12 -पूजानुक्रम-निरूपण

श्रीहरिने कहा-हे रुद्र ! देवके पूजनका जो क्रम है, उसके ज्ञानके लिये पूजाविधिके क्रमको कहा जा रहा है। सर्वप्रथम साधकको 'ॐ नमः' मन्त्रसे परमात्माका स्मरण करना चाहिये। तदनन्तर वह 'यं रं वं लम्‌' इन बीजमन्त्रोंके द्वारा शरीरकी शुद्धि करके 'ॐ नमः ' इस मन्त्रसे चतुर्भुज भगवान्‌ विष्णुके रूपमें ही अपनेको मान ले।

तत्पश्चात्‌ करन्यास तथा देहन्यास करे। तदनन्तर हृदयमें योगपीठकी पूजाका विधान है। जिसको इन मन्त्रोंसे करे-।

'ॐ अनन्ताय नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ वैराग्याय नम:।

ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ अधर्माय नमः। ॐ अज्ञानाय नमः।  ॐ अवैराग्याय नमः। ॐ अनैश्वर्याय नमः। ॐ पद्माय नम:।ॐ आदित्यमण्डलाय नमः।

ॐ चन्द्रमण्डलाय नम:। ॐ वह्लिमण्डलाय नम:। ॐ विमलायै नमः।

ॐ उत्कर्षिण्यै नमः। ॐ ज्ञानायै नम:। ॐ क्रियायै नम:। ॐ योगायै नमः।

ॐ प्रह्यै नमः।ॐ सत्यायै नमः। ॐ ईशानायै नमः। ॐ सर्वतोमुख्ये नमः।

ॐ साङ्गोपाङ्गय हरेरासनाय नमः।'

इसके बाद साधक कर्णिकाके मध्यमें 'अं वासुदेवाय नमः' कहकर भगवान्‌ वासुदेवको नमस्कार करके निम्न मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करे-

'आं हृदयाय नम:। ईं शिरसे नमः। ऊँ शिखायै नम:। ऐं कवचाय नमः।

 औं नेत्रत्रयाय नम:। अः 'फट् अस्त्राय नमः।'

तदनन्तर - 'आं सक्ड़र्षणाय नम:। अं प्रद्युम्नाय नमः। अ: अनिरुद्धाय नम:।

ॐ अ: नारायणाय नम:। ॐ तत्सद्रह्मणे नम:। ॐ हुं विष्णवे नमः।

क्षौं नरसिंहाय नम:। भूर्वराहाय नम:।' - इन मन्त्रोंसे संकर्षण आदि व्यूहदेवोंको नमस्कार करे।

तत्पश्चात्‌ साधक निम्न मन्त्रोंसे भगवान्‌ विष्णुके वाहन एवं आयुधादिको नमस्कार करे -

'कं टं जं शं वैनतेयाय (नमः)। जं खं वं सुदर्शनाय (नम:)। खं चं फं षं गदायै (नमः)।

वं लं मं क्ष पाञ्चजन्याय (नमः )। घं ढं भं हं श्रियै (नमः )। गं डं वं शं पुष्टयै ( नमः)।

धं वं वनमालायै (नमः )। दं शं श्रीवत्साय (नमः )। छं डं यं कौस्तुभाय ( नमः )।

शं शा्ङ्गयि ( नमः )। इं इषुधिभ्यां (नमः)। चं चर्मणे ( नमः )। खं खड्गाय ( नम: )।

तत्पश्चात्‌ इन बीजमन्त्रोंसे इन्द्रादि दिक्‍पालोंको नमस्कार करना चाहिये।

(ॐ) लं इन्द्राय सुराधिपतये ( नमः )। (ॐ) रं अग्नये तेजोडइधिपतये ( नमः )।

(ॐ) यमाय धर्माधिपतये (नम:)। (ॐ) क्षं नैऋताय रक्षोधिपतये (नम:)।

(ॐ) वं वरुणाय जलाधिपतये (नम: )। (ॐ) यों वायवे प्राणाधिपतये (नमः )।

(ॐ) धां धनदाय धनाधिपतये (नमः )।(ॐ) हां ईशानाय विद्याधिपतये ( नमः )।

इसके बाद क्रमश: पूर्वोक्त इन्द्र आदि दिक्पाल देवताओंके निम्न आयुधोंको प्रणाम करनेका विधान है -

(ॐ) वज्राय ( नमः)। (ॐ) शक्त्यै ( नम: )। (ॐ) दण्डाय ( नमः )।

(ॐ) खड़्गाय ( नमः )। (ॐ)पाशाय ( नमः )।(ॐ) ध्वजाय ( नमः )।

(ॐ) गदायै ( नमः )। (ॐ) त्रिशूलाय ( नमः )।

इसके बाद भगवान्‌ अनन्त तथा ब्रह्मदेवको इस मन्त्रसे प्रणाम करे -

(ॐ) लं अनन्ताय पातालाधिपतये ( नमः )।

(ॐ) खं ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये ( नमः )।

अब इसके बाद साधक भगवान्‌ वासुदेवको नमस्कार करनेके लिये द्वादशाक्षर-मन्त्रका प्रयोग करे, साथ ही द्वादशाक्षर-मन्त्रके बीजमन्त्रों और दशाक्षर - मन्त्रके बीज - मन्त्रोंको इस प्रकार नमस्कार करे -

'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।' ॐ ॐ नम:। ॐ नं नमः। ॐ मों नमः।

