213 - सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण

सूतजीने कहा - हे शौनक! श्रीहरिसे सुनकर ब्रह्माजीने व्याससे सब कुछ देनेवाले ब्राह्मणादि वर्णोंके सदाचारको जैसे कहा है, उसी प्रकार मैं कहता हूँ।

श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र) - का भली। प्रकारसे अध्ययन करके श्रुतिप्रतिपादित कर्मका पालन। करना चाहिये। (क्योंकि श्रुति ही सब कर्मोंका मूल है।) यदि (उपलब्ध) श्रुतियोंमें कोई कर्म ज्ञात नहीं।

हो रहा है तो उसको स्मृतिशास्त्रके अनुसार जानकर करना चाहिये (क्योंकि स्मृतिशास्त्र भी श्रुतिमूलक होनेके कारण ही कर्मके बोधमें प्रमाण माने जाते हैं) और स्मार्तधर्मके पालनमें असमर्थ होनेपर विद्वान्‌ व्यक्तिको चाहिये कि वह सदाचारका पालन करे। कर्ममार्गका दर्शन करानेके लिये श्रुति तथा स्मृति - ये नेत्रस्वरूप हैं।

श्रुतिमें कहा गया धर्म परम धर्म है। स्मृति और शास्त्रसे प्रतिपादित धर्म अपर धर्म है। इस प्रकार श्रुति, स्मृति और शिष्टाचारसे प्राप्त धर्म - ये तीन प्रकारके सनातनधर्म हैं।

सत्य, दान, दया, निर्लोभता, विद्या, यज्ञ, पूजा और इन्द्रियदमन - ये शिष्टाचारके आठ पवित्र लक्षण कहे गये हैं। पूर्व कालमें लोगोंके शरीर और इन्द्रिय सत्त्वगुणप्रधान एवं तेजोमय होते थे, अतः जिस प्रकार कमलपत्रपर जल नहीं रुकता उसी प्रकारसे उनके शरीर तथा इन्द्रियोंमें पाप नहीं टिक पाते थे।

सत्त्वगुणके विकासके लिये सनातनधर्म (वर्णाश्रम - धर्म, सदाचार आदि) - के पालनका सर्वाधिक महत्त्व है और इनकी प्रमुखता युगविशेष, स्थानविशेष (भारतवर्ष आदि) - की दृष्टिसे निर्धारित होती है, इसी दृष्टिसे यहाँ इतना निरूपण किया जा रहा है। सत्य, यज्ञ, तप तथा दान - ये धर्मके लक्षण हैं। बिना दिये गये द्रव्यको ग्रहण न करना, दान, अध्ययन, जप, विद्या, धन, तपस्या, पवित्रता, श्रेष्ठ कुलमें जन्म, निरोगता और संसारके बन्धनसे मुक्ति आदिके मूलमें धर्मका आचरण ही प्रधान है। धर्मसे सुख तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति होती है और इस तत्त्वज्ञानसे ही मोक्ष प्राप्त होता है।

शास्त्रोंके अनुसार पालन किये जाने योग्य तथा सनातन कालसे चले आ रहे यज्ञ, अध्ययन और दान - ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके सामान्य धर्म हैं। यज्ञ कराना, अध्यापन तथा सदाचारवान्‌ विशुद्ध अधिकृत व्यक्तिसे प्रतिग्रह (दान) लेना - ये तीन प्रकारकी वृत्ति (जीविका) मुनियोंने श्रेष्ठ (ब्राह्मण) वर्णके लिये कही है। शस्त्रोपजीवी होना तथा प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रियवर्णका धर्म है। पशुपालन, कृषिकर्म तथा व्यापार वैश्यवर्णकी वृत्ति कही गयी है। द्विजातिमें भी आनुपूर्वी क्रमसे सेवा करनेका विधान (इसका आशय यह है - क्षत्रिय ब्राह्मणकी सेवा करे तथा वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियकी सेवा करे। (वैश्यके द्वारा क्षत्रियकी सेवाकी मर्यादा शास्त्रोंमें निर्धारित है।) है। शूद्रका तो एकमात्र कर्तव्य है द्विजातिकी सेवा करना।

गुरुके सान्निध्यमें रहना, अग्निकी शुश्रूषा (अग्निहोत्र) करना तथा स्वाध्याय करना - यह ब्रह्मचारीका धर्म है। वह तीनों संध्याओंमें स्नानकर संध्याकालीन व्रतका पालन करे। स्नानकर्मसे निवृत्त होकर भिक्षाचरण करे। तदनन्तर गुरुके प्रति दत्तचित्त रहकर उनकी ही सेवामें आजीवन लगा रहे। वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कटिप्रदेशमें मूँजकी मेखला, सिरपर जटा, हाथमें दण्ड धारण करे । वह जटाओंको धारण न करके सिरका मुण्डन भी करासकता है, किंतु उसको गुरुके आश्रयमें तो रहना ही चाहिये।

अग्निहोत्र - धर्मका पालन तथा कहे गये अपने विहित कर्मोंके अनुसार जीविकाका पालन, पर्वकी रात्रिको छोड़कर अन्य रात्रियोंमें धर्मपत्नीके साथ रति, (यथाशास्त्र) देवता, पितर तथा अतिथिगणोंकी विधिवत् पूजामें अहर्निश संलग्न रहना और श्रुतियों एवं स्मृतियोंमें कहे गये धर्मोंके अनुसार अर्थोपार्जन करना - यह गृहस्थोंका धर्म है।

जटाधारण, अग्निहोत्रका पालन, पृथ्वीपर शयन, मृगचर्मका धारण, वनमें निवास, दूध, मूल, फल तथा नीवारका भक्षण, निषिद्ध कर्मका परित्याग, तीनों संध्याओंमें स्नान, ब्रह्मचर्यका पालन और देवता तथा अतिथिकी पूजा - यह वानप्रस्थीका धर्म है।

सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग, भिक्षासे प्राप्त अन्नका भोजन, वृक्षकी छायामें निवास, अपरिग्रह, अद्रोह, सभी प्राणियोंमें समानभाव, प्रिय तथा अप्रियकी प्राप्तिमें एवं सुख और दु:खमें समान स्थिति, शरीरकी बाह्य और आभ्यन्तरिक शुद्धता, वाणीमें संयम, परमात्माका ध्यान, सभी इन्द्रियोंका निग्रह, धारणा तथा ध्यानमें तत्परता और भावशुद्धि - ये सभी परिव्राजक अर्थात्‌ संन्यासीके धर्म कहे गये हैं।

अहिंसा, प्रिय और सत्यवचन, पवित्रता, क्षमा तथा दया सभी आश्रमों और वर्णोंका सामान्य धर्म है।

(अहिंसा सूनृता वाणी सत्यशौचे क्षमा दया।

वर्णिनां लिंगिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते॥)

जैसा पूर्वमें कहा गया है उसीके अनुसार शास्त्रविहित अपने - अपने धर्मोंका पालन करनेवाले सभी लोग परमगति अर्थात्‌ मोक्षको प्राप्त करते हैं।

हे शौनक! अब मैं प्रातः काल जागनेसे लेकर रात्रिमें सोनेतक पालन करने योग्य गृहस्थके धर्मका वर्णन करता हूँ। गृहस्थको ब्राह्ममुहूर्तमें निद्राका परित्याग करके धर्म और अर्थका भली प्रकार चिन्तन करना चाहिये तथा शारीरिक कष्ट, उसकी उत्पत्तिक कारण और वेदोंमें कहे गये तत्त्वार्थका भी विचार करना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर शौचादिक क्रियाओंसे निवृत्त होकर, स्नान करना चाहिये और निरलस भावसे समाहितचित्त होकर संध्योपासन करना चाहिये। दन्तधावन एवं स्नानके अनन्तर ही प्रातःकालिक संध्योपासन करना चाहिये। दिनमें मूत्र और मलका परित्याग उत्तराभिमुख होकर करे। रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर करे। दोनों संध्याकालमें दिनके समान ही उत्तराभिमुख होकर मल - मूत्रका त्याग करना चाहिये। रात्रि और दिनमें छाया अथवा अन्धकारके कारण यदि दिशाविशेषका ज्ञान नहीं हो पा रहा है, अथवा कोई ऐसा भय उपस्थित है, जिसके कारण मरणकी सम्भावना है तो अपनी सुविधाके अनुसार जिस किसी भी दिशामें मुख करके मल - मूत्रका त्याग किया जा सकता है। गोमय, अग्निके दहकते अंगार, दीमककी बाँबी, जुते हुए खेत, जल, पवित्र स्थान, मार्ग और मार्गमें विद्यमान विधानयोग्य वृक्षकी छायामें न तो मूत्रका परित्याग करना चाहिये और न तो मलविसर्जन ही।

शौचके पश्चात्‌ मिट्टीसे हाथ - पैर आदि साफ करनेके लिये जलके अन्दरसे, देवगृह, बाँबी, चूहेके बिल, दूसरेके उपयोगमें आयी हुई मिट्टीसे अवशिशष्ट तथा श्मशान भूमिकी मिट्टी ग्रहण न करे। लघुशंका करनेपर लिंगमें एक बार, बायें हाथमें दो बार और दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर जलसे प्रक्षालन करनेपर ही शुद्धि होती है। मलका परित्याग करनेपर लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार, पैरोंमें पाँच बार और दायें हाथमें दस बार मिट्टीका लेप करके उन्हें जलसे स्वच्छ करे। प्रथम बार उपयोगमें लायी जानेवाली मिट्टीकी मात्रा आधा पसर होनी चाहिये। दूसरे और तीसरे बार जो मिट्टी उपयोगमें आती है उसकी मात्रा आधे पसरकी आधी हो जाती है। जो मनुष्य अस्वस्थताके कारण विष्ठा और मूत्रका परित्याग बैठकर नहीं कर सकता है, वह अभी बतायी गयी शास्त्रीय शुद्धिका आधा भागमात्र अपना सकता है। दिनमें विहित शुद्धिका आधा या चौथाई भाग रात्रिमें शुद्धिके लिये धर्मसम्मत है।

यह शुद्धिकी प्रक्रिया स्वस्थ व्यक्तिको लक्ष्य करके कही गयी है। जो व्यक्ति अस्वस्थताके कारण आर्त है, उसको यथासामर्थ्य ही शुद्धिकी प्रक्रिया अपनानी चाहिये। वसा, शुक्र, रक्त, मज्जा, लार, विष्ठा, मूत्र, कानका मैल, कफ, आँसू, आँखका मैल (कीचड़) और पसीना - ये मनुष्यके शरीरके बारह मल हैं। जबतक मनमें शुद्धताकी अवधारणा न हो जाय, तबतक इनके कारण अनुभवमें आनेवाली अशुद्धिके निराकरणमें लगे रहना चाहिये। यहाँपर शुद्धिकी संख्याका जो प्रमाण दिया गया है, वह श्रुतियों और स्मृतियोंके आदेशानुसार है।

शुद्धि दो प्रकारकी है - एक बाह्य और दूसरी आशभ्यन्तरिक। मिट्टी तथा जलसे की जानेवाली शुद्धि बाह्य और भावोंकी शुद्धि ही आभ्यन्तरिक शुद्धि मानी गयी है। शुद्धिका प्रमुख अङ्ग आचमन है, यह तीन बार करना चाहिये। इसके बाद दो बार जलसे मुखका मार्जन, तदनन्तर अंगुष्ठके मूलसे मुखको धोकर तीन बार मुखका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद अंगुष्ठ और तर्जनीसे नासिकाका स्पर्शकर अंगुष्ठ तथा अनामिकासे नेत्र और कानका स्पर्श करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ कनिष्ठा और अंगुष्ठके द्वारा नाभिका स्पर्शकर हथेलीसे हृदयका स्पर्श करना चाहिये। इसके बाद अपनी सभी अंगुलियोंसे सिर और उनके (अंगुलियोंके) अग्रभागसे दोनों बाहुओंका स्पर्श करना चाहिये।

