गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
105 - प्रायश्चित्त - विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र्, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप
याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा - हे मुनियो! विहित कर्म न करनेसे, निन्दित (निषिद्ध) कर्मका आचरण करनेसे एवं इन्द्रिय - निग्रह न करनेके कारण मनुष्य अधोगतिको प्राप्त करता है।
(विहितस्थाननुष्ठानान्निन्दितस्य च सेवनात्।
अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति॥)
अतएव आत्मशुद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक प्रायश्चित करना चाहिये। इस प्रकार प्रायश्चित्त - कर्म करनेसे उसकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो जाती है और लोक भी उसके साथ प्रसन्नतापूर्वक व्यवहार करता है। प्रायश्चित्तसे पापका विनाश भी हो जाता है। प्रायश्चित्त न करनेवाले तथा पश्चात्तापसे रहित पापीजन पापके प्रभावसे महारौरव नरकसे भी महाभयंकर तामिस्र, लोहशंकु, पूतिगन्ध, हंसाभ, लोहितोद, संजीवन, नदीपथ, महानिलय, काकोल, अन्धतामिस्त्र तथा तापन नामक नरकमें जाते हैं।
ब्रह्महन्ता, मद्यपी, ब्राह्मणके सुवर्णका
(या0 मिताक्षरा प्रा०प्र0 श्लोक।)
चोर, गुरुपत्नीगामी तथा इनका संसर्ग करनेवाले मनुष्य अपने पापके कारण अवीचि तथा कुम्भीपाक नामक महाभयानक नरकका भोग करते हैं।
गुरु एवं वेदकी निन्दा करना ब्रह्महत्याके समान हैं। निषिद्ध पदार्थका भक्षण, कुटिलतापूर्वक आचरण और रजस्वला स्त्रीका अधरपान मदिरापान नामक महापातकके सदृश माना जाता है। अश्व तथा रत्नादिका अपहरण, सुवर्ण - चोरीके महापापकी भाँति होता है। मित्रकी पत्नी, अपनी अपेक्षा उत्तम जातिकी कन्या, चाण्डाली और बहन तथा पुत्रवधूके साथ सहवास करना गुरुपत्नी - गमनके समान महापाप स्वीकार किया गया है। इसी प्रकार माता - पिताकी बहन, मामी, विमाता, आचार्यपुत्री, आचार्यपत्नी तथा पुत्रीके साथ रमण करनेवाला व्यक्ति भी गुरुपत्नीगामीके समान ही महापातकी होता है।
ऐसा महापापी मनुष्य लिंग - छेदनके पश्चात् वध करनेके योग्य होता है। इस प्रकारके पापमें यदि स्त्री सकाम होकर संश्लिष्ट होती है तो उसके लिये भी इसी प्रकारका प्रायश्चित्त - विधान कहा गया है।
गोहत्या, व्रात्यता (समयपर यज्ञोपवीत - संस्कार न होना अर्थात् सावित्रीच्युत होना), चोरी (ब्राह्मणका सुवर्ण अथवा सुवर्ण - सदृश अन्य द्रव्यका हरण करना), ऋण न लौटाना तथा देव, ऋषि एवं पितृ - ऋणसे मुक्त होना, अधिकारी होते हुए भी अग्न्याधान न करना, विक्री न करने योग्य लवण आदिका विक्रय करना, परिवेदन(सहोदर ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहते हुए छोटा भाई यदि विवाह एवं अग्निहोत्र ग्रहण करता है तो वहीं परिवेदन नामक पाप है।), रुपये लेकर अध्ययन करानेवालेसे अध्ययन करना, रुपये लेकर अध्यापन करना, परस्त्रीके(गुरु एवं गुरुके समान श्रेष्ठजनोंके अतिरिक्त स्त्री।) साथ सहवास, पारिवित्य,( छोटे भाईके विवाह कर लेनेपर ज्येष्टके द्वारा विवाह न करनेपर