां कुरु प्रपन्नाय तवास्मीति च यो वदेत्।
अभयं सर्वभूतेभ्यो दद्यादेतद् व्रतं हरेः॥
मन्त्रका जप करनेवाले हजार जपकर्ताओंकी अपेक्षा सभी वेदान्तदर्शनों, शास्त्रोंमें पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ है। सर्ववेदान्तनिष्णात करोड़ों विद्वानोंकी अपेक्षा विष्णुभक्त श्रेष्ठ है। जो लोग भगवान् विष्णुमें ऐकान्तिक भक्ति रखते हैं, वे सशरीर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त करनेमें सफल हो जाते हैं। श्रीविष्णु भक्तिको ही परम पुरुषार्थ माननेवाले एकान्ती भक्त हैं। इनका चित्त सर्वात्मना भागवत होता है। ऐसे परम भागवत श्रीविष्णुके ही समान हो जाते हैं, किंबहुना, श्रीविष्णु ऐसे परम भागवत भक्तोंके परायण (सर्वथा अभिन्न) रहते हैं। ये परम भागवत भक्त देवदेव श्रीविष्णुके परम प्रिय लोगोंसे भी अधिक सुप्रिय होते हैं। इनकी भक्ति अव्यभिचारिणी(नितान्त सुदृढ़) होती है। इसीलिये कठिन - से - कठिन आपत्कालमें भी यह भक्ति सुस्थिर रहती है। ये परम भागवत भक्त सदा यही प्रार्थना करते रहते हैं -’प्रभो! विष्णो! विषयोंमें जो अधिकाधिक स्थिर प्रीति होती है, वही आपका स्मरण करते हुए मुझमें सदा अविचल - भावसे बनी रहे।’ यह विशेष रूपमें ध्यातव्य है कि प्रभु श्रीविष्णुकी ही भक्ति करनी चाहिये। यदि कोई अन्य किसीके प्रति दृढ़ भक्त है, सर्वेश्वर प्रभुका भक्त नहीं है तो वेदादि समस्त शास्त्रोंके अर्थका पारङ्गत होनेपर भी वह वास्तवमें पुरुषाधम ही है। जिसने वेद या अन्य शास्त्रोंका अध्ययन नहीं किया है, जो यज्ञादिक पुण्यकर्मोंको अपने जीवनमें सम्पन्न करनेसे वश्चित रह गया है, वह भी यदि भगवान् विष्णुमें भक्ति रखता है तो (समझना चाहिये कि)उसने सब कुछ कर लिया है। जो लोग याज्ञिक हैं, अश्वमेध, राजसूयादिक मुख्य यज्ञोंको करनेवाले हैं और वेदोंके पारंगत हैं, वे मुनिसत्तम (मुनिश्रेष्ठ) भी उस परमगतिको प्राप्त नहीं कर पाते, जिस परमगतिको विष्णुभक्त अपनी भत्तिसे प्राप्त कर लेते हैं। इस संसारमें जो मनुष्य निर्दयी हैं, दुष्टात्मा हैं तथा दुराचारमें लगे रहते हैं, वे भी यदि भगवान विष्णु नारायणकी भक्तिमें संलग्न हों तो उन्हें परमगतिकी प्राप्ति होती है। जब मनुष्यकी भक्ति भगवान् जनार्दनके प्रति अचल और दृढ़ हो जाती है, तब उसके लिये स्वर्गका सुख कितना महत्त्व रखता है। वह भक्ति ही उसके लिये मुक्ति है। हे शौनक! इस संसारके दुर्गम कर्म मार्गमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंके लिये भक्ति ही एकमात्र अवलम्ब है, जिसके करनेसे जनार्दन संतुष्ट होते हैं। जो मनुष्य देवाधिदेव विष्णुके दिव्य गुणोंको नहीं सुनता, वह बहरा है और सभी धर्मोंसे बहिष्कृत है। हरिनाम - संकीर्तनसे जिस व्यक्तिका शरीर रोमानञ्चित नहीं हुआ, उसका वह शरीर मृतकके समान है। हे द्विजश्रेष्ठ! जिसके अन्त: करणमें विष्णु भक्ति विद्यमान रहती है, उसे यथाशीघ्र ही इस संसारके आवागमन - चक्रसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। जिन मनुष्योंका मन हरिभक्तिमें रमा हुआ है, उनके सभी पापोंका विनाश सब प्रकारसे निश्चित है।
हाथमें पाश लेकर खड़े हुए अपने दूतको देखकर यमराज उसके कानमें कहते हैं कि हे दूत! तुम उन लोगोंको छोड़ देना जो मधुसूदन विष्णुके भक्त हैं। मैं तो अन्य दुराचारी और पापियोंका स्वामी हूँ, वैष्णवोंके स्वामी स्वयं हरि हैं श्रीविष्णुने स्वयं कहा है कि यदि दुराचारी व्यक्ति भी मुझमें अनन्य भक्ति रखता है तो वह साधु ही है; क्योंकि उसने भक्तिका निश्चय कर लिया है कि श्रीविष्णुकी भक्तिके समान अन्य कुछ भी नहीं है। निश्चय पूर्वक भगवान्की भक्तिमें अनन्य भावसे लगा हुआ व्यक्ति तुरंत धर्मात्मा हो जाता है और उसको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है। हे द्विजश्रेष्ठ! आप ऐसा निश्चित ही जान लें कि विष्णु भक्तका कभी विनाश नहीं होता। समस्त संसारके मूल कारण भगवान् हरिमें जिस मनुष्यकी भक्ति स्थिर रहती है, उसके लिये धर्म, अर्थ और काम - इस त्रिवर्गका कोई महत्त्व नहीं है; क्योंकि परम सुखरूप मुक्ति ही उसके हाथमें सदा रहती है। यह जो हरिकी त्रिगुणात्मिका दैवी माया है, उसको वे लोग पार करते हैं जो हरिकी शरणमें जाते हैं। जिनकी बुद्धिमें भगवान् हरि निवास करते हैं, उनके लिये यज्ञारधन आदिसे क्या लाभ? भक्तिसे ही नारायणकी आराधना होती है। भक्तिके अतिरिक्त उनकी आराधनाके लिये अन्य कोई साधन नहीं है। विभिन्न प्रकारके दान देनेसे, भलीभाँति पुष्प - समर्पणसे अथवा अनेक प्रकारके दिव्य अनुलेपनसे भी परमात्मा जनार्दन विष्णु उतना संतुष्ट नहीं होते जितना भक्तिसे।
इस संसाररूपी विषवृक्षके अमृतके समान दो फल हैं - पहला फल है - भगवान् केशवकी भक्ति और दूसरा फल है, उनके भक्तोंका सत्संग -
संसारविषवृक्षस्थ द्वे फले ह्यमृतोपमे।
कदाचित्केशवे भक्तिस्तद्भक्तैर्वा समागम:॥
सनातन पुरुष श्रीविष्णु एकमात्र भक्तिसे सुलभ हैं और यह भक्ति अनायास पत्र, पुष्प, फल अथवा जलका श्रद्धाके साथ श्रीविष्णुके चरणोंमें समर्पण मात्रसे प्राप्प है। ऐसी स्थितिमें अतिकष्टसाध्य मुक्तिके लिये क्यों प्रयत्न किया जाय?