(अब आचमन तथा अंगोंके स्पर्शका फल बताया जाता है।) तीन बार जलका आचमन करके ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद - इन तीनों वेदोंको प्रसन्न करना चाहिये। पहले दो बार मुखका प्रक्षालन करनेसे अथर्वा (वेदविद्‌ ब्राह्मण) और आङ्गीरस (बृहस्पति) - का मुखमें सन्निधान होता है। मुखभागका स्पर्श करनेपर आकाश, नासिका - भागका स्पर्श करनेपर वायु, नेत्रभागका स्पर्श करनेपर सूर्य, कानोंका स्पर्श करनेपर सभी दिशाओंका स्पर्श समझना चाहिये।( मुख और नासिका आदिमें यथाक्रम आकाश तथा वायु आदिके अधिष्ठाता देवता सन्निहित हैं।) मुख तथा नासिका आदिका यथाविधि स्पर्श करनेसे इन अङ्गोमें यथाक्रम इतिहास, पुराण एवं वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) प्रतिष्ठित होते हैं। नाभि प्रदेशका स्पर्शकर प्राणग्रन्थिका और हृदयभागका स्पर्शकर ब्रह्माका स्पर्श समझना चाहिये। मूर्धाके स्पर्शसे रुद्र और शिखाके स्पर्शसे ऋषियोंको प्रसन्न किया जाता है। दोनों बाहुओंको स्पर्श करके यम, इन्द्र, वरुण, कुबेर, पृथिवी तथा अग्निदेवके सान्निध्यका लाभ प्राप्त होता है। अपने दोनों चरणोंमें जलका अभ्युक्षण भगवान्‌ विष्णु और इन्द्र तथा दोनों हाथोंका प्रोक्षण करनेसे भगवान्‌ विष्णुदेवका सांनिध्य प्राप्त होता है।

धार्मिक विधिके अनुसार पृथ्वीका जलसे प्रोक्षण करनेसे वासुकि आदि नाग प्रसन्न होते हैं। धार्मिक विधिके मध्यमें जलका शास्त्रीय उपयोग करते समय उसके बिन्दुओंके गिरनेसे भूतोंके समूह तृप्ति प्राप्तकर प्रसन्न होते हैं। अंगुलियोंके पर्वोंपर अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और पर्वतसमूह निवास करते हैं। द्विजके हाथोंमें जो रेखाएँ होती हैं, उनमें गङ्गा आदि पवित्र नदियाँ स्थित रहती हैं। हाथके तलभागमें सभी तीर्थोंके साथ सोमका निवास है। इसीलिये हाथको पवित्र माना जाता है।

उषाकाल (सूर्योदयसे पूर्व रात्रिशेष) होनेपर यथाविधि शौच - क्रिया करनी चाहिये। तदनन्तर दन्‍तधावन (दतुअन) करके स्नान करे। मुखके पर्युषित (बासी) रहनेपर मनुष्य निश्चित ही अपवित्र रहता है। अतः मनुष्यको प्रातःकाल अवश्य ही दन्तधावन करना चाहिये। दन्‍तधावनके लिये कदम्ब, बिल्व, खैर, कनेर, बरगद, अर्जुन, यूपी, वृहती, जाती, करंज, अर्क, अतिमुक्तक, जामुन, महुआ, अपामार्ग (चिचड़ा - लटजीरा), शिरीष, गूलर, बाण तथा दूधवाले और कँटीले अन्य वृक्ष प्रशस्त होते हैं। कड़ुवे, तीते तथा कसैले काष्ठके जो वृक्ष हैं, उनकी दतुअन धन - धान्य, आरोग्य और सुखसे सम्पन्न करनेवाली होती है। पवित्र स्थानमें मनुष्य ऐसे वृक्षोंकी दतुअनको लेकर सबसे पहले उसको जलसे धो डाले। उसको दाँतोंसे चबा - चबाकर मुख साफ करे और अवशिष्ट दतुअनको किसी एकान्त स्थानमें छोड़ दे। तदनन्तर भली प्रकारसे आचमनकर मुखशोधन करे। अमावास्या, षष्ठी, नवमी, प्रतिपदा तिथि तथा रविवारके दिन दतुअन नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ये सभी दिन इस कार्यके लिये निषिद्ध माने गये हैं। दतुअनके न होनेपर तथा निषिद्ध तिथिके आ जानेपर मनुष्यको बारह कुल्ला जलके द्वारा मुखको पवित्र कर लेना चाहिये।

दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकारका हित - सम्पादन होनेके कारण प्रातःकालके स्नानकी प्रशंसा की गयी है। जो व्यक्ति शुद्धात्मा है, जो प्रातःकाल स्नान करता है, वह जपादिक समस्त (ऐहिक और पारलौकिक सुख प्रदान करनेवाली) क्रियाओंको सम्पन्न करनेका अधिकारी है। शरीर अत्यन्त मलिन है। उसमें स्थित नवछिद्रोंसे सदैव मल निकलता ही रहता है। अतः प्रात:कालका स्नान शरीरकी शुद्धिका हेतु, मनको प्रसन्न रखनेवाला तथा रूप और सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला है। यह शोक और दुःखका विनाशक है। अत: मनुष्य प्रातःकाल गङ्गास्नानके समान ही स्नानकी क्रिया सम्पन्न करे। ज्येष्टमासके शुक्लपक्षकी हस्त नक्षत्रसे युक्त दशमी तिथिमें दस पापोंको हरण करनेकी सामर्थ्य है। इस पुण्यतिथिमें स्नान करनेसे ‘दान न देनेका पाप, विरुद्ध आचरण, हिंसा, परदारोपसेवन, कटु और झूठ भाषण, चुगुलखोरी, असम्बद्ध प्रलाप, परद्रव्यापहरण और मनसे अनिष्टचिन्तन करनेसे होनेवाला पाप - इन पापोंके विनाशके लिये आज मैं गङ्गा - स्नान कर रहा हूँ’ - यह संकल्प लेकर मनुष्य प्रात:काल स्नान करे। वानप्रस्थी तथा गृहस्थको प्रातःकाल संक्षिप्त स्नान करना चाहिये। संन्यासीके लिये दिनकी तीनों (प्रात,मध्याह्न, सायं) संध्याओंमें स्नान करना अपेक्षित है। ब्रह्मचारीको सकृत् (सकृत् स्नानका तात्पर्य है - दण्डवत्‌ स्नान। अर्थात्‌ जैसे दण्ड जलमें डालकर निकाल लिया जाता है, वैसे ही स्नान करना चाहिये। गृहस्थकी तरह सुखपूर्वक स्नान नहीं करना चाहिये। सायं, प्रात: अवश्य करणीय अग्रिहोत्र आदिके लिये दोनों समय (सायं - प्रातः) स्नानका विधान ब्रह्मचारीके लिये है।) (मनु० 2176 कुल्लूक भट्टकी टीका) स्नान करना चाहिये। आचमन करके, तीर्थोंका आवाहन करके, अव्यय भगवान्‌ विष्णुका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये।