होनेवाला दोष पारिवित्य कहलाता है।) प्रतिषिद्ध सूदसे जीविकायापन, नमकका उत्पादन, स्त्रीवध, शूद्रवध, अधीक्षित वैश्य तथा क्षत्रियका वध करना और निन्दित धनसे जीविका चलाना, नास्तिकता, व्रतका लोप, सुत - विक्रय, माता - पिता तथा मित्रका परित्याग, तालाब - उद्यानका विक्रय, कन्याको दूषित करना, बड़े भाईकी उपेक्षा करके अग्न्याधान तथा विवाह करनेवालेको यजन कराना तथा ऐसे व्यक्तिको कन्यादान करना, गुरुसे अतिरिक्तके साथ कुटिलता करना, व्रतका लोप, केवल अपने लिये भोजन बनानेवाला, मद्यपान करनेवाली स्त्रीका सम्पर्क, स्वाध्याय, अग्नि, पुत्र तथा बन्धुका परित्याग, असत् - शास्त्रका अध्ययन, भार्या एवं अपना विक्रय- ये सभी निन्दित कर्म उपपातक कहे गये हैं। हे मुनियो! आप अब इनके प्रायश्चित्तका ज्ञान प्राप्त करें - बह्महत्या करनेपर पापी व्यक्ति शिरःकपाल (खर्पर - खोपड़ी ) - को हाथमें लेकर तथा दूसरा एक शिरःकपाल ध्वजके समान दण्डमें लगाकर चले और भिक्षामात्रसे जीविका - निर्वाह करता हुआ अपने पापकर्मका उद्धोष करते हुए बारह वर्षतक अल्प भोजन कर आत्मशुद्धि करे अथवा जानते हुए इच्छापूर्वक ब्रह्महत्या करनेपर ‘लोमभ्यः स्वाहा’ इत्यादि मन्त्रके अनुसार लोमसे शरीरके अवयवोंके प्रतिनिधिरूप यथाविहित विभिन्न द्रव्योंकी आहुति देकर अन्तमें अपने शरीरका भी प्रायश्चित्त - विधानमें निर्दिष्ट विधानके अनुसार अग्निमें प्रक्षेप करे। अपने प्राणोंका त्याग करके ब्राह्मणकी रक्षा करनेसे भी ब्रह्महत्याकी शुद्धि हो जाती है।
अत्यधिक कष्ट देनेवाले दुःसह बहुकालव्यापी रोग या अन्य किसी प्रकारके भयरूप आतंकसे ग्रस्त ब्राह्मणको अथवा मार्गमें पड़ी हुई ऐसी ही गायको निरोग या निरान्तक करके भी ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति पायी जा सकती है। यदि कदाचित् प्रमादवश ऐसे ब्राह्मणकी हत्या किसीके द्वारा होती है, जो ब्राह्मणके लिये अपेक्षित गुणोंसे युक्त नहीं है तो इस हत्यासे होनेवाले पापसे मुक्तिके लिये यह प्रायश्चित्त है - वनमें रहकर मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदका तीन बार पारायणकर अथवा सरस्वती (वेदविद्या) - की सेवामें अपना पूर्ण समर्पण करनेके साथ अपना सब कुछ धन (सर्वस्व) योग्य पात्रमें समर्पित करके अपनेको शुद्ध किया जाय। सोमयाग प्रयोगमें वर्तमान क्षत्रिय और वैश्यका वध करनेपर ब्रह्महत्याके लिये जो प्रायश्चित्त है, उसे करे। गर्भहत्या करनेवाले पापीने जिस वर्णका गर्भ नष्ट किया हो, उसी वर्णके अनुसार उसको उस पापका प्रायश्चित्त करना चाहिये। रजस्वला होनेके बाद ऋतुस्नान की हुई स्त्रीकी हत्या करनेवाला जिस वर्णकी स्त्रीकी हत्या की है, उस वर्णके अनुसार प्रायश्चित्त करे। हत्या करनेके लिये उद्यत होनेपर यदि हत्यारेको उस कृत्यमें सफलता नहीं प्राप्त होती है तो भी वह हत्याके पापसे मुक्त नहीं है, उसको उस पापका प्रायश्चित्त करना चाहिये।
