130 - षष्ठी तथा सप्तमीके विविध व्रत

ब्रह्मजीने कहा - भाद्रपद मासमें भगवान्‌ कार्तिकेयकी पूजा करनी चाहिये। (कार्तिकेयकी तिथि षष्ठी कही गयी है। ) इसमें स्नानादि जो कृत्य किये जाते हैं, वे सभी अक्षय फल प्रदान करनेवाले हो जाते हैं।

व्रती (षष्ठी तिथिको उपवासकर) सप्तमी तिथिको ब्राह्मणभोजन कराकर ‘ॐ खखोल्काय नमः’ इस मन्त्रसे सूर्यदेवकी पूजा करे और अष्टमी तिथिको मरिचका भोजनकर पारणा करे। इससे व्रती अन्तमें स्वर्ग प्राप्त करता है। मरिच - प्राशनके कारण इस व्रतका नाम मरिच सप्तमी है। इस व्रतको करनेसे प्रियजनोंसे मिलन होता है, उनसे वियोग नहीं होता। सप्तमी तिथिको संयमपूर्वक स्नानादि करके सूर्यकी पूजा करे। ‘मार्तण्डः प्रीयताम्‌’- ‘सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों’ यह कहते हुए ब्राह्मणोंके लिये फलोंका दान करे और खजूर, नारियल, बिजौरा नीबू आदि फलोंको प्रदान करे। यह प्रार्थना करे कि हे देव! मेरे सभी अभीष्ट चारों ओरसे सफल हों। फलदान एवं प्राशनके कारण इस सप्तमीका नाम ‘फल सप्तमी व्रत’ है।

सप्तमीको सूर्यदेवकी पूजा कर यदि ब्राह्मणोंको दक्षिणा सहित पायसका भोजन कराया जाय, तदनन्तर व्रती स्वयं पयका पानकर व्रत समाप्त करे तो पुण्य - लाभ होता है। ओदन, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य पदार्थ इस व्रतमें ग्राह्म नहीं है। धन - पुत्रकी कामना करनेवाला ओदनका परित्याग कर इस व्रतको करे। इसी वैशिष्टयके कारण इसे अनौदक सप्तमी कहा गया है।

विजयकी कामना करनेवालेको वायुमात्र पान कर विजयसप्तमीव्रत करना चाहिये। जो कामेच्छुक हैं, वे मात्र अर्कका प्राशनकर इस व्रतको करें। इस प्रकार व्रतकर वे कामपर विजय प्राप्त कर लेते हैं।

इस सफ्तमी व्रतमें गेहूँ, उड़द, यव, साठी धान, तिल, कांस्यपात्र, पाषाणपात्र, पिसी हुई वस्तु, मधु, मैथुन, मद्य, मांस, तैल - मर्दन और अंजन त्याज्य है। जो मनुष्य इनका परित्याग कर व्रत करता है, उसकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इसीलिये इसे विजय सप्तमी कहा गया है।

131 - दूर्वाष्टमी तथा श्रीकृष्णाष्टमीव्रत

ब्रह्माजीने कहा - हे ब्रह्मन्‌! भाद्रपदमासमें शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको दूर्वाष्टमीव्रत होता है। इस दिन उपवास रहकर दूर्वासे गौरी - गणेशकी और शिवकी फल - पुष्प आदिसे पूजा करनी चाहिये। फल, धान्य आदि सभी प्रयोज्य वस्तुओंसे ‘शम्भवे नमः, शिवाय नमः’ कहकर शिवका पूजन करे। तदनन्तर ‘त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि’

(वं दूर्वेऽमृतजन्मासि वन्दिता च सुरासुरै:।

सौभाग्यं संतत्ति कृत्वा सर्वकार्यकरी भव॥

यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृतासि महीतले।

तथा ममापि संतान देहि त्वमजरामरे॥)

इस मन्त्रसे दूर्वाकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे यह अष्टमीव्रत निश्चित ही साधकको सर्वस्व प्रदान कर देता है। इस व्रतमें जो अग्निमें न पकाये गये पदार्थोका भोजन करता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है।

इसी भाद्रपदके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको अर्द्धरत्रिमें रोहिणी नक्षत्रमें भगवान्‌ हरिकी पूजाका विधान है। यह श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रत कहलाता है। सप्तमी तिथिसे विद्ध अष्टमी तिथि भी व्रतके योग्य होती है। इस प्रकारके अष्टमीका व्रत करनेसे प्राणीके तीन जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। अतः उपवास रखकर मन्त्रसे भगवान्‌ हरिकी पूजा करके तिथि और नक्षत्रके अन्तमें पारणा करनी चाहिये।

ॐ योगाय योगपतये योगेश्वराय योगसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’ इस मन्त्रसे योगेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्षका ध्यान कर ‘ॐ यज्ञाय यज्ञेश्वराय यज्ञपतये यज्ञसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:।’ इस मन्त्रसे उन्हें स्नान कराना चाहिये।