शास्त्रोंमें तीन करोड़ मन्देह नामक राक्षस माने गये हैं। वे दुरात्मा राक्षस सदैव प्रातःकाल उदित हो रहे सूर्यदेवको खा जानेकी इच्छा करते हैं। अत: (सूर्योदयसे पूर्व) स्नान करके संध्योपासनकर्म नहीं करना सूर्यदेवका ही घातक है। जो लोग यथाविधि स्नानकर यथाधिकार संध्योपासन करते हैं, वे मन्त्रसे पवित्र किये गये अनलरूपी अर्घ्य (जल) - से उन मन्देह राक्षसोंको जला देते हैं।

दिन और रात्रिका जो संधिकाल है, वही संध्याकाल (45 मिनट) होता है। यह संध्याकाल सूर्योदयसे पूर्व दो घड़ीपर्यन्त रहता है। संध्या - कर्मके समाप्त हो जानेपर यथाधिकार स्वयं हवन - कार्य करना चाहिये। स्वयं हवन करनेसे जितना फल प्राप्त होता है, उतना अन्य किसीके द्वारा करानेसे नहीं होता। ऋत्विक् , पुत्र, गुरु, भाई, भाँजा और दामादके द्वारा यह कार्य हो सकता है। क्योंकि उन लोगोंके द्वारा किया गया हवन, स्वयंका ही माना गया है।

गार्हपत्य - अग्निको ब्रह्मा, दक्षिणाग्निको शिव और आहवनीय - अग्निको विष्णु तथा कुमार ( यहाँ कुमारका अर्थ हवनकर्ता (ब्रह्मचारी) - को समझना चाहिये।) को सत्यस्वरूप कहा जाता है। यथोचित समयपर हवन करके सूर्यमन्त्रका जप करना चाहिये। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर सावित्री और प्रणव ( ॐकार) - मन्त्रका जप करना चाहिये। प्रणव , सप्त - व्याहृति और त्रिपदा सावित्री मन्त्रका निरन्तर यथासमय नियतरूपसे जप करनेसे संसारमें किसी भी प्रकारका भय नहीं रहता है। जो उपासक प्रात:काल उठकर नित्य गायत्री - मन्त्रका जप करता है, वह कमलपत्रकी भाँति पापसे संलिप्त नहीं होता। (देवी गायत्रीका स्वरूप इस प्रकार है)

श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा।

अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा॥

अर्थात्‌ गायत्रीदेवी श्रेतवर्ण वाली हैं, कौशेय (रेशमी ) - वस्त्र तथा अक्ष (माला) एवं सूत्र (यज्ञसूत्र - यज्ञोपवीत) - से विभूषित होकर सुन्दर पद्मासनपर विराजमान रहती हैं। इसी रूपमें विधिवत्‌ ध्यान करके ‘तेजोसि०’(तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि विर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेह्योजोऽस्योजो मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि॥) (शु०यजु० 199) इस यजुर्वेदके मन्त्रसे आवाहनकर गायत्रीदेवीकी उपासना करनी चाहिये। प्राचीनकालमें देववर्ग तथा मन्त्रोंका साक्षात्कार करनेकी इच्छा रखनेवाले ऋषिगण यजुर्वेदके इसी मन्त्रका प्रयोग करते थे। अत: सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान तथा ब्रह्मलोकमें भी निवास करनेवाली देवीका आवाहन करके गायत्री - मन्त्रका जप करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ नमस्कार करके उनका (गायत्रीदेवीका) विसर्जन करना चाहिये। पूर्वाह्कालमें देवताओंका पूजन करना चाहिये। भगवान्‌ विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई देव नहीं है। अतएव साधकको सदैव उनकी पूजा करनी चाहिये। विद्वान्‌ व्यक्तिको चाहिये कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव - इन तीन देवोंके प्रति पृथक् - भाव (भेदबुद्धि) न रखे।

इस संसारमें आठ मङ्गल हैं - ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य (सोना), घृत, सूर्य, जल और राजा। सदैव इनका दर्शन एवं पूजन करना चाहिये और यथासम्भव इन्हें अपने दाहिने करके ही चलना चाहिये। ब्राह्मण पहले वेदका अध्ययन करे, उसके बाद चिन्तन, अभ्यास तथा जप करके उसका दान शिष्योंको दे, अर्थात्‌ अपने शिष्योंको वेदाध्ययन कराये। वेदाभ्यासका यही पाँच प्रकार है।

वेदार्थ, यज्ञकर्मप्रतिपादक शास्त्र और धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका पारिश्रमिक देकर जो लेखनकार्य कराता है और उसे योग्य अधिकारीको प्रदान करता है, वह वैदिक (वेदमें उक्त) लोकको प्राप्त करता है। जो इतिहास - पुराणके ग्रन्थोंको लिखकर दान देता है, वह ब्रह्म (वेद) - दानसे होनेवाले पुण्यका दुगुना पुण्य प्राप्त करता है।

