167 - वातरक्त - निदान

धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! अब मैं आपसे वातरक्त - निदान बतलाऊँगा, उसे सुनें।

प्राय: स्वास्थ्य - विरुद्ध भोजन तथा क्रोध करनेवाले, दिनमें सोने और रात्रिमें जागरण करनेवाले तथा सुकुमार एवं मिथ्या आहार - विहार करनेवाले, स्थूल शरीरवाले और सुखीजनोंका रक्त वृद्धवातसे प्रकुपित हो जाता है। चोट लगनेसे अथवा वमन एवं विरेचन आदिद्वारा शुद्ध न होनेवाले मनुष्योंका रक्त दूषित हो जाता है। वात - दोष पैदा करनेवाले एवं शीतल पदार्थोके सेवनसे वायु - वृद्धि होती है, वह क्रुद्ध होकर विमार्गगामी हो जाता है। इस प्रकारसे प्रवहमान वह वायु रक्त-स्रोतोंसे अवरुद्ध होकर पहले रक्तको ही दूषित करता है। तदनन्तर मांसादिक अन्य धातुओंको भी दूषित करता है। पहले गुदाभागको पीड़ितकर बादमें यह सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। इस वात - दूषित रक्तको वातरक्त (च०चि० 29; सु०चि०1; अ०स०नि०अ०16 ) कहा जाता है। विशेष रूपसे यह दोष वमनादि उपद्रवों तथा पाँव लटकाकर बैठनेवाली सवारी आदिसे होता है।

कुष्ठरोगके जो पूर्वरूप होते हैं, प्राय:वे ही वातरक्त - रोगके भी होते हैं। इस रोगके होनेपर घुटना, जंघा, ऊरु, कटि, स्कन्ध, हाथ, पैर और संधि - स्थानोंमें खुजली, स्फुरण, सूचिकाभेद, गुरुता और इन्द्रियसुन्नताके दोष होते हैं। ये दोष बार - बार उत्पन्न होकर शान्त हो जाते हैं और पुनः उभर भी जाते हैं।

कभी दोनों पैरोंके मूलभागमें आश्रय लेकर अथवा कभी दोनों हाथोंके मूलमें स्थित होकर, यह कुपित वातरक्त - दोष प्राणीके सम्पूर्ण शरीरको वैसे ही परिव्याप्त कर लेता है, जैसे चूहेका विष कुपित होकर धीरे - धीरे पूरे शरीरमें व्याप्त हो जाता है। वह वातरक्त सर्वप्रथम रोगीके चर्म - भागपर उत्पन्न होकर मांस - भागमें आश्रय ग्रहण करता है। उसके बाद सभी धातुओंको आश्रय बना लेता है। इसे गम्भीर नामक वातरक्त कहते हैं। उत्तान वातरोगमें रोगीके कटि आदि स्थानोंका चर्म, ताम्र या श्यामवर्णका हो जाता है। वहाँपर शोथ तथा ग्रथित पाक उत्पन्न होता है। वह प्रकुपित वायु रोगीकी हड्डियों और मज्जा - भागमें जाकर वहाँ आश्रय लेकर छेदनेके समान पीड़ा करता हुआ चक्रके समान घूमता हुआ शरीरके अङ्गोंको टेढ़ा - मेढ़ा कर देता है। तदनन्तर सब ओरसे शरीरमें प्रवहमान वह वायु अन्तमें रोगीको खञ्ज अथवा लँगड़ा बना देता है।

शरीरमें वाताधिक्य वातरक्त - रोग होनेपर अत्यधिक शूल, फड़कन तथा टूटन - भरी पीड़ाकी अनुभूति होती है। उभरे हुए शोथमें रूक्षता, कृष्ण या श्यामवर्णता आ जाती है। इसमें शोथ कभी बढ़ जाता है और कभी घट जाता है । रोगीकी धमनियों और अँगुलियोंके संधि - स्थानोंमें संकुचन, अङ्गग्रह तथा अत्यन्त वेदनाजन्य कष्ट होता है। इसमें शीतल पदार्थोसे अरुचि एवं उसके सेवनसे वृद्धि, स्तम्भन, कम्पन और इन्द्रियशून्यताके दोष भी आ जाते हैं।

