गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
143 - रामचरित वर्णन (रामायणकी कथा)
ब्रह्मजीने कहा - अब मैं रामायणका वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे समस्त पापोंका विनाश हो जाता है।
भगवान् विष्णुके नाभि कमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्मासे मरीचि, मरीचिसे कश्यप, कश्यपसे सूर्य, सूर्यसे वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनुसे इक्ष्वाकु हुए। इन्हीं इक्ष्वाकुके वंशमें रघुका जन्म हुआ। रघुके पुत्र अजसे दशरथ नामक महाप्रतापी राजाने जन्म लिया। उनके महान् बल और पराक्रमवाले चार पुत्र हुए। कौसल्यासे राम, कैकेयीसे भरत और सुमित्रासे लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नका जन्म हुआ।
माता - पिताके भक्त श्रीरामने महामुनि विश्वामित्रसे अस्त्र - शस्त्रकी शिक्षा प्राप्तकर ताड़का नामक यक्षिणीका विनाश किया। विश्वामित्रके यज्ञमें बलशाली रामके द्वारा ही सुबाहु नामक राक्षस मारा गया। जनकराजके यज्ञस्थलमें पहुँचकर उन्होंने जानकीका पाणिग्रहण किया। वीर लक्ष्मणने उर्मिला, भरतने कुशध्वजकी पुत्री माण्डवी तथा शत्रुघ्नने कीर्तिमतीका पाणिग्रहण किया, ये महाराज कुशध्वजकी पुत्री थीं।
विवाहके पश्चात् अयोध्यामें जाकर चारों भाई पिताके साथ रहने लगे। भरत और शत्रुघ्न अपने मामा युधाजितके यहाँ चले गये । उन दोनोंके ननिहाल जानेके बाद नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ रामको राज्य देनेके लिये उद्यत हुए। उसी समय कैकेयीने रामको चौदह वर्ष वनमें रहनेका दशरथजीसे वर माँग लिया। अत: लक्ष्मण और सीतासहित मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम पिताके हितकी रक्षाके लिये राज्यको तृणवत् त्यागकर श्रृंगवेरपुर चले गये। वहाँपर रथका भी परित्यागकर वे सभी प्रयाग गये और वहाँसे चित्रकूटमें जाकर रहने लगे।
इधर रामके वियोगसे दुःखित महाराज दशरथ शरीरका परित्याग कर स्वर्ग पधार गये। मामाके घरसे आकर भरतने पिताका अन्तिम संस्कार किया। तदनन्तर वे दल - बलके साथ रामके पास पहुँचे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामसे कहा - ‘हे महामते! आप अयोध्या लौट चलें और वहाँका राज्य करें।’रामने राज्यके प्रति अनिच्छा प्रकट कर दी और भरतको अपनी पादुका देकर राज्यकी रक्षाके लिये वापस अयोध्या भेज दिया। भरत वहाँसे लौटकर रामके प्रतिनिधि रूपमें राज्यकार्य देखने लगे। तपस्वी भरतने नन्दिग्राममें ही रहकर राज्यका संचालन किया, वे अयोध्यामें नहीं गये।
राम भी चित्रकूट छोड़कर अत्रिमुनिके आश्रममें चले आये। तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुतीक्ष्ण और अगस्त्य मुनिके आश्रममें जाकर उन्हें प्रणाम किया और उसके बाद वे दण्डकारण्य चले गये। वहाँ उन सभीका भक्षण करनेके लिये शूर्पणखा नामकी एक राक्षसी आ धमकी। अतः रामचन्द्रने नाक - कान कटवाकर उस राक्षसीको वहाँसे भगा दिया। उसने जाकर खर - दूषण तथा त्रिशिरा नामके राक्षसोंको युद्धके लिये प्रेरित किया। चौदह हजार राक्षसोंकी सेना लेकर उन लोगोंने रामपर आक्रमण कर दिया। रामने अपने बाणोंसे उन राक्षसोंको यमपुर भेज दिया। राक्षसी शूर्पणखासे प्रेरित रावण सीताका हरण करनेके लिये वहाँ त्रिदण्डी संन्यासीका वेश धारणकर मृगरूपधारी मारीचकी अगुवाईमें आ पहुँचा। मृगका चर्म प्राप्त करनेके लिये सीतासे प्रेरित रामने मारीचकों मार डाला। मरते समय उसने ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ ऐसा कहा।
इसके बाद सीताकी सुरक्षामें लगे लक्ष्मण भी सीताके कहनेपर वहाँ जा पहुँचे। लक्ष्मणको देखकर रामने कहा - यह निश्चित ही राक्षसी माया है। सीताका हरण अवश्य हो गया होगा। इसी बीच बली रावण अवसर पाकर अङ्कमे सीताको लेकर, जटायुको क्षत - विक्षतकर लङ्का चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने राक्षसियोंकी निगरानीमें सीताको अशोक - वृक्षकी छायामें ठहरा दिया।