दिनके तीसरे भागमें अपने पोष्य वर्गके प्रयोजनको पूर्ण करना चाहिये। माता, पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा दीन, दुःखी, आश्रितजन, अभ्यागत, (जो अकस्मात्‌ अपने घर आ जाय वह अभ्यागत है।) अतिथि (तिथि उस सन्तको कहते हैं जो तिथि, पर्व, उत्सव आदिका विवेक नहीं करता है और सदा चलता ही रहता है। यहाँ यमका वचन द्रष्टव्य है - तिथि पर्वोत्सवा: सर्वे त्यक्ता येन महात्मना। सोऽतिथि: सर्वभूतानां शेषानभ्यागतान्‌ विदु:॥) और अग्नि - ये पोष्य वर्ग कहे गये हैं। पोष्य वर्गका भरण - पोषण करना स्वर्गका प्रशस्त साधन है। अत: मनुष्यको पोष्य वर्गका पालन - पोषण प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। इस संसारमें उसी व्यक्तिका जीवन श्रेष्ठ है, जो बहुतोंके जीवनका साधक बनता है। अर्थात्‌ बहुतोंका पालन - पोषण करता है। जो मात्र अपने भरण - पोषणमें लगे रहते हैं, वे जीवित रहते हुए भी मरे हुएके समान हैं; क्योंकि अपना पेटपालन तो कुत्ता भी करता है।

(माता पिता गुरुभ्राता प्रजा दीना: समाश्रिता:॥

अभ्यागतोऽतिथिश्चाग्नि: पोष्यवर्गा उदाहता:।

भरणं पोष्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम्‌॥

भरणं पोष्यवर्गस्य तस्माद्यत्नेन कारयेत्‌।

स जीवति वरश्चैको बहुभिर्योपजीव्यति॥

जीवन्तो मृतकास्त्वन्ये पुरुषा: स्वोदरम्भरा:।

स्वकीयोदरपूर्तिश्च कुक्कुरस्यापि विद्यते॥)

व्यवहारमें अर्थका महत्त्व है। जैसे नदियोंके मूल पर्वत हैं, वैसे ही समस्त कार्योंका मूल अर्थ है; इसीलिये अर्थको उत्पन्न करना एवं बढ़ाना आवश्यक होता है। अर्थ उसे ही कहते हैं, जो हमारे सभी कार्योंकी सम्पन्नतामें अनिवार्यरूपसे उपयोगी हो। इसी दृष्टिसे सभी रत्नोंकी निधि पृथ्वी, धान्य, पशु, स्त्रियाँ आदि अर्थ माने जाते हैं। इस तरह अर्थका महत्त्व होनेपर भी इसके अर्जनमें संयम आवश्यक है; अतएव विशेषकर ब्राह्मणको अपनी जीविकाके लिये अर्थार्जन करते समय यह ध्यानमें रखना चाहिये कि यदि आपत्तिकाल नहीं है तो किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करना पड़े अथवा कम - से - कम द्रोह करना पड़े।

धन तीन प्रकारका माना गया है - शुक्ल, शबल (मिश्रित) और कृष्ण। उस धनके सात विभाग हैं। सभी वर्णोंको प्राप्त होनेवाला धन तीन प्रकारका होता है - 1 - दायभागके अनुसार वंशपरम्परासे यथाधिकार प्राप्त धन, 2 - प्रेमके कारण किसीके द्वारा दिया गया धन और 3 - यथाविधि विवाहित पत्नीके साथ प्राप्त धन। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणके लिये तीन प्रकारके विशेष धन हैं - याजन (यज्ञ करानेसे प्राप्त), अध्यापनसे प्राप्त तथा विशुद्ध प्रतिग्रह (सत्पात्रसे लिया गया दान)।

क्षत्रिय वर्णका विशेष धन भी तीन प्रकारका कहा गया है - करसे प्राप्त धन उसका पहला धन है, दूसरा धन दण्डद्वारा प्राप्त तथा तीसरा धन वह है जो विजयद्वारा प्राप्त हो। वैश्यका भी तीन प्रकारका विशेष धन है - खेतीसे प्राप्त, गोपालनसे प्राप्त तथा व्यापारसे प्राप्त। शूद्रका विशेष धन एक ही प्रकारका है, जो उपर्युक्त वर्णोंकी कृपासे उसको प्राप्त होता है। आपत्तिकालमें ब्राह्मण एवं क्षत्रिय स्वयं ब्याजसे,खेतीसे तथा व्यापारसे धन अर्जित कर सकते हैं, आपत्तिकालमें ऐसा करनेपर पाप नहीं होता है।

ऋषियोंके द्वारा जीवनयापनके लिये बहुत - से उपाय बताये गये हैं, उनमें कुसीद (ब्याज) सभी वर्णोंके लिये बताये गये विशेष उपायोंकी अपेक्षा अधिक है। अनावृष्टि, राजभय तथा चूहा आदि जीव - जन्तुओंके उपद्रवोंसे कृषि आदिमें बाधा आ जाती है, किंतु कुसीद - वृत्तिमें यह बाधा नहीं आती। शुक्लपक्ष हो, कृष्णपक्ष हो, रात्रि हो, दिन हो, गर्मी हो, वर्षा अथवा शीत हो - सभी दशाओंमें कुसीदसे होनेवाली धनवृद्धि रुकती नहीं है।

अर्थात्‌ सूदपर दिया गया धन बढ़ता ही रहता है। नाना प्रकारके व्यापारिक कार्योंमें संलग्न वणिक्‌ - जनोंकी जो धनकी अभिवृद्धि दूसरे देशमें जानेसे होती है, वही अभिवृद्धि कुसीद - वृत्ति करनेसे घरमें बैठे-ही - बैठे प्राप्त हो जाती है।

शास्त्रसम्मत विधिसे अर्जित धनके लाभांशसे सभी लोगोंको पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। ये संतुष्ट होकर धन - अर्जनमें अज्ञानवश हुए दोषको निःसंदेह शान्त कर देते हैं। जो वणिक्‌ ब्याजके द्वारा (धनार्जनके लिये) वस्त्र, गौ तथा स्वर्णादि देता है और जो किसान अन्न, पेय पदार्थ, सवारी, शय्या तथा आसन आदि (ब्याज - वृत्तिमें) देता है, वह (उपार्जित धनका) बीसवाँ भाग और पशु-स्वर्णादिका 100 वाँ भाग राजाको देकर शेष बचेहुए धनके चतुर्थांशसे जौ (यव) आदि विभिन्न वस्तुओंका सञ्चय करे। दो - चौथाई अर्थात्‌ आधे धनका उपयोग अपने भरण - पोषण तथा नित्य - नैमित्तिक कार्यके लिये होना चाहिये। जो एक - चौथाई धन शेष बचे, उसका उपयोग मूलधनकी वृद्धिमें करना चाहिये।