रक्ताधिक वातरक्त - रोगमें शोथ अत्यन्त पीड़ासे युक्त होता है। इसमें सूचिका - भेदजन्य पीड़ा भी होती है। इसका वर्ण ताँबेके समान होता है। यह चुनचुनाता भी रहता है। इसमें ललाई रहती है तथा खुजली और क्लेद होता है। स्निग्ध पदार्थ लगानेसे या उसे रूक्ष रखनेसे शान्ति नहीं मिलती।

पित्ताधिक वातरक्तमें अत्यन्त दाह, सम्मोह, स्वेद, मूर्च्छा, मद, तृष्णा, स्पर्श, असहत्व, अत्यधिक पीड़ा, शोथ, पककर फूटनेवाला फोड़ा तथा अत्यन्त ऊष्माके लक्षण दिखायी देते हैं।

कफाधिक वातरक्तमें कठोरता, भारीपन, शून्यता, स्निग्धता, शीतलता, खुजली और मन्द पीड़ा होती है। द्वन्द्ज दोषमें दो तथा त्रिदोषजमें तीनों दोषोंके लक्षण उभरते हैं। इनमें एक दोषजन्य रोग अपेक्षित चिकित्सासे साध्य है। द्वन्दज दोष नामक वातरक्त - रोग अथक चिकित्सोपचारके द्वारा रोका जा सकता है। किंतु जो रोग त्रिदोषजन्य है, उसे तो छोड़ देना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये प्रयास करना व्यर्थ है, वह असाध्य होता है। इनमें रक्तपित्तजन्य वातरोग तो बड़ा ही कठिन माना गया है।

प्रकुपित वायु रोगीके शरीरस्थ अङ्ग - विशेषके रक्तको नष्ट करके उसके संधि - स्थानोंमें प्रविष्ट हो जाता है। तदनन्तर परस्पर एक - दूसरेको भली प्रकारसे अवरुद्ध करके तज्जनित वेदनासे वह रोगीके प्राणोंका अपहरण करता है।

प्राण, व्यान, समान, अपान और उदान - इस पश्चात्मक वायु - समूहके बीच प्राणवायु जब रूक्षता, चञ्चलता, लंघन, अतिशय आहार, अभिघात, मलमूत्रादिक वेगावरोध तथा कृत्रिम वेग - संचालनके प्रयासमें कुपित होकर नेत्रादिक इन्द्रियोंमें उपघात करता है तो उसके कारण पीनस, दाह, तृष्णा, खाँसी और श्वासादिके रोग उत्पन्न होते हैं।

कुपित उदानवायु जत्रु (ठोढ़ी) और मूद्धामें आश्रय लेकर कण्ठावरोध, मलभेद, वमन, अरुचि, पीनस तथा गलगण्डादिक दोषोंको जन्म देता है।

अत्यधिक दूरकी यात्रा, स्नान, अतिशय क्रीड़ा, अत्यन्त विषय - भोगकी चेष्टा, स्वास्थ्य - विरुद्ध व्यवहार, रूक्षता, भय, हर्ष तथा विषादके कारण प्राणीके शरीरमें स्थित व्यान नामक वायु दूषित हो उठता है। तदनन्तर वह रोगीके पुंसत्व (पुरुषत्व), उत्साह और शक्तिका हास कर देता है। उसके चित्तमें शोक तथा विश्रमकी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उसे ज्वर, सम्पूर्ण शरीरमें सूचिका - भेदके समान वेदना, रोमाञ्च, स्पर्श - शून्यता, कुष्ठ, विसर्प और सभी अंगोंमें पीड़ा होती है।