उसके बाद ‘ॐ विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वपतये विश्वसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः’ इस मन्त्रसे श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चातू- ‘ॐ सर्वाय सर्वेश्वराय सर्वपतये सर्वसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:।’ इस मन्त्रसे उन्हें शयन कराना चाहिये।

स्थण्डिल (वेदी) - में चन्द्रमा और रोहिणीके साथ भगवान्‌ कृष्णकी पूजा करे। पुष्प, फल और चन्दनसे युक्त जलको शंखमें लेकर अपने दोनों घुटनोंको पृथिवीसे लगाते हुए चन्द्रमाको निम्न मन्त्रद्वारा अर्घ्य प्रदान करे -

क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्धव॥

गृहाणाघ्र्यं शशांङ्केश रोहिण्या सहितो मम।

हे क्षीरसागरसे उत्पन्न देव! हे अत्रिमुनिके नेत्रसे समुद्भूत! हे चन्द्रदेव! रोहिणीदेवीके साथ मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्यको आप स्वीकार करें।

तदनन्तर व्रतीको महालक्ष्मी, वसुदेव, नन्द, बलराम तथा यशोदाको फलयुक्त अर्घ्य प्रदानकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये -

अनन्तं वामनं शौरिं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम्‌॥

वासुदेवं हृषीकेशं माधव मधुसूदनम्‌।

वराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंह दैत्यसूदनम्‌॥

दामोदरं पद्मनाभं केशवं गरुडध्वजम्‌।

गोविन्दमच्युतं देवमनन्तमपराजितम्‌॥

अधोक्षजं जगदबीजं सर्गस्थित्यन्तकारणम्‌।

अनादिनिधनं विष्णु त्रिलोकेशं त्रिविक्रमम्‌॥

नारायणं चतुर्बाहुं शंङ्खचक्रगदाधरम्‌।

पीताम्बरधरं दिव्यं वनमालाविभूषितम्‌॥

श्रीवत्साङ्क जगद्धाम श्रीपतिं श्रीधरं हरिम्‌।

यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत्॥

भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्ये तस्मै ब्रह्मात्मने नम:।

वे देव जो अनन्त, वामन, शौरि, वैकुण्ठनाथ, पुरुषोत्तम, वासुदेव, हृषीकेश, माधव, मधुसूदन, वराह, पुण्डरीकाक्ष, नृसिंह, दैत्यसूदन, दामोदर, पद्मनाभ, केशव, गरुडध्वज, गोविन्द, अच्युत, अनन्तदेव, अपराजित, अधोक्षज, जगदूबीज, सर्गस्थित्यन्तकारण, अनादिनिधन, विष्णु, त्रिलोकेश, त्रिविक्रम, नारायण, चतुर्भुज, शङ्खचक्रगदाधर, पीताम्बरधारी, दिव्य, वनमालासे विभूषित, श्रीवत्साङ्क, जगद्धाम, श्रीपति और श्रीधरादि नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनको देवकीसे वसुदेवने उत्पन्न किया है, जो पृथिवीपर निवास करनेवाले ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये संसारमें अवतरित होते हैं, उन ब्रह्मरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णको मैं नमन करता हूँ।

इस प्रकार भगवान्‌के नामोंका संकीर्तन करके अपनी सदगतिके लिये पुनः यह प्रार्थना करनी चाहिये -

त्राहि मां देवदेवेश हरे संसारसागरात्‌।

त्राहि मां सर्वपापध्न दुःखशोकार्णवात्‌ प्रभो॥

देवकीनन्दन श्रीश हरे संसारसागरात्‌।

दुर्वृत्तांस्त्रायसे विष्णो ये स्मरन्ति सकृत्सकृत्‌॥

सोऽहं देवातिदुर्वृत्तस्त्राहि मां शोकसागरात्‌।

पुष्कराक्ष निमग्नोऽहं महत्यज्ञानसागरे॥

त्राहि मां देवदेवेश त्वामृतेऽन्यो न रक्षिता।

स्वजन्मवासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च॥

जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः।

शान्तिरस्तु शिवं चास्तु धनविख्यातिराज्यभाकू॥

हे देवदेवेश्वर! हे हरे! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे सर्वपापहन्ता प्रभो! दुःख तथा शोकसे परिपूर्ण इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे देवकीनन्दन ! हे श्रीपते ! हे हरे! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! जो एक बार भी आपका स्मरण करते हैं, उन सभीको आप दुराचरणके दुःखसे उबार लेते हैं। हे देव! मैं भी वैसा ही इस संसारके अत्यन्त दुराचरणमें फँसा हुआ हूँ, आप मेरा भी इस शोकरूपी सागरसे उद्धार करें। हे राजीवलोचन! मैं इस गहन अज्ञानरूपी संसारसागरमें डूबा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें। हे देवदेवेश! आपके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई रक्षक नहीं है। है स्वजन्मा! वासुदेव! गोद्विजहितकारी! जगत्त्राता! कृष्ण! गोविन्द! आपको बारम्बार नमस्कार है। आपकी कृपासे मुझे शान्ति प्राप्त हो, मेरा कल्याण

हो और धन, यश तथा राज्यवैभवका मैं अधिकारी बनूँ ।