विद्या, शिल्प, वेतन, सेवा, गोरक्षा, व्यापार, कृषि, वृत्ति,( वृत्ति - सहायताके रूपमें प्रतिमास दी जानेवाली धनराशि।)

भिक्षा और ब्याज - ये दस जीवनयापनके साधन हैं। ब्राह्मणको सत्पात्र व्यक्तिसे दानरूपमें प्राप्त धनसे अपना निर्वाह करना चाहिये। क्षत्रिय वर्ण अपने शस्त्रास्त्रोंसे धनार्जन करे। वैश्य वर्ण न्यायोचित ढंगसे धनसंग्रह कर अपना कार्य पूर्ण करे और शूद्र सेवा-भावसे धन अर्जितकर अपने सभी कार्योंको सम्पन्न करे। प्रचुर जलराशिसे परिपूर्ण नदी, शाक, मृत्तिका, समिधा, कुश, पलाश, केला आदिके पत्र, अग्निदेवकी आराधनाके उपकरण और ब्रह्यघोष (स्वाध्याय) - ये ब्राह्मणोंके श्रेष्ठम धन हैं। यदि अयाचित (स्वतःप्राप्त) धनको ब्राह्मण स्वीकार करे तो दोष नहीं है। देवताओंने ऐसे धनको अमृतके समान कहा है। अत: बिना याचना किये ही आये धनका परित्याग ब्राह्मणको नहीं करना चाहिये। गुरुके धनका उद्धार करनेकी इच्छासे देवता और अतिथिकी पूजा करते हुए सभीसे प्रतिग्रह लेना चाहिये, पर उसका उपयोग अपनी तुष्टिके लिये नहीं करना चाहिये। साधुसे अथवा असाधुसे भी केवल उसके कल्याणके लिये प्रतिग्रह लेना चाहिये। यदि प्रतिग्रहीता ब्राह्मण (आचारहीन) कर्मनिष्ठ है तो अल्प दोष होगा। यदि निर्गुण है तो दोषमें डूब जायगा। इस प्रकार तस्करवृत्ति (अपने पुण्यको क्षीण करनेवाली वृत्ति) - से अपना भरण करनेके बाद उत्तम द्विजको अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये। दिनके चौथे भागमें मिट्टी, तिल, पुष्प तथा कुशादि सामग्री लाकर प्रकृतिप्रदत्त जलमें स्नान करना चाहिये।

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियाङ्ग ,मलापकर्षण,मार्जन, आचमन और अवगाहन - ये आठ प्रकारके स्नान बताये गये हैं। बिना स्नान किया पुरुष जप, अग्नि और हवन आदि करनेका अधिकारी नहीं है। प्रातःस्नान पूजा - पाठ आदि धार्मिक कृत्यके लिये करना चाहिये। इसीको नित्य - स्नान कहा गया है। चाण्डाल, शव, विष्ठा तथा रजस्वला आदिका स्पर्श करनेके पश्चात्‌ जो स्नान किया जाता है, वह नैमित्तिक - स्नान कहलाता है।

ज्योतिषशास्त्रके अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रोंमें जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, उसे काम्य - स्नान कहते हैं। निष्काम व्यक्तिको इस प्रकारका स्नान नहीं करना चाहिये। जप - होमादिक कृत्योंको सम्पन्न करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर अथवा अन्य अनेक पवित्र कृत्य, देवता तथा अतिथि आदिका पूजन करनेकी इच्छासे जो स्नान किया जाता है, उसको क्रियाङ्ग - स्नानके नामसे अभिहित किया गया है। शारीरिक मलको दूर करनेके लिये सरोवर, देवकुण्ड, तीर्थ और नदियोंमें जो स्नान किया जाता है, वह मलापकर्षण - स्नान है। सामान्य जलसे स्नान करनेपर केवल शरीरकी शुद्धि होती है। तीर्थमें स्नान करनेपर विशिष्ट फलकी प्राप्ति होती है। मज्जन (स्नान) - के लिये विहित मन्त्रोंसे मार्जन करनेसे मनुष्यका पाप उसी क्षण विनष्ट हो

जाता है। नित्य, नैमित्तिक, क्रियाङ्ग तथा मलापकर्षण नामक जो स्नान बताये गये हैं, उन स्नानोंको तीर्थका अभाव होनेपर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकारसे प्राप्त कृत्रिम जलसे सम्पन्न कर लेना चाहिये। भूमिसे निकला हुआ जल पवित्र होता है। इस जलकी अपेक्षा पर्वतसे निकलनेवाले झरनेका जल पवित्र होता है। इससे भी बढ़कर पवित्र जल सरोवरका है और उसकी अपेक्षा नदीका जल पवित्र है। नदीके जलकी अपेक्षा भी तीर्थका जल पवित्र है। इन सभी जलोंकी अपेक्षा गङ्गाका जल परम पवित्र है। गङ्गाका श्रेष्ठतम जल तो जीवनपर्यन्त किये गये प्राणीके सभी पापोंका विनाश अतिशीघ्र ही कर देता है। गया तथा कुरुक्षेत्र नामक तीर्थोंके जलसे भी बढ़कर पवित्र एवं पुण्यदायक जल गङ्गाजीका है -