सोमयागके लिये दीक्षित ब्राह्मणकी हत्या करनेपर ब्रह्महत्याके लिये विहित प्रायश्चित्तका दुगुना प्रायश्चित्त - व्रत करे। मदिरापान करनेवालेका प्रायश्चित्त, अग्निके समान प्रतप्त मदिरा एवं गोमूत्रका अथवा अग्निके समान लाल - लाल खौलता हुआ गोघृतपान एवं गोदुग्धपान करनेसे होता है और जल समझकर भूलसे मदिरा पी लेनेपर जटाधारण करके मलिन वस्त्र धारणकर अग्निके समान तप्त घृत पीते हुए ब्रह्महत्याके लिये विहित व्रत करे तथा पुन: सवर्णोचित संस्कार करे तब शुद्धि होती है।
वीर्य, विष्ठा, मूत्रका पान करनेवाली ब्राह्मणी एवं सुरा पीनेवाली ब्राह्मणी पातकी हो जाती है। पतिलोकसे परिभ्रष्ट होकर वह क्रमश: गृध्री, सूकरी तथा कुतियाकी योनिमें जन्म लेती है।
ब्राह्मणके सुवर्णकी चोरी करनेवाले द्विजको चाहिये कि वह राजाको मूसल समर्पित करके अपने चौर्य - कर्मका उद्धोष करे। तत्पश्चात् उस मूसलके आघातसे वह मृत्युको प्राप्त हो या जीवित दोनों दशामें पवित्र हो जाता है। ऐसा द्विज अपनी तौलके बराबर सुवर्ण देकर भी आत्मशुद्धि कर सकता है।
जो गुरु - पत्नीके साथ सहवास करता है,उसको दहकती हुई लौहमयी स्त्री - प्रतिमाके साथ शयन करके अपने शरीरका परित्याग करना चाहिये अथवा अपना लिंग और अण्डकोश काटकर नैर्ऋत्य दिशामें फेंक देना चाहिये और शरीरपर्यन्त पीछे मुँह करके चलता रहे अथवा वह दुरात्मा तीन वर्ष प्राजापत्य तथा कृच्छ्र्व्र्तका पालन करे या तीन मासतक चान्द्रायणव्रत एवं वेद - संहिताका पाठ करके भी वह उस पापसे विमुक्त हो सकता है।
गो - वध करनेवाले पापीकों पञ्चगव्य पानकर एक मासतक संयमित जीवन व्यतीत करना चाहिये। वह गोष्ठमें निवास करते हुए गौओंका अनुगमन तथा गौका दान करे।
चान्द्रायणव्रत करनेसे उपपातकोंकी शुद्धि होती है। एक मासतक दुग्ध - पान अथवा पराक नामक व्रत करके उन उपपातकोंसे शुद्धि प्राप्त की जा सकती है।
क्षत्रिय - वध करनेपर मनुष्यको एक बैल और एक हजार गायोंका दान देना चाहिये अथवा वह तीन वर्षतक ब्रह्महत्याके लिये विहित व्रतका पालन करे। वैश्यका वध करनेवाले मनुष्यको एक वर्षतक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त - व्रत अथवा एक सौ गायोंका दान करना चाहिये। शूद्रकी हत्या करनेपर छ: मासतक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त अथवा दस सवत्सा दूध देनेवाली गायोंका दान दे ।( ये सभी प्रायश्चित्त अज्ञानपूर्वक वधके लिये विहित हैं।) अदुष्ट अर्थात् सुशीला सच्चरित्र स्त्रीका वध करनेपर मनुष्यको शूद्र - वध - विहित प्रायश्चित्तव्रतका पालन करना चाहिये।
मार्जार (बिल्ली), गोह, नेवला, साधारण पशु तथा मेढककी हत्या करनेपर पापी व्यक्ति तीन रात्रितक दुग्धपानके साथ ही पाद कृच्छ्र्व्रतका पालन करे। हाथीका वध कलनेपर मनुष्यको पाँच नील बैलोंका(नील - वृष एक विशिष्ट लक्षणवाले बैलको कहते हैं।) दान देना चाहिये। शुक पक्षीकी हत्या करनेपर दो वर्षका बछड़ा तथा क्रौंच पक्षीका वध करनेपर तीन वर्षका बछड़ा दान देना चाहिये। गधा, बकरा और भेंड़की हत्या करनेपर भी एक बैलका दान दे। वृक्ष, गुल्म, लता तथा झाड़ीको काटनेपर सौ बार गायत्री - जप करे।