स्वास्थ्य - विरुद्ध अजीर्णकर, शीतल तथा संकीर्ण दोषसे पूर्ण भोजन, असामयिक शयन और जागरण आदिसे समान नामक वायु दूषित हो जाता है। इसके प्रकुपित होनेसे शूल, गुल्म, ग्रहणी आदि सामान्य यकृतजन्य तथा कामाश्रित रोगोंकी उत्पत्ति होती है।

अत्यन्त रूक्ष तथा भारी अन्नके सेवन, मल - मूत्रका वेग रोकने, अतिशय भार ढोने, वाहनकी अधिक सवारी करने, मदिरापान, अत्यधिक देरतक खड़े होने तथा अधिक घूमने - फिरनेसे अपानवायु कुपित हो जाता है। वह प्रकुपित वायु प्राणीके शरीरमें पक्‍वाशयसे आश्रित समस्त रोगोंको उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त रोगीके शरीरमें मूत्र, वीर्य, अर्श तथा मलावरोध आदिसे सम्बन्धित बहुतसे रोग प्रकट हो जाते हैं।

तन्द्रा, स्तिमिता, गुरुता, स्निग्धता, अरुचि,आलस्य, शैत्य, शोथ, अग्निमान्द्य, कटु और रूक्ष पदार्थोंकी अभिलाषा आदि लक्षणोंसे युक्त वायुको साम अर्थात्‌ आम - सदृश कहते हैं। जिसमें तन्द्रा आदिके विपरीत लक्षण होते हैं, वह वायु निराम कहलाता है।

साम - निरामके लक्षण बताकर अब वायुके आवरण और भेदोंका वर्णन किया जाता है। पित्तदोषसे आवृत वात - विकार होनेपर दाह, तृष्णा, शूल, भ्रम और आँखोंके आगे अन्धकार छा जाता है। कटु, उष्ण, अम्ल तथा लवणके प्रयोगसे रोगीमें विदाह और शीतकी अभिलाषा बढ़ जाती है। कफावृत वात - विकारमें रोगी शीतल, रूक्ष और उष्ण भोजन करनेका इच्छुक होता है। उसको शीतलता, भारीपन, शूल, लंघन, अग्निदाह, कटु घृतयुक्तमुख तथा अधिक तृष्णाके दोष घेर लेते हैं। इस कफावृत रोगमें अङ्ग - दर्द, उबकाई और अरुचि भी होती है।

रक्तावृत वातरोग होनेपर रोगीके चर्म तथा मांसमें दाह और पीड़ा अधिक होती है। रोगीके शरीरमें लाल वर्णका शोथ हो जाता है और मण्डलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं। वायुके मांसाश्रित होनेपर शोथ बड़ा कठोर लगता है। उस रोगीको उबकाई आती है और शरीरमें छोटी - छोटी फुंसियाँ निकलने लगती हैं। ऐसे शोथमें रोमाञ्च भी होता है और शरीर चींटियोंसे व्याप्त हुएके समान प्रतीत होता है। मेदसे आवृत वायु - विकारमें यह शोथ शरीरमें चलायमान, मृदु तथा शीतल होता है और अरुचिकर भी होता है। मेदासे आवृत वात अन्य वातरोगोंकी अपेक्षा अत्यन्त कष्टसाध्य है। इसको आढ्यवातके समान समझना चाहिये। इस रोगके होनेपर उत्पन्न हुआ शोथ स्पर्श तथा आच्छादन करनेसे उष्ण तथा आवरण हटा देनेपर शीतल लगने लगता है।

वायुके मज्जावृत शोथ होनेपर उक्त लक्षणके विपरीत लक्षण दिखायी देते हैं। उसमें फैलाव और कसाव होता है, शूलजनित पीड़ा होती है तथा दोनों हाथोंसे मर्दन करनेपर रोगीको सुख प्राप्त होता है।