‘हमारे कुलमें एक विष्णु भक्तने जन्म लिया है, यह हमारा इस संसार - सागरसे उद्धार करेगा।’ यह सोचकर पितृगण ताल ठोकते हैं और पितामह ताली बजा - बजाकर नृत्य करते हैं। अज्ञानी और पापात्मा शिशुपाल तथा सुयोधन आदि भी सुरश्रेष्ट भगवान्की निन्दा - अपमानके ब्याजसे, भगवान्का स्मरण मात्र करके निष्पाप हो गये और मुक्तिको प्राप्त कर लिये। ऐसी स्थितिमें भगवान्में परम भक्ति रखने वालोंके मुक्ति लाभमें कौन - सा संशय है? वह तो निस्संदेह प्राप्त होगी ही -
अज्ञानिन: सुरवरे समधिक्षिपन्तो
यत्पापिनोऽपि शिशुपालसुयोधनाद्या:।
मुक्तिं गता: स्मरणमात्रविधूतपापा:
कः संशय: परमभक्तिमतां जनानाम्॥
ध्यानयोगसे रहित होकर भी जो लोग श्रीविष्णुकी शरणमें आ जाते हैं, वे मृत्युका अतिक्रमण करके परम वैष्णवगतिको प्राप्त हो जाते हैं।
हे माधव! इस संसारमें प्राप्त होनेवाले सैकड़ों कष्टोंसे व्यधित और शरीरमें विद्यमान अनेक इन्द्रिय - छिद्ररूप अश्वोंके साथ विषय वासनाओंमें भटकते हुए इस मेरे मनरूपी घोड़ेकों आप रोक लें और अपने चरणरूपी खूँटेमें सुदृढ़ भक्तिरूपी बन्धनसे बाँध दें, जिससे यह मेरा मन आपके चरण कमलका परित्याग कर अन्यत्र न जा सके -
भवोद्भवक्लेशशतैहतस्तथा
परिभ्रमन्निन्द्रियरन्ध्रकैर्हयै:।
नियम्यतां माधव मे मनोहय
स्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ द्रुढभक्तिबन्धने॥
(यह श्लोक प्राचीन आप्तपरम्परामें इस प्रकार प्रसिद्ध है -
भवोद्भवक्लेशकशाहताहत: परिभ्रमन्नैन्द्रियकापथान्तरे।
निगृह्यतां माधव मे मनोहयस्त्वदङ्घ्रिशङ्कौ दृढभक्तिबन्धनैः॥
इसका अर्थ है -’हे माधव! मेरा मनरूपी अश्व संसारमें उत्पन्न क्लेशरूपी सैकड़ों कोड़ोंसे आहत होकर ऐन्द्रिय(इन्द्रियसम्बन्धी) अनेक कापथ (कुत्सित मार्गों) - में भटक रहा है। कृपया आप अपने भक्तिरूप दृढ बन्धनोंसे अपने चरणरूपी शङ्कुमें इसे बाँधकर निगृहीत कर लें।’
[काशीके प्रसिद्ध परम आस्तिक प्रौढ विद्वान् श्रीरामयशजी त्रिपाठी (महाशयजी) इसी रूपमें इस श्लोकका प्रतिदिन प्रात:पाठ करते थे और कहा करते थे कि यह गरुड पुराणका श्लोक है। विशेषकर वर्तमान कलिकालमें इस श्लोकका पाठ भगवान्की भक्ति प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है। यह तथ्य महाशयजीके शिष्य स्व० श्री पं० बालचंन्द्र दीक्षितजीसे ज्ञात हुआ है।])
विष्णु ही परब्रह्म हैं, वे ही तीन भिन्न रूपोंमें बेद - शास्त्रादिके प्रतिपाद्य हैं। इस तथ्यको उनकी मायासे मोहितजन नहीं जानते और जो लोग इस मायासे परे रहते हैं तथा श्रीविष्णुमें अपनी अचल भक्ति रखते हैं, उन्हें यह भेद नहीं दिखायी देता। उनके लिये तो सब विष्णुमय ही होता है।