गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
138 - सूर्यवंश वर्णन
श्रीहरिने कहा - हे रुद्र! अब मैं राजाओंके वंश और उनके चरितका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम सूर्यवंशका वर्णन सुनें। भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्माके अङ्गुष्ट भागसे दक्षका जन्म हुआ। दक्षसे उनकी पुत्री अदितिका प्रादुर्भाव हुआ, जो देवमाता कहलाती हैं। उन्हीं अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान् से वैवस्वत मनु हुए और उन मनुसे इक्ष्वाकु, शर्याति, नृग, धृष्ट, पृषश्र, नरिष्यन्त, नभग, दिष्ट तथा शशक (करुष) नामक नौ पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। हे रुद्र! मनुकी इला नामकी कन्या थी और सुद्युम्न नामक पुत्र था। इलाके बुधसे राजा पुरूरवा उत्पन्न हुए। सुद्युम्नसे उत्कल, विनत तथा गय नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ।
गोवध करनेके कारण मनुका पुत्र पृषध्र शूद्र हो गया था। करुष (शशक) - से क्षत्रिय लोगोंकी उत्पत्ति हुई, जो कारुष नामसे विख्यात हुए। मनुके पुत्र दिष्टसे जो नाभाग नामका पुत्र हुआ वह वैश्य हो गया था। उससे एक भलन्दन नामक पुत्र हुआ। भलन्दनसे वत्सप्रीति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वत्सप्रीतिसे पांशु और खनित्र - दो पुत्रोंका जन्म हुआ। खनित्रसे भूप, भूपसे क्षुप, क्षुपसे विंश और विंशसे विविंशकने जन्म लिया।
विविंशकसे खनिनेत्र और खनिनेत्रसे विभूति नामक पुत्रका जन्म हुआ। विभूतिसे करन्धम नामक पुत्र हुआ। करन्धमसे अविक्षित, अविक्षितसे मरुत् और मरुतूसे नरिष्यन्तकी उत्पत्ति मानी जाती है। नरिष्यन्तसे तम, तमसे राजवर्धन, राजवर्धनसे सुधृति, सुधृतिसे नर, नरसे केवल तथा केवलसे बन्धुमान् हुआ।
बन्धुमान्के वेगवान, वेगवान्के बुध और बुधके तृणबिन्दु नामक पुत्र हुआ। तृणबिन्दुने अलम्बुषा नामकी अप्सरासे इलविला नामकी कन्या तथा विशाल नामक पुत्र उत्पन्न किया। विशालके हेमचन्द्र नामक पुत्र हुआ। हेमचन्द्रसे चन्द्रक, चन्द्रकसे धूम्राश्व, धूम्राश्वसे सुञ्जय, सृञ्जयसे सहदेवकी उत्पत्ति हुई। सहदेवके कृशाश्व नामक पुत्र हुआ। कृशाश्वसे सोमदत्त और सोमदत्तसे जनमेजय हुआ। जनमेजयसे सुमन्ति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। इन सभी (राजाओं) - को वैशालक कहा गया है।
वैवस्वत मनुके पुत्र शर्यातिके सुकन्या नामकी पुत्री हुई, जो च्यवन ऋषिकी भार्या बनी। शर्यातिके अनन्त नामक पुत्र भी था। उससे रेवत नामका पुत्र हुआ। रेवतके भी रैवत नामक पुत्र हुआ। उससे रेवती नामकी कन्या हुई।
वैवस्वत मनुके पुत्र धृष्टके धार्ष्ट हुआ, जो वैष्णव हो गया था। उन्हीं मनुके पुत्र नभगके नेदिष्ठ नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उससे अम्बरीष हुआ। अम्बरीषके विरूप, विरूपके पृषदश्व और उसके रथीनर हुआ, जो वासुदेवका भक्त था।
