84 - गयाके तीर्थोंका माहात्म्य तथा गयाशीर्षमें पिण्डदानकी महिमामें विशालकी कथा

ब्रह्माजीने कहा - व्यासजी! गया तीर्थकी यात्राके लिये उद्यत मनुष्यको विधिपूर्वक श्राद्ध करके संन्यासीके वेषमें अपने गाँवकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर दूसरे गाँवमें वह जाकर श्राद्धसे अवशिष्ट अन्नका भोजन ग्रहण करके प्रतिग्रहसे विवर्जित होकर यात्रा करे।

गया यात्राके लिये मात्र घरसे चलनेवालेके एक - एक कदम पितरोंके स्वर्गारोहणके लिये एक - एक सीढ़ी बनते जाते हैं -

गृहाच्चलितमात्रस्य गयायां गमन प्रति।

स्वर्गारोहणसोपानं पितृणां तु पदे पदे॥

कुरुक्षेत्र, विशाला (बदरीक्षेत्र), विरजा (जगन्नाथक्षेत्र) तथा गयातीर्थको छोड़कर शेष सभी तीर्थोंमें मुण्डन एवं उपवासका विधान है।

गयातीर्थमें दिन तथा रात ( प्रत्येक समय) - में कभी भी श्राद्ध किया जा सकता है। वाराणसी, शोणनद और महानदी पुनःपुनाके तटपर श्राद्ध करके अपने पितृजनोंको स्वर्गलोकमें ले जाय। मनुष्य उत्तर मानसतीर्थमें जाकर श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करता है। उस तीर्थमें उसे स्नान तथा श्राद्धादि क्रियाओंको सम्पन्न करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह दिव्य कामनाओंको तथा मोक्षको प्राप्त करता है।

दक्षिण मानसतीर्थमें जाकर श्रद्धावान्‌ पुरुषको मौन धारण करके पिण्डदानादि करना चाहिये, उस तीर्थमें श्राद्धादि करनेसे मनुष्य देव, ऋषि एवं पितृ - इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है।

उस गयाक्षेत्रमें सिद्धजनोंके लिये प्रीतिकारक, पापियोंके लिये भयोत्पादक, अपनी जिह्वाको लपलपाते हुए महाभयंकर, नष्ट न होनेवाले महासर्पोंसे परिव्याप्त कनखल नामक त्रिलोकविश्रुत महातीर्थ है। उदीचितीर्थमें देवर्षियोंसे सेवित मुण्डपृष्ठ नामसे एक प्रसिद्ध तीर्थ है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है एवं श्राद्ध करनेपर उसे अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। उस तीर्थमें सूर्यदेवको नमस्कार करके पिण्डदानादि सत्क्रियाओंको अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये।

[कव्यवाह, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद्‌ और सोमपा नामक पितृदेवता हैं। गयाके तीर्थमें श्राद्ध करते समय इन सभी पितृदेवोंकी इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-]

कव्यवाहस्तथा सोमो यमश्चैवार्यमा तथा।

अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोमपा: पितृदेवता:॥

आगच्छन्तु महाभागा युष्माभी रक्षितास्त्विह।

मदीया: पितरो ये च कुले जाता: सनाभय:॥

तेषां पिण्डप्रदानार्थमागतोऽस्मि गयामिमाम्‌।

हे कव्यवाह! सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमप (दिव्य) पितृदेवता! आप महाभाग! यहाँ पधारें! आप लोगोंद्वारा रक्षित हमारे कुलमें उत्पन्न जो सपिण्ड पितर पितृलोकमें चले गये हैं, उन सभी पितृजनोंके लिये पिण्डदान करनेके निमित्त मैं इस गयातीर्थमें आया हूँ।

ऐसी प्रार्थना करके फल्गुतीर्थमें पिण्डदान करके मनुष्यको पितामहका दर्शन करना चाहिये। उसके बाद भगवान्‌ गदाधर विष्णुका दर्शन करे। ऐसा करनेसे वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है। फल्गुतीर्थमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान्‌ गदाधरका दर्शन करता है, वह सद्य: अपना तो उद्धार करता ही है, साथ ही वह अपने कुलके दस पूर्व पुरुष एवं दस पश्चादवर्ती पुरुषपर्यन्त इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करता है।