शुक्रावृत वात - शोथ होनेपर शुक्रमें अधिक वेग नहीं रह जाता। वायुके अन्नसे आवृत होनेपर भोजन करनेपर रोगीके कुक्षिभागमें पीड़ा होती है और भोजनके पच जानेपर पीड़ा शान्त हो जाती है। मूत्रसे वायुके आवृत हो जानेपर मूत्रका निकलना बंद हो जाता है और वस्ति - स्थानमें वेदना होने लगती है। वायुके द्वारा पुरीषके आवृत होनेपर गुह्यभागमें विशेष प्रकारका विबन्ध हो जाता है। आरेसे काटनेपर होनेवाली पीड़ाके समान रोगीको पीड़ा होती है। ऐसे वातरक्त - दोषके आवरण - रोगमें ज्वरसे पीड़ित रोगी यथाशीघ्र धराशायी होकर मूच्छित हो जाता है। विबन्धद्वारा मल पीड़ित होकर सूखा हुआ बड़ी कठिनतासे और बहुत देरमें निकलता है।

वायुद्वारा सभी धातुओंके आवृत होनेपर रोगीके कटि - प्रदेश, वंक्षण और पीठमें पीड़ा होती है। विलोम भावको प्राप्त हुआ वायु रोगीके हृदयको पीड़ित करता है। पित्तज दोषसे प्राणवायुके आवृत होनेपर भ्रम, मूर्च्छा, पीड़ा तथा दाहका उपद्रव रोगीके शरीरमें होता है।

पित्तसे व्यानवायुके आक्रान्त होनेपर पीड़ा, तन्द्रा, स्वरभ्रंश और सम्पूर्ण शरीरमें दाहकी उत्पत्ति होती है। समानवायुके आवृत होनेपर क्रमशः अङ्गचेष्टा, अङ्गभङ्ग, वेदनासहित संताप, तापविनाश, पसीना, रूक्षता और तृष्णाका उपद्रव होता है। अपानवायुके आवृत होनेसे रोगीके शरीरमें दाह होता है और उसके मलका वर्ण हल्दीके समान पीला हो जाता है । स्त्रियोंमें रजवृद्धि (या रोगवृद्धि ), ताप, आनाह तथा प्रमेह नामक रोग भी उसके शरीरमें जन्म ग्रहण कर लेते हैं।

श्लेष्मके द्वारा प्राणवायुके आवृत होनेपर नादस्रोतमें अवरोध, खखार, स्वेद, श्वास तथा नि:श्वास - इनमें विविधता होती है। उदानवायुके कफसे आवृत होनेपर शरीरमें भारीपन, अरुचि, वाक्रोध, स्वरक्षय, बल और वर्णका नाश होता है। व्यानवायुके कफसे आवृत होनेपर पर्व और अस्थियोंमें जकड़न, सम्पूर्ण शरीरमें भारीपन, अत्यधिक स्थूलता आ जाती है। समानवायुके कफसे आवृत होनेपर कर्मेन्द्रियोंमें अज्ञानता, शरीरमें पसीनेकी कमी, अग्निमन्दता तथा अपानवायुके कफसे आवृतहोनेपर मल - मूत्रकी अधिक प्रवृत्ति होती है।

इस प्रकार वातरक्त - रोग बाईस प्रकारका माना गया है। क्रमश: प्राणादि वायु परस्पर आक्रान्त होनेसे बीस प्रकारके आवरण होते हैं। प्राणवायु जब अपानवायुको आवृत कर लेता है, तब उबकाई, श्वासरोध, प्रतिश्याय, शिरोग्रह, हृदयरोग और मुखशोष - ये उपद्रव होते हैं। उदानवायुके द्वारा प्राणवायुके आवृत होनेपर रोगीकी शक्तिका विनाश होता है। वैद्यको यथोचित विचार करके ही सभी प्रकारके वात - आवरणोंके भेदोंको जानना चाहिये। सभी वात - दोषोंके स्थानोंकी विवेचना करके उसके दुष्ट कर्मोंकी वृद्धि और हानिपर चिन्तन करके भी आवरणोंका विभाग समझना चाहिये।