मनुपुत्र इक्ष्वाकुके विकुक्षि, निमि और दण्डक तीन पुत्र हुए। विकुक्षि यज्ञीय शशक (खरगोश) - का भक्षण करनेके कारण शशाद नामसे विख्यात हुआ। शशादसे पुरञ्जय और ककुत्स्थ नामक दो पुत्र हुए। इसी ककुत्स्थसे अनेनस् (वेण) तथा अनेनससे पृथु उत्पन्न हुआ। पृथुके विश्वरात नामक पुत्र हुआ। विश्वरातसे आर्द्रकी उत्पत्ति हुई। आर्द्रसे युवनाश्व, युवनाश्चके श्रीवत्स, श्रीवत्सके बृहदश्व, बृहदश्वके कुवलाश्व और कुबलाश्वके दृढाश्व हुआ, जिसकी प्रसिद्धि धुन्धुमारके नामसे हुई थी।
दृढाश्वके चन्द्राश्व ,कपिलाश्व और हर्यश्व नामक तीन पुत्र थे। हर्यश्वके निकुम्भ, निकुम्भके हिताश्व, हिताश्वके पूजाश्व और उसके युवनाश्व हुआ। युवनाश्वके मान्धाता हुए। मान्धाता एवं उनकी पत्नी बिन्दुमतीसे मुचुकुन्द, अम्बरीष तथा पुरुकुत्स नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ। उनकी पचास कन्याएँ भी थीं। जिनका विवाह सौभरि मुनिके साथ हुआ था।
अम्बरीषके युवनाश्व तथा युवनाश्वके हरित हुआ। पुरुकुत्सके नर्मदा नामक पत्नीसे त्रसदस्यु नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उससे अनरण्य, अनरण्यसे हर्यश्व , हर्यश्वसे वसुमना हुआ। उसीका पुत्र त्रिधन्वा था। उसके त्रय्यारुण नामक पुत्र हुआ। त्रय्यारुणके सत्यरत हुआ, जो त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध है। हरिश्चन्द्र इसीसे उत्पन्न हुए थे। हरिश्चन्द्रके रोहिताश्व और रोहिताश्वके हारीत हुआ। हारीतके चंचु, चंचुके विजय, विजयके रुरुक, रुरुकके वृक, वृकके राजा बाहु और बाहुके पुत्र राजा सगर माने जाते हैं।
'हे शिव! सगरसे सुमति नामक पत्नीके साठ हजार पुत्र हुए। उनकी दूसरी पत्नी केशिनीसे असमंजस नामक एक पुत्र हुआ। उस असमंजससे अंशुमान् तथा अंशुमान् से दिलीप नामक एक विद्वान् पुत्रने जन्म लिया। दिलीपसे भगीरथ हुए, जिनके द्वारा पृथिवी पर गङ्गा लायी गयी हैं।
भगीरथका पुत्र श्रुत था। श्रुतसे नाभाग हुआ। नाभागसे अम्बरीष, अम्बरीषसे सिन्धुद्वीप, सिन्धुद्वीपसे अयुतायु हुआ।अयुतायुका पुत्र ऋतुपर्ण था, ऋतुपर्णसे सर्वकाम और सर्वकामसे सुदास, सुदाससे सौदास हुआ। जिसका नाम मित्रसह भी माना जाता है। कल्माषपाद उसीका पुत्र है, जो दमयन्तीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। कल्माषपादके अश्वक, अश्वकके मूलक, मूलकके दशरथ हुआ। दशरथके ऐलविल, ऐलविलके विश्वसह, विश्वसहके खट्वाङ्ग , खट्वाङ्गके दीर्घबाहु, दीर्घबाहुके अज तथा अजके दशरथ हुए। इनके महापराक्रमी चार पुत्र हुए, जो राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न नामसे प्रसिद्ध हैं।