भूमिष्ठादुद्बतं पुण्यं ततः प्रस्रवणोदकम्‌॥

ततोऽपि सारसं पुण्यं तस्मान्नादेयमुच्यते।

तीर्थतोयं ततः पुण्यं गाङ्ग पुण्यं तु सर्वतः॥

गाङ्ग पयः पुनात्याशु पापमामरणान्तिकम्‌।

गयायां च कुरुक्षेत्रे यत्तोयं समुपस्थितम्‌॥

तस्मात्तु गाङ्गमपरं जानीयात्तोयमुत्तमम्‌।

पुत्रजन्म, कतिपय विशिष्ट योग, मकर आदि राशियोंपर सूर्यकी संक्रान्ति तथा चन्द्र और सूर्यग्रहण होनेपर ही रात्रिमें स्नान करना प्रशस्त है। अन्यथा सात्रिमें स्नान नहीं करना चाहिये। प्रतिदिन उष:कालमें, संध्याकालमें और सूर्यका उदय होते ही जो स्नान किया जाता है, वह स्नान प्राजापत्य यज्ञकी भाँति महापातकका नाश करनेवाला है। बारह वर्षतक प्राजापत्य यज्ञ करनेपर जो फल प्राप्त होता है, वह फल श्रद्धापूर्वक एक वर्षतक प्रात:काल स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति सूर्य और चन्द्र नामक श्रेष्ठ ग्रहोंके समान प्रचुर भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छा करता है, वह माघ तथा फाल्गुन-

इन दो मासोंमें नित्य प्रात:काल स्नान करे। जो श्रद्धालु माघमास आनेपर प्रात:काल स्नान करके हविष्यान्न ग्रहण करता है, वह एक ही मासमें अपने महाघोर और अतिपापोंका विनाश कर देता है। माता, पिता, भ्राता, मित्र अथवा गुरु आदिको उद्देश्य बनाकर जो प्रातःकाल स्नान करता है, उसे शास्त्रनिर्दिष्ट पुण्यका द्वादश गुणित अधिक पुण्य प्राप्त होता है। भगवान्‌ विष्णु एकादशी तिथिको आमलक (आँवला) - के समर्पण एवं दानसे विशेष रूपसे तुष्ट होते हैं। लक्ष्मीकी कामना करनेवाले मनुष्यको सर्वदा आमलकसे स्नान करना चाहिये।

सन्‍ताप, कीर्ति, अल्पायु, धन, मृत्यु, आरोग्य तथा सभी कामनाओंकी पूर्ति क्रमशः रविवार आदिको तैलका अभ्यङ्ग करनेसे प्राप्त होती है।

अर्थात्‌ रविवारको शरीरमें तैलका अभ्यङ्ग करनेपर सन्‍ताप, सोमवारको तैल - अभ्यंगसे कीर्ति, मंगलवारको तैल - अभ्यङ्गसे अल्पायु, बुधवारको तैल - अभ्यङ्गसे धन, बृहस्पतिवाकोऐसा करनेसे मृत्यु, शुक्रवारको तैल - अभ्यङ्गसे आरोग्य और शनिवारको तैल - अभ्यङ्ग करनेपर मनुष्यका सम्पूर्ण अभीष्ट पूर्ण होता है। उपवास करनेवाले व्रतीसे तथा नाईके द्वारा क्षौरकर्म करानेके पश्चात्‌ मनुष्यसे तबतक ही लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं, जबतक वह तैलका स्पर्श नहीं करता है। अत: तैलस्पर्श करनेके पश्चात्‌ मनुष्यको तत्काल स्नान कर लेना चाहिये। व्रतके दिन तो तैलस्पर्श नहीं ही करना चाहिये।

स्नान करनेके बाद मनुष्यको यथाविधान पितृगण, देवगण और मनुष्योंका तर्पण करना चाहिये। नाभिपर्यन्त जलमें स्थित होकर एकाग्र मनसे पितरोंका आवाहन करना चाहिये -

आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्वन्त्वपोऽञ्जलिम्॥

हे मेरे पितृणण! आप सब इस तीर्थस्थानपर आकर विराजमान हों और मेरे द्वारा दी जा रही जलाञ्जलिको स्वीकार करें।

इस प्रकार आवाहन करके आकाश और दक्षिण दिशामें स्थित पितृगणोंको तीन - तीन जलाञ्जलि प्रदान करे। यदि जलसे बाहर निकलकर तर्पण करना हो तो तर्पणकी विधि जाननेवाले लोगोंको सूखे और स्वच्छ वस्त्र पहनकर समूल कुशाओंपर तर्पण करना चाहिये। पात्र (बर्तन) - में तर्पण नहीं करना चाहिये।

तर्पण - कृत्यमें रक्षोगण प्रतिबन्ध न कर सकें, इसके लिये तर्पण आरम्भ करते समय बायें हाथमें जल लेकर नैर्ऋत्य कोणमें उसे छोड़ना चाहिये और जल छोड़ते समय निम्नलिखित मन्त्र बोलना चाहिये -

यदपां क्रूरमांसात्तु यदमेध्यं तु किञ्चन॥

अशान्तं मलिनं यच्च तत्सर्वमपगच्छतु।

क्रूरमांसके कारण, अपवित्रताके कारण अथवा तर्पणके जलमें अज्ञानवश विद्यमान अशान्तिजनक किसी तत्त्व या मलिनताके कारण जो कुछ भी प्रतिबन्ध है, वह दूर हो जाय।

अन्तमें तर्पणका संक्षेप (उपसंहार) करते समय तीन जलाञ्जलि निम्नलिखित मन्त्रोंसे देनी चाहिये -

निषिद्धभक्षणाद्यत्तु पापाद्यच्च प्रतिग्रहात्‌॥

दुष्कृतं यच्च मे किञ्चिद्वाङ्मनःकायकर्मभि:।

पुनातु मे तदिन्द्रस्तु वरुण: सबृहस्पति॥

सविता च भगश्चैव मुनयः सनकादय:।

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगत्‌ तृप्यत्विति ब्रुवन्‌॥

निषिद्ध भक्षणसे, जन्मान्तरीय दुष्कर्मोंसे, प्रतिग्रह(दान) लेनेसे और इस जन्ममें शरीर, वाणी एवं कर्मसे जो निषिद्ध आचरण हो गये हैं, उनसे उत्पन्न पापोंके कारण मुझमें जो अपवित्रता है, उसे दूर करके बृहस्पति, इन्द्र तथा वरुण मुझे पवित्र करें। सूर्य, यम (देवताविशेष), सनकादि ऋषि और ब्रह्मसे लेकर स्तम्ब (अति लघु कीट या तृण) समस्त संसार - ये सभी मेरे तर्पणसे तृप्त हों।

