गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
123 - भीष्मपञ्चक व्रत
ब्रह्माजीने कहा - अब मैं कार्तिकमासमें होनेवाले व्रतोंको कहूँगा। इस मासमें स्नान करके व्रतीको भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। व्रती एक मासतक एकभक्त व्रत कर, नक्त व्रत कर, अयाचित व्रत कर, दुग्ध, फल, शाक आदिका आहार कर अथवा उपवास कर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेसे वह व्रती सभी पापोंसे मुक्त होकर समस्त कामनाओंके साथ - साथ भगवान् हरिको प्राप्त कर लेता है।
भगवान् हरिका व्रत करना सदैव श्रेष्ठ है, किंतु सूर्यके दक्षिणायनमें चले जानेपर यह व्रत अधिक प्रशस्त होता है। उसके बाद इस व्रतका काल चातुर्मासमें श्रेयस्कर है। तदनन्तर इस व्रतका उचित काल कार्तिकमास है। इसके बाद भीष्मपञ्चक इस व्रतके लिये श्रेष्ठ समय है किंतु कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथि इस व्रतके शुभारम्भके लिये सर्वश्रेष्ठ काल होता है। अत: इसी तिथिसे इस व्रतका शुभारम्भ करना चाहिये। उपासक इस दिन प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन - इन तीनों सन्ध्याओंमें स्नान कर यवादि पदार्थोसे पितृगण आदिकी नैत्यिक पूजा करनेके पश्चात् भगवान् हरिका पूजन करे। वह मौन होकर घृत, मधु, शर्करादि तथा पञ्चगव्य एवं जलसे हरिकी मूर्तिको स्नान कराये और कर्पूरादि सुगन्धित द्रव्यसे श्रीहरिके शरीरका अनुलेपन करे।
तदनन्तर व्रतीको घृतसमन्वित गुग्गुलसे पूर्णिमापर्यन्त पाँच दिनोंतक श्रीहरिको धूप देना चाहिये और सुन्दर - सुन्दर पक्वान्न तथा मिष्टान्नका नैवेद्य अर्पितकर ‘ॐ नमो वासुदेवाय’ इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करना चाहिये।
तत्पश्चात् स्वाहायुक्त अष्टाक्षर - मन्त्र (ॐ नमो वासुदेवाय) - से घृतसहित चावल तथा तिलकी आहुति प्रदान करनी चाहिये।
व्रती पहले दिन कमलपुष्पसे भगवान् हरिके दोनों चरणोंका पूजन करे। दूसरे दिन बिल्व पत्रसे उनके जानु (जंघा) - प्रदेशकी पूजाकर तीसरे दिन गन्धसे नाभि देशकी पूजा करे। चौथे दिन बिल्व पत्र तथा जवापुष्पसे उनके स्कन्ध भागका पूजन करके पाँचवें दिन मालतीके पुष्पोंसे उनके शिरो भागका पूजन करना चाहिये। व्रती भूमिपर ही शयन करे और उक्त पाँच दिनोंतक क्रमश: पहले दिन गोमय, दूसरे दिन गोमूत्र, तीसरे दिन दही, चौथे दिन दुग्ध और पाँचवें दिन घृत - इन पाँचों पदार्थोंसे निर्मित पञ्चगव्यका प्राशन रात्रिमें करे। ऐसा व्रत करनेवाला व्रती भोग और मोक्ष दोनोंका अधिकारी हो जाता है।
कृष्ण एवं शुक्ल दोनों पक्षोंकी एकादशीका व्रत हमेशा करना चाहिये। यह व्रत उस समस्त पाप समूहका विनाश करता है, जो प्राणीको नरक देनेवाला है। यह व्रतीको सभी अभीष्ट फल प्रदान करता है और अन्त समयमें उसे विष्णुलोक भी दे देता है।
पहले दिन शुद्ध एकादशी, दूसरे दिन शुद्ध द्वादशी तथा द्वादशीकी निशा (रात्रि) - के अन्तमें अर्थात् तीसरे दिन त्रयोदशी हो तो ऐसी एकादशी तिथिमें सदा श्रीहरिका संनिधान रहता है। यदि दशमी और एकादशी तिथि एक ही दिन होती है तो इसमें असुरोंका निवास रहता है। अत: यह एकादशी व्रतके लिये उपयुक्त नहीं मानी जाती।
एकादशीको उपवासकर द्वादशीमें पारणा करनी चाहिये। सूतक (वंशमें किसीकी उत्पत्ति) और मृतक (वंशमें किसीके मरण) - की स्थितिसे होनेवाले अशौच कालमें भी यह व्रत करना चाहिये।
हे मुने! यदि चतुर्दशी और प्रतिपदा तिथि पूर्व तिथिसे विद्ध है तो इन तिथियोंमें भी उपवास करना चाहिये।
प्रतिपदासे मिश्रित पौर्णमासी और अमावास्या तिथि, तृतीयासे मिश्रित द्वितीया तिथि, चतुर्थीसे संगत तृतीया तिथि, तृतीयासे युक्त चतुर्थी तिथिको उपवास करे। षष्ठीसे असंयुक्त पञ्चमी तिथि और षष्ठीसे युक्त सप्तमी तिथिको उपवास किया जाना चाहिये।