गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
126 - विष्णु मण्डल - पूजाविधि
ब्रह्माजीने कहा - जिस पूजाको करनेसे लोग परमगतिको प्राप्त हो गये हैं, मैं उसी भुक्ति एवं मुक्ति देनेमें समर्थ श्रेष्ठ पूजाका विधिवत् वर्णन करूँगा।
व्रतीको सर्वप्रथम एक सामान्य पूजा मण्डलका निर्माण कर द्वारदेशसे उसमें पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये। मण्डलके द्वारदेशमें धाता, विधाता और महानदी गङ्गा, यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर द्वारदेशपर ही श्री, दण्ड, प्रचण्ड और वास्तु पुरुषकी पूजाकर मध्य भागमें आधार शक्ति, कूर्मदेव एवं अनन्तका पूजन करे। इसके बाद पूजक पृथिवी, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान,अवैराग्य,अनैश्वर्यकी पूजा कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका तथा केसरादि भागोंपर करे। तदनन्तर सत्त्व, रजस् और तमस् गुणोंकी पूजा करके उस व्रतीको यथाविहित स्थानपर सूर्यादि ग्रह मण्डलोंकी और विमलादि शक्तियोंकी भी पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद मण्डलके कोण भागमें दुर्गा, गणेश, सरस्वती और क्षेत्रपाल देवोंकी तथा आसन और मूर्तिकी पूजा कर व्रती भगवान् वासुदेव और बलभद्रका स्मरण करता हुआ महात्मा अनिरुद्ध तथा नारायणकी पूजा करे। वह उनके हृदयादि सम्पूर्ण अङ्ग, शंख, चक्र तथा गदादि आयुधकी पूजाकर श्री, पुष्टि, गरुड, गुरु और परम गुरुकी पूजा करे। तदनन्तर उसे इन्द्रादि आठों दिक्पालकी पूजा उनकी ही दिशाओंमें करके अधोभागमें नाग तथा ऊर्ध्व भागमें ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये। आगम शास्त्रमें निर्दिष्ट विधिके अनुसार विष्वक्सेन देवकी पूजा ईशान कोणमें करके उस मण्डलकी पूजाको पूर्ण करना चाहिये।
जो मनुष्य इस विधिके अनुसार एक बार भी भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, उस महात्माका पुनर्जन्म इस संसारमें नहीं होता। पुण्डरीकाक्ष गदाधर भगवान् विष्णु एवं ब्रह्माकी पूजा करनेसे पुन: जन्म नहीं होता।