रामने आकर पर्णशालाको सूनी देखा। वे अत्यन्त दुःखित हो उठे। उसके बाद वे सीताकी खोजमें निकल पड़े। मार्गमें उन्होंने जठायुका अन्तिम संस्कार किया और उसीके कहनेसे वे दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़े। उस दिशामें आगे बढ़नेपर सुग्रीवके साथ रामकी मित्रता हुई। उन्होंने अपने तीक्ष्ण बाणसे सात तालवृक्षोंका भेदन किया तथा वालीको मारकर किष्किन्धामें रहनेवाले वानरोंके राजाके रूपमें सुग्रीवको अभिषिक्त किया। और स्वयं जाकर ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करने लगे।
सुग्रीवने पर्वताकार शरीरवाले उत्साहसे भरे हुए वानरोंको सीताकी खोजमें पूर्वादि दिशाओंमें भेजा।
वे सभी वानर जो पूर्व, पश्चिम और उत्तरकी दिशाओंमें गये थे, खाली हाथ वापस लौट आये, किंतु जो लोग दक्षिण दिशामें गये थे उन्होंने वन, पर्वत, द्वीप तथा नदियोंके तटोंको खोज डाला; पर जानकीका कुछ भी पता न चल सका। अन्तमें हताश होकर उन सबने मरनेका निश्चय कर लिया। सम्पातिके वचनसे सीताकी जानकारी प्राप्त करके कपिश्रेष्ठ हनुमानूजीने शतयोजन (चार सौ कोस) विस्तृत समुद्रको लाँघकर लंकामें अशोकवाटिकाके अन्दर रह रही सीताका दर्शन किया, जिनका तिरस्कार राक्षसियाँ और रावण स्वयं करता था। इन सबके द्वारा बराबर यह कहा जा रहा था कि तुम रावणकी पत्नी बन जाओ, किंतु वे हृदयमें सदैव रामका ही चिन्तन करती थीं।
हनुमानने (ऐसी दयनीय स्थितिमें रह रही)सीताको कौसल्या नन्दन रामके द्वारा दी गयी अंगूठी देकर अपना परिचय देते हुए कहा कि ‘हे मैथिलि! मैं श्रीरामका दूत हूँ। आप अब दुःख न करें। आप मुझे कोई अपना चिह्नविशेष दें, जिससे भगवान् श्रीराम आपको समझ सकें।’हनुमान्का यह वचन सुनकर सीताने अपना चूडामणि उतारकर दे दिया और कहा कि ‘हे कपिराज! राम जितना ही शीघ्र हो सके उतना ही शीघ्र मुझको यहाँसे ले चलें।’ऐसा आप उनसे कहियेगा। हनुमान्ने कहा कि ऐसा ही होगा। तदनन्तर वे उस दिव्य अशोक वनको विध्वंस करने लगे। उसे विनष्टकर उन्होंने रावणके पुत्र अक्ष तथा अन्य राक्षसोंको मार डाला और स्वयं मेघनादके पाशमें बन्दी भी बन गये। रावणको देखकर हनुमानने कहा कि हे रावण! मैं श्रीरामका दूत हनुमान् हूँ। आप रामको सीता लौटा दें। यह सुनकर रावण क्रुद्ध हो उठा। उसने उनकी पूँछमें आग लगवा दी।
महाबली हनुमानने उस जलती हुई पूँछसे लंकाको जला डाला। वे पुनः रामके पास लौट आये और बताया कि मैंने सीता माताको देखा, तदनन्तर हनुमानजीने सीताद्वारा दिया गया चूडामणि उन्हें दे दिया। इसके बाद सुग्रीव, हनुमान, अंगद तथा लक्ष्मणके साथ राम लंकापुरीमें जा पहुँचे। रावणका भाई विभीषण भी रामकी शरणमें आ गया। श्रीरमने उसे लङ्काके राजपदपर अभिषिक्त कर दिया। रामने नलके द्वारा सेतुका निर्माण कराकर समुद्रको पार किया था। (समुद्रके तटपर) सुवेल पर्वतपर उपस्थित होकर उन्होंने लङ्कापुरीको देखा।
तदनन्तर नील, अंगद, नलादि मुख्य वानरों तथा धूम्राक्ष, वीरेन्द्र तथा ऋक्षपति जाम्बवान, मैन्द, द्विविद आदि मुख्य वीरोंने लंकापुरीको नष्ट कर डाला। विशाल शरीरवाले काले - काले पहाड़के समान राक्षसोंको अपनी वानरी सेनाके साथ राम - लक्ष्मणने मार गिराया। विद्युज्जिह्न, धूम्राक्ष, देवान्तक, नरान्तक, महोदर, महापार्थ, महाबल, अतिकाय, कुम्भ, निकुम्भ, मत्त, मकराक्ष, अकम्पन, प्रहस्त, उन्मत्त, कुम्भकर्ण तथा मेघनादको अस्त्रादिसे राम - लक्ष्मणने काट डाला। तदनन्तर उन महापराक्रमी श्रीरमने बीस भुजाओंके समूहकों छिन्न - भिन्न करके रावणको भी धराशायी कर दिया।
उसके बाद अग्निमें प्रविष्ट होकर अपनी शुद्धताको प्रमाणित की हुई सीताके साथ लक्ष्मण एवं वानरोंसे युक्त राम पुष्पक विमानमें बैठकर अपनी श्रेष्ठतम नगरी अयोध्या लौट आये। वहाँपर राज्य - सिंहासन प्राप्तकर उन्होंने प्रजाका पुत्रवत् पालन करते हुए राज्य किया। दस अश्वमेध - यज्ञोंका अनुष्ठान करके रामने गयातीर्थमें पितरोंको विधिवत् पिण्डदान दिया और ब्राह्मणोंको विभिन्न प्रकारका दान देकर कुश और लवको राज्यसिंहासन सौंप दिया।
रामने ग्यारह हजार वर्षतक राज्य किया।( एकादशसहस्नाणि रामो राज्यमकारयत्। (ग०पु0 143।40)) शत्रुघ्नने लवण नामक दैत्यका विनाश किया। भरतके द्वारा शैलूष नामक गन्धर्व मारे गये। इसके पश्चात् उन सभीने अगस्त्यादि मुनियोंको प्रणाम करके उनसे राक्षसोंकी उत्पत्तिकी कथा सुनी। तदनन्तर अपने अवतारका प्रयोजन पूर्ण करके भगवान् श्रीराम अयोध्यामें रहनेवाली प्रजाके साथ स्वर्गलोकको चले गये।