गयातीर्थमें पहुँचे हुए श्रद्धालु व्यक्तिके लिये यह प्रथम दिनकी विधिका वर्णन किया गया है। दूसरे दिन धर्मारण्य एवं मतङ्गवापीमें जाकर श्राद्ध करनेवाला मनुष्य पिण्डदान आदि करे, धर्मरिण्यमें जानेसे मनुष्यको वाजपेय - यज्ञका फल प्राप्त होता है। तत्पश्चात्‌ ब्रह्मतीर्थमें राजसूय - यज्ञ एवं अश्वमेध - यज्ञका फल प्राप्त होता है। तदनन्तर कूप और यूप नामके तीर्थोंके मध्य श्राद्ध एवं पिण्डोदक कृत्य सम्पन्न करना चाहिये। कूपोदकके द्वारा किया गया वह श्राद्धादि कार्य अक्षय होता है। तीसरे दिन ब्रह्मसदतीर्थमें जाकर स्नानकर तर्पण करना चाहिये, तदनन्तर यूप एवं कूपतीर्थके मध्यमें श्राद्ध तथा पिण्डदान करनेका नियम है।

तदनन्तर गोप्रचारतीर्थके समीपमें ब्रह्माके द्वारा कल्पित ब्राह्मणोंके सेवनमात्रसे पितृजन मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यूपतीर्थकी प्रदक्षिणा करके वाजपेय - यज्ञका फल प्राप्त कर लेना चाहिये।

चौथे दिन फल्गुतीर्थमें स्नान करके देवादिकोंका तर्पण करे और उसके बाद गयाशीर्षमें रुद्रपदादि तीर्थोंमें जाकर वह पितरोंके लिये श्राद्ध करे।

तदनन्तर व्यास, देहिमुख, पञ्चाग्नि तथा पदत्रय नामक तीर्थमें पिण्डदान करके सूर्यतीर्थ, सोमतीर्थ एवं कार्तिकेय - तीर्थमें जाकर किये गये श्राद्धका फल अक्षय होता है।

गयातीर्थमें नवदैवत्य और द्वादशदैवत्य नामक श्राद्ध करना चाहिये। अन्वष्टका तिथियोंमें, वृद्धिश्राद्धमें, गयामें और मृत्युतिथिमें माताके लिये पृथक्‌ रूपसे श्राद्ध करनेका विधान है। अन्यत्र तीर्थोंमें पिताके साथ ही माताका श्राद्ध करना चाहिये।

(श्राद्धं तु नवदैवत्यं कुर्याद्द्वादशदैवतम्‌।

अन्वष्टकासु वृद्धौ च गयायां मृतवासरे॥

अत्न मातुः पृथक्‌ श्राद्धमन्यत्र पतिना सह।)

दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करके पितामहका दर्शनकर यदि मनुष्य रुद्रपादका स्पर्श करता है तो वह पुन: इस लोकमें नहीं आता है।

वित्तपरिपूर्ण समग्र पृथिवीका तीन बार दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल गयाशिरतीर्थमें श्राद्ध करनेपर प्राप्त हो जाता है। इस गयाशिरतीर्थमें शमीपत्र प्रमाणके बराबर पिण्डदान करना चाहिये। इससे पितृगण देवत्वको प्राप्त करते हैं। इस कार्यमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं हैं।

(त्रिर्वित्तपूर्णा पृथिवीं दत्त्वा यत्फलमाप्नुयात्‌॥

स तत्फलमवाप्नोति कृत्वा श्राद्धं गयाशिरे।

शमीपत्रप्रमाणेन पिण्डं दद्याद्‌ गयाशिरे॥

पितरो यान्ति देवत्वं नात्र कार्या विचारणा।)

भगवान्‌ शिवने मुण्डपृष्ठतीर्थपर अपना चरण रखा था। अत: उस तीर्थमें अल्पमात्र तपस्यासे ही मनुष्य महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति गयाशीर्षतीर्थमें नामोच्चारके साथ जिन पितरोंको पिण्डदान करता है उससे नरकलोकमें निवास करनेवाले पितृजन स्वर्गलोक एवं स्वर्गमें रहनेवाले पितरोंको मोक्ष प्राप्त हो जाता है-

मुण्डपृष्ठे पदं न्‍यस्तं महादेवेन धीमता॥

अल्पेन तपसा तत्र महापुण्यमवाप्नुयात्‌।

गयाशीर्षे तु य: पिण्डान्नाम्ना येषां तु निर्वपेत्‌॥

नरकस्था दिवं यान्ति स्वर्गस्था मोक्षमाप्नुयु:।

पाँचवें दिन गदालोलतीर्थमें स्नान करके अक्षयवटके नीचे पिण्डदान करनेवाला अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है। अक्षयवटके मूलमें शाक अथवा उष्णोदकसे एक ब्राह्मणकों भोजन करानेपर करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त हो जाता है।

(वटमूलं समासाद्य शाकेनोष्णोदकेन वा॥

एकस्मिन्‌ भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता:।)

अक्षयवटमें श्राद्ध करनेके पश्चात्‌ प्रपितामहका दर्शन करके मनुष्य अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है एवं अपने सौ कुलोंका उद्धार कर देता है।