मधु और मांसका भक्षण करनेपर कृच्छ्र्व्रत तथा अन्य शेष व्रतोंका पालन करना चाहिये। यदि गुरुके द्वारा प्रेषित शिष्यकी मृत्यु मार्गमें हो जाती है तो गुरु तीन कृच्छ्र्व्रतका पालन करे, किंतु गुरुके प्रतिकूल कार्य करनेपर शिष्यके द्वारा उन्हें प्रसन्न करनेसे ही शुद्धि हो जाती है।
शत्रुओंको धान्य आदि तथा प्रीति आदिके द्वारा प्रसन्न करे। यदि किये जा रहे उपकारके बीच ही ब्राह्मणकी मृत्यु हो जाती है तो उपकारी व्यक्तिको पाप नहीं लगता।
जो मनुष्य दूसरेको महापापी तथा उपपातकीका मिथ्या दोष लगाता है, ऐसा मनुष्य जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक केवल जल पीकर रहे और पापमोचनमन्त्रका जप करे।
असत् - प्रतिग्रह लेनेसे जो पाप होता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये एक मासपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पयोव्रत करे। गोष्ठमें निवासकर गायत्री - मन्त्रके जपमें परायण रहे। ऐसा करनेसे मनुष्य पापविमुक्त हो जाता है।
(यथासमय यज्ञोपवीत - संस्कारादिसे वंचित) व्रात्यका यजन करानेवाला तीन कृच्छ्र्व्रतका आचरण करके अपने उस पापसे मुक्त हो सकता है। ऐसे ही अभिचारक क्रिया करनेवालेके लिये भी यही प्रायश्चित्त है। वेद प्लावी(या0 स्मृति श्लोक 288 की मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार प्रकृतमें विप्लव शब्दके तीन अर्थ हैं-1-जो व्यक्ति वेदकी रक्षा कर सकता है, यदि वह वेदरक्षा नहीं करता तो यह वेदका विप्लव है। 2 -अनध्याय कालमें वेदका अध्ययन विप्लब है। 3 - वेदाध्ययनमें समर्थ अथवा वेदाध्ययन करके उत्कर्ष प्राप्त करनेवाले अधिकारीको वेदाध्ययनके प्रति अनुत्साहित करना विप्लव है। इनमेंसे किसी एक दोषसे युक्त व्यक्ति भी वेदप्लावी कहा जाता है।) वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे। शरणमें आये हुएका परित्याग करनेवाला भी वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे।
गर्दभयान तथा उष्ट्रयानसे गमन करनेवाला तीन प्राणायाम करे। इसी प्रकार नग्नस्नान, नग्न - शयन और दिनमें स्त्रीगमन करनेपर भी तीन प्राणायामसे शुद्धि होती है।
गुरुजनोंको ‘तू’ कहने तथा ‘हूँ’ इस प्रकार कहनेसे तथा वाद - प्रतिवादमें ब्राह्मणपर विजय प्राप्त करनेसे मनुष्यको जो पाप लगता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये पापी मनुष्यको उस गुरु या ब्राह्मणको प्रसन्नकर एक दिनका उपवास करना चाहिये। ब्राह्मणपर प्रहार करनेके लिये उद्यत होनेपर कृच्छ्र्व्रत तथा प्रहार कर देनेपर अतिकृच्छ्र् व्रतका पालन करना चाहिये ।
जिस निन्दित आचरणके लिये प्रायश्चित्त - विधान निर्दिष्ट नहीं है, उसके लिये देश, काल, आयु, शक्ति और पापपर सम्यक् विचार करके ही प्रायश्चित्तका निर्णय करना चाहिये। शास्त्रकारोंने पाप - विमुक्तिका यही समुचित नियम कहा है।
गर्भपात तथा पतिनिन्दा करना स्त्रियोंके पतनके कारण हैं। ऐसी स्त्रियाँ अपने दोषके अनुसार शास्त्रविहित प्रायश्चित्त नहीं करती हैं तो उनका परित्याग ही उचित है अन्यथा उन्हें अपने घरमें जीवनयापनके लिये आवश्यक सामान देकर रखना चाहिये।
