गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
229 - विष्णुपूजामें श्रद्धा - भक्तिकी महिमा
सूतजीने पुन: कहा - हे शौनक! समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् हरिकी आराधना ही सार है। पुरुष सूक्तके (‘सहस्रशीर्षा पुरुष:’आदि 16 मन्त्र ‘पुरुषसूक्त’- रूपमें प्रसिद्ध हैं। ये मन्त्र सभी वेदोंकी संहितामें उपलब्ध है।)द्वारा जो मनुष्य पुष्प और जल आदि उस परात्पर देवको समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर जगत्की पूजा कर लेता है। जो विष्णुकी पूजा नहीं करते, उन्हें ब्रह्मघाती समझना चाहिये। जिन भगवानसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और यह समस्त चराचर जगत् जिनसे व्याप्त है, उन विष्णुका जो ध्यान नहीं करता, वह विष्ठाका कृमि होता है। नरक लोकमें होनेवाले कष्टोंसे संतप्त हो रहे पापी जीवसे यमराज स्वयं पूछते हैं कि क्या तुमने कष्ट विनाशक भगवान् विष्णु देवका पूजन नहीं किया था? द्रव्योंका अभाव होनेपर मात्र जलसे ही पूजा करनेपर जो देव प्रसन्न होकर स्वयं अपने ही लोकको दे देते हैं, क्या तुमने उनकी पूजा नहीं की थी?
श्रद्धापूर्वक की गयी पूजासे संतुष्ट भगवान् हृषीकेश मनुष्यका जो उपकार करते हैं, वह न माता करती है, न पिता करता है और न तो उसका भाई ही करता है। वर्णाश्रम - धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्यके द्वारा यदि भगवान् विष्णुकी पूजा होती है तो वे (श्रीविष्णु) उस पूजासे संतुष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है, जो उनको संतुष्ट कर सके। न तो वे प्राणियोंके द्वारा दिये गये विभिन्न प्रकारके दानसे उतना संतृप्त होते हैं, न तो पुष्पोपहार और भाँति - भाँतिके सुगन्धित पदार्थोंके अनुलेपनसे उतना संतुष्ट होते हैं, जितना भक्तिसे। सम्पत्ति, ऐश्वर्य, माहात्म्य, पुत्र - पौत्रादिक संतान तथा अन्यान्य कर्मसम्पादनसे भी भगवान् हरि संतुष्ट नहीं होते। विमुक्तजनोंके लिये भी हरिका ऐक्य श्रीहरिकी आराधनासे ही प्राप्त होता है; क्योंकि श्रीहरिकी आराधना ही ऐक्यभावका मूल है।