इस प्रकार पितृतर्पण करके संयमी व्यक्तिको ईर्ष्या, द्वेष आदिसे रहित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि अभीष्ट देवोंकी पूजा करनी चाहिये। विभिन्न देवतालिङ्गक ब्रह्मा, वैष्णव, रौद्र, सावित्र एवं मैत्रावरुण - मन्त्रोंसे सभी देवताओंकी नमस्कारपूर्वक अर्चा करनी चाहिये। तदनन्तर पुन: नमस्कार पूर्वक अर्चित देवोंको पृथक्‌ - पृथक्‌ पुष्पाञ्जलियाँ देनी चाहिये। पुन: सर्वदेवमय भगवान्‌ विष्णु और सूर्यकी पूजा करनेका विधान है। इस पूजामें जो अधिकारी मनुष्य पुरुषसूक्तसे भगवान्‌ विष्णुको पुष्प तथा जल समर्पित करता है, वह सम्पूर्ण चराचर विश्वकी पूजाकों सम्पन्न कर लेता है। इन देवोंकी पूजा अन्य तान्त्रिक मन्त्रोंसे भी की जा सकती है। पूजामें सबसे पहले आराध्यदेव जनार्दनको अर्ध्य प्रदान करना चाहिये और सुगन्धित पदार्थसे उनके विग्रहका विलेपन करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उन्हें पुष्पाञ्जलि, धूप, उपहार और फलका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।

जलके मध्य स्नान, जलके द्वारा मार्जन, आचमन, जलनमें तीर्थका अभिमन्त्रण तथा अघमर्षण - सूक्तके द्वारा मार्जन नित्य तीन बार करना चाहिये। महात्माओंको स्नानविधिके विषयमें यही अभीष्ट है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको मन्त्रसहित स्नान करना चाहिये। शूद्रवर्णको मौन होकर नमस्कारपूर्वक स्नान करना चाहिये। अध्यापन ब्रह्मयज्ञ, तर्पण पितृयज्ञ, होम देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ तथा अतिथिका पूजन मनुष्ययज्ञ है। गौओंके गोष्ठमें दस गुना,अग्निशालामें सौ गुना, सिद्धक्षेत्र - तीर्थ तथा देवालयोंमें क्रमशः एक हजार गुना, एक लाख गुना और एक करोड़ गुना फल इन कर्मोंको करनेसे प्राप्त होता है। जब ये ही कर्म भगवान्‌ विष्णुके सान्निध्यमें किये जाते हैं तो इनसे अनन्त गुना फलोंकी प्राप्ति होती है।

दिनका यथायोग्य पाँच विभाग करके पितृगण, देवगणकी अर्चा और मानवके कार्य करने चाहिये। जो मनुष्य अन्नदान करके सर्वप्रथम ब्राह्मणको भोजन कराकर अपने मित्रजनोंके साथ स्वयं भोजन करता है, वह देहत्यागके बाद स्वर्गलोकके सुखका अधिकारी बन जाता है।

मनुष्यको सर्वप्रथम मधुर, मध्यभागमें नमकीन और अम्लसे युक्त पदार्थ, उसके बाद कड़ुवा, तीता तथा कसैला भोजन करना चाहिये। भोजनके अनन्तर दुग्धपान करना चाहिये। रातमें शाक तथा कन्दादिक पदार्थोंको अधिक नहीं खाना चाहिये। एक ही प्रकारके रसमें आसक्ति अच्छी नहीं होती है।

ब्राह्मणका अन्न अमृतके समान, क्षत्रियका अन्न दुग्धके समान, वैश्यका अन्न अन्नके समान और शूद्रका अन्न रक्तके समान होता है। जो अमावास्याका व्रत एक वर्षतक करता है, उसके यहाँ ऐश्वर्य और लक्ष्मीका (अविचलरूपसे) निवास होता है। द्विजातिके उदरभागमें गार्हपत्याग्नि, पृष्ठभागमें दक्षिणाग्नि, मुखमें आहवनीयाग्नि, पूर्वमें सत्याग्नि और मस्तकमें सर्वाग्निका वास रहता है। जो इन पञ्चग्नियोंको जान लेता है उसको आहिताग्नि कहा जाता है। शरीरको जल, चन्द्र तथा विविध प्रकारके अन्नके द्वारा साध्य माना गया है। इस शरीरका उपभोग करनेवाले प्राण अग्नि और सूर्य हैं। ये तीनों पृथक्‌ - पृथक्‌ तीन रूपोंमें भी अवस्थित रहकर एक ही हैं।

(भोजनके समय यह भावना करनी चाहिये कि) पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायुतत्त्वसे युक्त इस मेरे स्थूल शरीरकी पुष्टिके लिये प्रयुक्त अन्न शक्ति - सञ्चयके लिये होता है। शरीरमें पहुँचकर जब यह अन्न भूमि, जल, अग्नि और वायुतत्त्वके रूपमें परिणत हो जाता है तो अप्रतिहत - असीम सुखकी अनुभूति होती है।

इसके(भोजनके) बाद मनुष्यको अपने हाथसे मुख आदि स्वच्छकर ताम्बूल अर्थात्‌ पानका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर इतिहासका श्रवण करना चाहिये। इतिहास और पुराणादिकी कथाओंके द्वारा मनुष्यको दिनके छठे और सातवें भागका समय व्यतीत करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ स्नान करके पश्चिम दिशाकी ओर मुख करके सायंकालीन संध्योपासन करना चाहिये।

हे ब्राह्मणदेव! मेरे द्वारा कहे गये इस विधानके अनुसार अपने कर्तव्योंका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य इस सदाचारके अध्यायका पाठ करता है अथवा अपने पुरोहित आदिके द्वारा इसका श्रवण करता है, वह निश्चित ही अपनी मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोकको जाता है। हे द्विज! इन सभी सदाचार एवं धर्मका पालन करनेवाला अधिकारी मनुष्य केशव (साक्षात्‌ विष्णु) ही माना गया है।