जो पाप विख्यात हो चुका है, उसका प्रायश्चित्त गुरुजनोंके (परिषदके)(वेद एवं धर्मके विज्ञाता चार ब्राह्मणों अथवा तीन ब्राह्मणों या ब्रह्मवेत्ता धर्मशास्त्रज्ञ एक ब्राह्मणकी भी परिषद् हो सकती है।)
अभिमतके अनुसार ही करना चाहिये, किंतु जो पाप विख्यात नहीं है, उसका प्रायश्चित्त गुप्तरूपसे करना चाहिये।
गुप्तरूपसे किये जानेवाले कुछ प्रायश्चित्त इस प्रकार समझना चाहिये - ब्रह्महत्या करनेवाला पापी तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर विशुद्ध जल (नदी आदिके जलमें निमग्न होकर) - के मध्य अघमर्षण (‘ऋतं च सत्यं०’ आदि मन्त्र अघमर्षण है।) - मन्त्रका जप करे और दूध देनेवाली गायका दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है। किंतु यह प्रायश्चित्त अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके लिये विहित है। अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके निमित्त यह प्रायश्चित्त भी किया जा सकता है कि ब्रह्महत्या कर्ता अहोरात्र पर्यन्त वायुपान करते हुए जलमें रहनेके बाद प्रातःकाल जलसे बाहर आकर ‘लोमभ्य स्वाहा०’(या0 स्मृतिमें श्लोक 247 में इन मन्त्रोंको दिया गया है।) इत्यादि आठ मन्त्रोंसे पाँच - पाँच आहुतियाँ यथाविधान अग्निमें दे।
मद्यपी एवं सुवर्णकी चोरी करनेवाले पापीको जलके मध्य स्थित होकर रुद्रदेवके मन्त्रका जप करते हुए तीन दिनका उपवास और कुष्माण्डी ऋचासे घृतकी आहुतियाँ देकर आत्मशुद्धि करनी चाहिये। गुरु - पत्नीके साथ सम्पर्क करनेवाला पापी ‘सहस्रशीर्षा०’ मन्त्रका जप करके पापसे विमुक्त हो जाता है।
सौ बार प्राणायाम करनेपर मनुष्य सर्वविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। अज्ञानवश किये गये पापकी शान्ति त्रैकालिक संध्योपासनासे हो जाती है। ब्राह्मणोंके द्वारा एकादश आवृत्ति रुद्रानुवाकोंका जप करवानेसे भी पापका शमन होता है। वेदाभ्यास करनेवाले, शान्तिपरायण और पञ्चयज्ञके अनुष्ठाताको पापका स्पर्शतक नहीं होता। वायुमात्रका भक्षण
करते हुए पूरे दिन सूर्यदर्शनके साथ एवं पूरी रात्रि जलमें रहकर एक सहस्र गायत्री - मन्त्रका जप करनेसे ब्रह्महत्यासे होनेवाले पापके अतिरिक्त अन्य समस्त पापोंसे मुक्ति हो जाती है।
ब्रह्मचर्य, दया, क्षमा, भगवद्ध्यान, सत्य, निष्कपटता, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), माधुर्य और दम--ये दस यम माने गये हैं । स्नान, मौन, उपवास, यज्ञ, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, तपस्या, अक्रोध, गुरुभक्ति और पवित्रता-ये दस नियम कहे जाते हैं ।
गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र तथा गोमयको ‘पञ्चगव्य’ कहते हैं। इस पञ्चगव्यका कुशोदकके साथ पान कर व्रती दूसरे दिन उपवास करे। इस तरह दो रात्रिका कृच्छ्र् - सान्तपनव्रत होता है। पहले दिन गोदुग्ध, दूसरे दिन गोदधि, तीसरे दिन गोघृत, चौथे दिन गोमूत्र, पाँचवें दिन गोमय, छठें दिन कुशोदक मात्र और सातवें दिन कुछ भी न लेकर शुद्ध उपवास कर जो व्रत पूर्ण किया जाता है, वही महासान्तपन नामक व्रत कहा जाता है।