प्राणादिक पाँचों वायु - समूहोंके (पृथक्‌ - पृथक्‌) पित्त - दोषजन्य आवरण होते हैं। वातमिश्रित पित्तादिके जिन निवास - स्थानोंकी चर्चा ऊपर की गयी है, वे उन्हीं अपने दोषोंसे मिश्रित हैं। मिश्रित पित्तादिक दोषोंके कारण वे भी अनेक प्रकारके आवरण रोग माने गये हैं। अत: विद्वान्‌ चिकित्सक सचेत होकर अपने लक्षण - ज्ञानके अनुसार उन दोषोंका चिन्तन करे। चिकित्सकके लिये अपेक्षित है कि धीरे - धीरे अपने लक्षणोंके अभ्युदयसे निश्चित एवं दृढ़ हुए उन रोगोंका बार - बार परीक्षण करके ही उपचार करे।

प्राणवायु प्राणीके जीवनका आधार तथा उदानवायु बलका आधार कहा गया है। शरीरमें उन दोनोंके पीड़ित होनेसे प्राणीके आयु और बल दोनोंकी हानि होती है।

आवृत हुए सभी वायु - दोष अपने - अपने लक्षणोंसे शरीरपर स्पष्ट हो गये हों अथवा स्पष्ट न हुए हों या वे स्थानच्युत होनेके कारण समझसे परे हो रहे हों अथवा उपद्रवविहीन हो गये हों, वे असाध्य ही होते हैं। चिकित्सकके द्वारा किये जानेवाले प्रयाससे भी वे कष्ट - साध्य ही होते हैं।

उपर्युक्त उन आवृत वायु - दोषोंकी उपेक्षा करनेसे प्राणियोंके शरीरमें विद्रधि, प्लीहा, हृद्रोग, गुल्म तथा अग्निमन्दता आदिके उपद्रवोंका आविर्भाव होता है।

हे सुश्रुत! सभी रोगोंके ज्ञान एवं मनुष्यादि समस्त प्राणियोंकी आयुवृद्धिके लिये मैंने आत्रेय मुनिद्वारा कथित उनके निदानको भली प्रकारसे बतला दिया है। अतः उसी प्रकारसे सभी रोगोंका विचार करके चिकित्सकको तत्सम्बन्धित रोगकी चिकित्सा करनी चाहिये।

मधु, घृत और गुड़से संयुक्त त्रिफला (हरीतकी, आमलकी और बहेड़ा) - चूर्ण सभी रोगोंका विनाशक है। त्रिफला - चूर्णको यदि केवल जलके साथ नित्य - प्रात: प्रयोगमें लाया जाय, तब भी वह सभी रोगोंका नाश करनेवाला होता है। शतावरी, गुडूची, चित्रक और विडंगके साथ भी प्रयुक्त त्रिफला सभी रोगोंकों विनष्ट कर देती है। शतावरी, गुडूची, अग्निमन्द्य, चित्रा, सोंठ, मूसली, बला, पुनर्नवा, बृहती, निर्गुण्डी, निम्बपत्र, भृंगराज, आँवला तथा वासक अथवा उसके ही रससे सात बार या एक बार भावित त्रिफला सभी रोगोंका निवारक है। पूर्वोक्त कही गयी औषधियोंकी जैसी प्राप्ति हो, उसी प्रकारसे उनके द्वारा तैयार चूर्ण, मोदक, वटी, घृत, तेल अथवा क्वाथ भी सर्वरोगहर्ता है। उनकी आनुपातिक मात्रा एक पल, आधा पल, एक कर्ष अथवा आधा कर्ष रोगीके लिये उपादेय मानी गयी है।