गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
116 - तिथि आदि व्रतोंका वर्णन
ब्रह्मजीने कहा - हे व्यास! अब मैं व्रतोंका वर्णन करूँगा, जिनको करनेसे प्राणीको भगवान् हरि सब कुछ प्रदान करते हैं। सभी मास, सभी नक्षत्र, सभी तिथि और सभी दिनोंमें हरिका पूजन होता है। एकभक्त
(दिनार्धसमयेऽतीते भुज्यते नियमेन यत्।
एकभक्तमिति प्रोक्तं रात्रै तन्न कदाचन॥
दिनका आधा समय बीत जानेपर 24 घंटेमें केवल एक बार दिनमें किया गया भोजन एकभक्त होता है।)
नक्तें,
(दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभूते दिवाकरे।
नक्तं तच्च विजानीयान्न नक्त निशिभोजनम्॥
नक्षत्रदर्शनान्नक्तं गृहस्थेन विधीयते।
यतेर्दिनाष्टमे भागे रात्रौ तस्य निषेधनम्॥
दिनके आठवें भागमें सूर्यप्रभाके मन्द होनेपर किया गया 24 घंटेमें एक बारका भोजन नक्तव्रत है। गृहस्थके लिये सूर्यास्तके अनन्तर नक्षत्र - दर्शन करके भोजन करना नक्तव्रत है और यति (संन्यासी) - के लिये सूर्यास्तके पूर्व दिनके आठवें भागमें भिक्षा ग्रहण करना नक्तव्रत है।)
उपवास अथवा फलाहारव्रत करनेसे व्रतीको भगवान् हरि धन, धान्य, पुत्र, राज्य और विजय आदि प्रदान करते हैं।
प्रतिपदा तिथिमें वैश्वानर तथा कुबेर पृज्य हैं, वे साधकको अर्थलाभ कराते हैं। प्रतिपदा तिथिमें तथा अश्विनी नक्षत्रमें उपवास करनेवाले साधकके द्वारा पूजित ब्रह्मा उसे लक्ष्मी प्रदान करते हैं।
द्वितीया तिथिमें यमराज एवं भगवान् लक्ष्मीनारायण उस व्रतीको अर्थलाभ कराते हैं। तृतीया तिथिमें गौरी, विध्नविनाशक गणेश तथा शिव - ये तीन देव पूज्य हैं। चतुर्थीको चतुर्व्यूह भगवान् विष्णु, पञ्चमीको हरि, षष्ठीको कार्तिकेय और रवि तथा सप्तमीको भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये। ये उपासकको अर्थलाभ कराते हैं।
अष्टमी तिथिमें दुर्गा और नवमी तिथिमें मातृका तथा दिशाएँ पूजित होनेपर अर्थ प्रदान करती हैं। दशमी तिथिमें यमराज और चन्द्र तथा एकादशी तिथिमें ऋषिगणोंकी पूजा करनी चाहिये। द्वादशीको हरि और कामदेव तथा त्रयोदशीकों भगवान् शिव पूज्य हैं। चतुर्दशी और पूर्णिमा तिथियोंमें ब्रह्मा तथा अमावास्यामें पितृगणोंकी पूजा करनेसे वे धन - सम्पत्ति प्रदान करते हैं।
रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि - ये सातों वार, अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्र तथा योगोंकी पूजा करनेसे ये सब कुछ प्रदान करते हैं।