पलाश, गूलर, कमल, बिल्वपत्र इनमेंसे एक - एकको एक - एक दिन जलमें पकाकर उसी जलको क्रमश: एक - एक दिन पीकर चार दिन रहे एवं पाँचवें दिन कुशोदकमात्र पीकर जिस व्रतका पालन किया जाता है, उसको पर्णकृच्छ्र्व्रत कहते हैं। तप्तकृच्छ्र्व्रतमें व्रतीको पहले दिन गरम गोदुग्ध, दूसरे दिन गरम घृत, तीसरे दिन गरम जलका प्राशन चौथे दिन उपवास करना चाहिये। यह पवित्र (शुद्ध) करनेवाला महातप्तकृच्छ्र्व्रत है।
पहले दिन एकभक्तव्रत (चौबीस घण्टेमें मध्याहमें केवल एक बार भोजन करना), दूसरे दिन नक्तव्रत अर्थात् चौबीस घण्टेमें एक बार (रात्रिमें), तीसरे दिन अयाचित (बिना याचनासे प्राप्त) अन्नका भोजन करना, चौथे दिन पूर्ण उपवास करनेपर पादकृच्छ्र्व्रत होता है। इसी पादकृच्छ्र् व्रतको तीन बार करनेसे प्राजापत्यकृच्छ्र्व्रत होता है। प्राजापत्यव्रतके अनुसार भोजन और उपवासका नियम किया जाय परंतु भोजनके रूपमें उतना ही अन्न ग्रहण किया जाय, जितना एक हाथमें आता हो। इस तरह चार दिनका उपवास करनेसे अतिकृच्छ्र् व्रत हो जाता है। इक्कीस दिनतक जल या दूधमात्र लेकर अतिकृच्छ्र् व्रतका पालन करनेसे वह कृच्छातिकृच्छ्र्व्रत होता है। बारह दिन पूर्ण उपवास करनेपर एक पराकव्रत होता है।
पहले दिन जिनसे तेल निकाल लिया गया है ऐसे तिल, दूसरे दिन माँड़, तीसरे दिन मट्ठा, चौथे दिन जल तथा पाँचवें दिन सत्तूका आहारकर छठें दिन उपवास करना सौम्यकृच्छ्र् व्रत कहलाता है। इस सौम्यकृच्छ्र्व्रतमें बताये गये पदार्थोका एक दिनके स्थानपर तीन-तीन दिनतक क्रमश: पंद्रह दिनतक चलनेवाला तुलापुरुषसंज्ञक कृच्छ्र् व्रत होता है अर्थात् इस व्रतमें (प्रथम) तीन रात्रियोंतक नि:सृत तेलवाले तिल, (द्वितीय) तीन रात्रियोंतक माँड, (तृतीय) तीन रात्रियोंतक मट्ठा, (चतुर्थ) तीन रात्रियोंतक जल तथा (पञ्चम) तीन रात्रियोंतक सत्तूका भोजन करके एक दिनका उपवास करना चाहिये।
शुक्लपक्षमें तिथि - वृद्धि - क्रमसे मयूरके अण्डेके समान मात्रावाले एक - एक भोजन - ग्रासका अधिक आहार करते हुए पूर्णिमा तिथिको यह क्रम समाप्त करके पुनः कृष्णपक्षमें प्रतिदिन एक - एक अन्न - ग्रासका भ्क्षण - क्रमसे घटाते हुए चतुर्दशी तिथिको एक ग्रास भोजन करे एवं अमावास्याको उपवास करे, यह चान्द्रायणव्रत है। चान्द्रायणका अन्य प्रकार यह है - पूरे मासमें दो सौ चालीस ग्रास मात्र हविष्यान्न ग्रहण किया जाय। इन व्रतोंमें यह आवश्यक है कि प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन स्नान करके पवित्र - संज्ञक विशेष मन्त्रोंका जप करे तथा गायत्री - मन्त्रसे पिण्डग्रासको अभिमन्त्रित कर उसे ग्रहण करे।
जिन पापोंका प्रायश्चित्त शास्त्रोंमें नहीं बताया गया है, उन पापोंसे भी शुद्धि चान्द्रायण व्रतसे हो जाती है। किसी पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्तरूपमें नहीं, अपितु पुण्य प्राप्त करनेकी दृष्टिसे जो इस चान्द्रायणव्रतका अनुष्ठान करता है, उसको चंद्रलोककी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार पुण्य प्राप्त करनेके लिये ही जो कृच्छ्र् व्रत करता है, वह महान् ऐश्वर्यका लाभ प्राप्त करता है।