ॐ ॐ भं नमः। ॐ गं नमः।ॐ वं नम:। ॐ तें नमः। ॐ वां नमः।

ॐ सुं नमः। ॐ दें नम:।ॐ वां नमः। ॐ यं नम:। ॐ ॐ नमः। ॐ नं नमः।

ॐ मों नम:। ॐ नां नम:। ॐ रां नम:। ॐ यं नमः। ॐ णां नमः। ॐ यं नमः।

द्वादशाक्षर - मन्त्र - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, दशाक्षरमन्त्र - ॐ नमो नारायणाय नमः तथा अष्टाक्षरमन्त्र - ॐ पुरुषोत्तमाय नमः - इन मन्त्रोंका यथाशक्ति जप करके निम्न मन्त्रसे भगवान् पुण्डरीकाक्षको नमस्कार करे -

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।

सुब्रह्मण्य नमस्तेउस्तु महापुरुष पूर्वज॥

हे पुण्डरीकाक्ष! (कमलनयन) आपको नमस्कार है। हे विश्वके कारणभूत! आपको मेरा प्रणाम है। हे ब्रह्मण्यदेव! आपको नमस्कार है। हे महापुरुष! हे पूर्वज! आपको मेरा प्रणाम है।

इस प्रकार भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति करके साधकको हवन करना चाहिये। तदनन्तर साधक (महापुरुषविद्या नामक) मन्त्रका विधिपूर्वक एक सौ आठ बार जप करके अर्घ्य प्रदान करे और 'जितं तेन' (यह स्तोत्र ही महापुरुषविद्या है) इसी स्तोत्रसे उन भगवान्‌ नारायणको बारम्बार प्रणाम करना चाहिये।

तत्पश्चात्‌ [अग्निकी स्थापना करके] साधक उस अग्निदेवकी पूजा करनेके बाद हवन करे। अपने (यथाविहित) बीजमन्त्रसे देवाधिदेव भगवान्‌ विष्णु तथा अङ्गमन्त्रोंके द्वारा अच्युतादि आकङ्गिक देवताओंको आहुति प्रदान करे। सबसे पहले मन्त्रविद्‌ साधकको कुण्डमें ॐकारके द्वारा [तीन रेखाओंका] उल्लेखन करना चाहिये और उसके बाद यज्ञकुण्डका अभ्युक्षण ('अभ्युक्षण' जलके द्वारा पवित्र करनेकी एक शास्त्रीय विधि है।) करना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि भ्रामणपूर्वक हवनकुण्डमें अग्नि स्थापित करके उत्तम फल आदिसे सविधि उसकी पूजा करनी चाहिये।

पहले साङ्गोपाङ्ग देव ब्रह्मका मनसे ध्यानकर मण्डलमें उन सभीको स्थापित करे। तदनन्तर वह साधक वासुदेव - मन्त्रसे एक सौ आठ बार आहुति दे। तत्पश्चात्‌ वह सङ्कर्षण आदि देवोंके बीजमन्त्रसे उन छ: देवोंकी भी पूजा करके अङ्ग देवताओंको तीन-तीन और दिक्पालोंको एक-एक आहुति प्रदान करे। उसके बाद हवन पूर्ण होनेपर साधकको पुन: एकाग्रचित्त स्थित होकर पूर्णाहुति देनी चाहिये।

तदनन्तर वह साधक 'वाणीसे अतीत उस परमात्मा' में अपने आत्माको लीन करे और निम्नलिखित मन्त्रसे वासुदेव और उन सभी देवोंका विसर्जन करे -

'गच्छ गच्छ परं स्थानं यत्र देवो निरञ्चन:॥

गच्छन्तु देवता: सर्वा: स्वस्थानस्थितिहेतवे।'

'हे देवाधिदेव भगवान्‌ वासुदेव! अब आप उस अपने परम स्थानको प्राप्त करें, जहाँपर निर्मल (प्रकाशस्वरूप) परम ब्रह्मका निवास है। अङ्गदेव, सङ्कर्षणादि और इन्द्रादि दिक्पाल! आप सभी देव अपने - अपने स्थानमें निवास करनेके लिये प्रस्थान करें!'

सुदर्शन, श्रीहरि, अच्युत, त्रिविक्रम, चतुर्भुज, वासुदेव, प्रद्युम्न, सङ्कर्षण और पुरुषसे युक्त देवोंका (एक जो समूह है उसे) नवव्यूह माना गया है। इसमें दसवें परम तत्त्वका योग होनेसे यह दशात्मक कहा जाता है। इसी नवव्यूहमें अनिरुद्ध तथा अनन्तका संनिवेश होनेसे यह एकादश व्यूह द्वादशात्मक कहलाता है।

अङ्गीत चक्रोंमें उस प्रधान देवकी पूजा करनेपर वह (साधकके) घर आदिकी रक्षा करता है। अत: निम्न मन्त्रोंसे चक्रादिकी पूजा करनी चाहिये -

ॐ चक्राय स्वाहा। ॐ विचक्राय स्वाहा। ॐ सुचक्राय स्वाहा।

ॐ महाचक्राय स्वाहा। ॐ असुरान्तकृत्‌ हुँ फट्‌। ॐ हुं सहस्त्रार हुं फट्‌।

उपर्युक्त मन्त्रोंसे की गयी पूजा द्वारकाचक्रकी पूजा कही जाती है। इस प्रकार सम्पन्न की गयी चक्रकी पूजा 'घरमें' सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली तथा मङ्गलदायिनी है।