गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
117 - अनंग त्रयोदशी व्रत
ब्रह्माजीने कहा - हे व्यास! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिमें अनंग त्रयोदशीव्रत होता है। इस तिथिमें मल्लिका - वृक्षकी दतुअन निवेदितकर धत्तूरके पुष्प एवं फलोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर 'अनङ्गयेति०' इस मन्त्रसे भगवान् शिवको मधुका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। पौषमासमें भगवान् योगेश्वरका बिल्वपत्र, कदम्बके दतुअन, चन्दन तथा कृसर आदि नैवेद्यसे पूजन करना चाहिये।
हे मुने! माघमासमें भगवान् नटनागर शिवकी कुन्द - पुष्प तथा मौक्तिक मालासे पूजा करके उन्हें पाकड़वृक्षकी दतुअन और पूरिका (पूड़ी) - का नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। फाल्गुनमासमें मरुबक (मंडक) नामक पुष्पोंसे भगवान् वीरेश्वरकी पूजा करनी चाहिये तथा उन्हें शर्करा, शाक, माँड़ और आम्र - वृक्षकी दतुअन निवेदित करे।
चैत्रमासमें भगवान् सुरूपकी पूजा करनी चाहिये और रात्रिमें उन्हें कर्पूरका प्राशन देना चाहिये। दन्तधावनके लिये वटवृक्षकी दतुअन तथा नैवेद्यके निमित्त शष्कुली (पूड़ी) प्रदान करे। वैशाख मासमें अशोक वृक्षके पुष्पोंसे भगवान् शिवका दमनक (संहारकारक) स्वरूप पूजनीय होता है। इन महास्वरूप धारी देवको नैवेद्यमें गुड़ और भात, दन्तधावनके लिये गूलर - वृक्षकी दतुअन और प्राशनके लिये जातिफल अर्पित करना चाहिये।
ज्येष्टमासमें भगवान् प्रद्युम्नका पूजन चम्पक - पुष्पसे करे और बिल्व - वृक्षकी दतुअन एवं लवङ्गांश (लौंग फलके टुकड़े) - के नैवेद्य समर्पित करना चाहिये। आषाढ़मासमें उमाभद्रकी पूजा करनी चाहिये। इसमें अगुरुकी गन्ध, अपामार्गकी दतुअन उन्हें प्रदान की जाती है।
श्रावणमासमें भगवान् शूलपाणि शिवकी पूजा होती है। उन्हें करवीर - पुष्प, गन्ध, घृतादिसे युक्त भोजन तथा करवीर - वृक्षकी दतुअन निवेदित की जाती है। भाद्रपदमासमें सद्योजात शिवका पूजन बकुल - पुष्प और अपूप (पूए) - के नैवेद्यसे करना चाहिये। आश्विन मासमें चम्पक - पुष्प, स्वर्णणललशके जल और सुवासित मोदकके नैवेद्यसे तथा दमनककी दतुअनसे सुराधिप शिवके पूजनका विधान है। कार्तिकमासमें खदिर (कत्थे) - की दतुअनसे तथा बेरकी दतुअन, मदन - पुष्प, दूध और शाक प्रदान करते हुए वर्षपर्यन्त कमल - पुष्पसे शिवकी पूजा करनी चाहिये।
उपर्युक्त विधिसे पूजन करनेके पश्चात् रतिसहित अनंग - कामदेवको स्वर्णसे निर्मित मण्डलके अन्तर्गत स्थापित करके उनकी गन्धादिसे पुनः पूजा कर तिल और चावल आदिसे संयुक्त हवन - सामग्रीसे उन्हें दस हजार आहुतियाँ प्रदान करनेका विधान है। उस दिन रात्रिमें जागरण करे तथा गीत - वाचद्यादिसे आमोद - प्रमोद करते हुए प्रभातकालमें उन देवकी फिरसे पूजा करके ब्राह्मणको शय्या , पात्र, छत्र, वस्त्र तथा पदत्राणके लिये जूतेका दान देकर भक्तिपूर्वक गौ और ब्राह्मणको भोजन देकर मनुष्यको कृतकृत्य होना चाहिये। व्रतकी समाप्तिपर उद्यापन करना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रती लक्ष्मी, पुत्र, आरोग्य, सौभाग्य तथा स्वर्ग प्राप्त करता है।