मनुष्यको बहुत - से पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी पुत्र गयातीर्थमें जाय अथवा अश्वमेध - यज्ञ करे या नीलवृषोत्सर्ग करे।

(एष्टव्या बहव: पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्॥

यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सूजेत्।)

एक प्रेतने किसी वणिक्से कहा - हे वणिक्‌! गयाशीर्षतीर्थमें तुम मेरे नामसे पिण्डदान करो, जिससे मैं इस प्रेतयोनिसे मुक्त हो जाऊँगा। यह पिण्डदान दाताके लिये भी स्वर्गप्रदान करनेवाला होगा। ऐसा सुनकर उस वणिक्‌ने गयाशीर्षतीर्थमें उस प्रेतराजके लिये पिण्डदान किया। तदनन्तर अपने छोटे भाइयोंके साथ उसने अपने पितृजनोंको भी पिण्डदान प्रदान किया। वणिक्के द्वारा वहाँ पिण्डदान करनेसे उस प्रेतराजके साथ उसके सभी पितर मुक्त हो गये और पिण्डदान करनेवाला वह विशाल वणिक्‌ पुत्रवान्‌ हो गया। मृत्युके पश्चात्‌ उसने विशालामें राजपुत्रके रूपमें जन्म लिया। उसने ब्राह्मणोंसे कहा कि मुझे किस प्रकारके सत्कार्योंको करनेसे पुत्र - प्राप्ति हो सकती है। ब्राह्मणोंने विशाल नामक राजपुत्रसे कहा कि गयातीर्थमें पिण्डदान करनेसे आपकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं।

तदनन्तर विशालने गयाशीर्षतीर्थमें जाकर पिण्डदान किया, जिसके पुण्यसे वह पुत्रवान्‌ हो गया। एक दिन उसने आकाशेमें श्वेत, रक्त एवं कृष्णवर्णवाले पुरुषोंको देखा। उन लोगोंको देखकर उसने पूछा कि तुम सब कौन हो? उनमेंसे श्वेतवर्णवाले पुरुषने उस विशालसे कहा कि श्वेतवर्णवाला मैं तुम्हारा पिता हूँ। तुम्हारे द्वारा दिये गये पिण्डदानके पुण्यलाभसे मैंने शुभ इन्द्रलोकको प्राप्त किया है। हे पुत्र! ये जो रक्तवर्णवाले पुरुष दिखायी दे रहे हैं, मेरे पिता हैं। ये ब्रह्महत्या करनेवाले तथा अन्यान्य महापापोंसे युक्त थे। ये कृष्णवर्णवाले तेरे पितामह हैं। इन्होंने अपने जीवनकालमें अनेक ऋषियोंका वध किया। अत: इन लोगोंको अवीचि नामक नरक प्राप्त हुआ था, किंतु तुम्हारे द्वारा प्रदत्त पिण्डदानसे हम सभी पापविमुक्त हो गये हैं। अब हम लोग उत्तम स्वर्गलोकमें जा रहे हैं।

यह सुनकर कृतकृत्य होकर विशाला नगरीमें राज्य करके वह विशाल स्वर्गलोकमें चला गया। [गयातीर्थमें पिण्डदान करते हुए निम्न मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये]

येऽस्मत्कुले तु पितरो लुप्तपिण्डोदकक्रिया:॥

ये चाप्यकृतचूडास्तु ये च गर्भाद्विनिस्सृता:।

येषां दाहो न क्रिया च येऽग्निदग्धास्तथापरे॥

भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम्‌।

पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः॥

माता पितामही चैव तथैव प्रपितामही।

तथा मातामहश्चैव प्रमातामह एव च॥

वृद्धप्रमातामहश्च तथा मातामही परम्‌।

प्रमातामही तथा वृद्धप्रमातामहीति वै॥

अन्येषां चैव पिण्डोऽयमक्षय्यमुपतिष्ठताम्‌॥

इसका भाव यह है कि हमारे कुलमें जो पितर पिण्डदान एवं जल - तर्पण क्रियासे वञ्चित रहे हैं, जो चूडाकर्म - संस्कारविहीन हैं, जो गर्भसे निकले हुए हैं (गर्भपातके कारण मृत्युको प्राप्त हुए हैं), जिनका अग्निदाह अथवा अन्य अन्तिम क्रिया - संस्कार नहीं हुआ है, अग्निमें जलकर जिनकी मृत्यु हुई है और जो दूसरे पितृगण हैं, वे भूमिमें मेरे द्वारा किये गये इस पिण्डदानसे तृप्त हों और तृप्त होकर परमगतिको प्राप्त करें। पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही,मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही, वृद्धप्रमातामही और अन्य पितृजनोंको मेरे द्वारा दिया गया यह पिण्ड अक्षय होकर उन्हें प्राप्त हो।