रामसे कुश और लव, भरतसे तार्क्ष तथा पुष्कर, लक्ष्मणसे चित्राङ्गद एवं चन्द्रकेतु और शत्रुघ्नसे सुबाहु तथा शूरसेन नामक पुत्र हुए। कुशके अतिथि, अतिथिके निषध नामक पुत्र हुआ। निषधके नल तथा नलके नभस नामका पुत्र माना गया है। नभसके पुण्डरीक और पुण्डरीकसे क्षेमधन्वा नामक पुत्रने जन्म लिया। उसका पुत्र देवानीक था, उससे अहीनक, अहीनकसे रुरु तथा रुरुसे पारियात्र नामक पुत्रका जन्म हुआ। पारियात्रसे दलकी उत्पत्ति हुई और दलसे छल, छलसे उक्थ, उक्थसे वज्रनाभ और वज्रनाभसे गण, गणसे उषिताश्व, उषिताश्वसे विश्वसहकी उत्पत्ति हुई। हिरण्यनाभ उसीका पुत्र था। उसका पुत्र पुष्पक माना गया है।
पुष्पकसे ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धिसे सुदर्शन, सुदर्शनसे अग्निवर्ण, अग्निवर्णसे पद्मवर्ण हुआ। पद्मवर्णसे शीघ्र और शीघ्रसे मरु हुए। मरुसे सुश्रुत और उससे उदावसु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। उदावसुसे नन्दिवर्धन, नन्दिवर्धनसे सुकेतु, सुकेतुसे देवरातकी उत्पत्ति हुई। देवरातका पुत्र बृहदुक्थ था। बृहदुक्थके महावीर्य, महावीर्यके सुधृति, सुधृतिके धृष्टकेतु, धृष्टकेतुके हर्यश्व, हर्यश्वके मरु, मरुके प्रतीन्धक हुआ। प्रतीध्नकसे कृतिरथ और कृतिरथके देवमीढ नामक पुत्र हुआ। देवमीढसे विबुध, विबुधसे महाधृति, महाधृतिसे कीर्तिरात तथा कीर्तिरातसे महारोमा नामक पुत्र हुआ।
महारोमाके स्वर्णरोमा हुए। स्वर्णरोमाके हस्वरोमा नामका पुत्र था। हस्वरोमाके सीरध्वज हुआ। उसके सीता नामकी एक पुत्री हुई। सीरध्वजके कुशध्वज नामका एक भाई भी था सीताके अतिरिक्त सीरध्वजके भानुमान् नामका एक पुत्र भी हुआ। उस भानुमानूसे शतद्युम्न, शतद्युम्नसे शुचि नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। शुचिके ऊर्ज नामक पुत्र था। उस ऊर्जसे सनद्वाज उत्पन्न हुआ। सनदूाजसे कुलिने जन्म लिया। उस कुलिसे अनञ्जन नामक पुत्र हुआ। अनञ्जनसे कुलजितत्की उत्पत्ति हुई। उसके भी आधिनेमिक नामका पुत्र था। उसका पुत्र श्रुतायु हुआ और उस श्रुतायुसे सुपार्श्व नामक पुत्रने जन्म ग्रहण किया। सुपार्श्वसे सृञ्जय, सृञ्जयसे क्षेमारि, क्षेमारिसे अनेना और उस अनेनाका पुत्र रामरथ माना गया है।
रामरथका पुत्र सत्यरथ, सत्यरथका पुत्र उपगुरु, उपगुरुका उपगुप्त तथा उपगुप्तका पुत्र स्वागत था। स्वागतसे स्ववरकी उत्पत्ति हुई। सुवर्चा उसीका पुत्र था। सुवर्चासे सुपार्श्व और सुपार्श्वसे सुश्रुत, सुश्रुतसे जयकी उत्पत्ति हुई। जयसे विजय, विजयसे ऋत, ऋतसे सुनय, सुनयसे वीतहव्य, वीतहव्यसे धृतिकी उत्पत्ति मानी गयी है। धृतिके बहुलाश्व और बहुलाश्वके कृति नामक पुत्र था। उस कृतिके जनक हुए। जनकके दो वंश कहे गये हैं, जिन्होंने योगमार्गका अनुसरण किया था।