75 - कर्केतनमणिकी परीक्षा - विधि

सूतजीने कहा - पवनदेवने रन्तबीजरूप उस दैत्यराज बलासुरके नखोंको प्रसन्न्‍तापूर्वक लेकर कमल - वनप्रान्तमें बिखेर दिया। वायुद्वारा विकीर्ण उन नखोंसे पृथिवीपर कर्केतन नामक पूज्यतम मणिका जन्म हुआ। उसका वर्ण रक्त, चन्द्र एवं मधुसदृश, ताम्र, पीत, अग्निवत्‌ प्रज्वलित, समुज्वल, नील तथा श्वेत होता है। रत्न - व्याधि आदि दोषोंके कारण वह कठोर एवं विभिन्न वर्णोमें भी प्राप्त होती है।

जो कर्केतनमणियाँ स्निग्ध, स्वच्छ, समराग, अनुरञ्जित, पीत, गुरुत्व धर्मसे संयुक्त एवं विचित्र आभासे व्याप्त तथा संताप, व्रण और व्याधि आदि दोषोंसे रहित होती हैं, उन्हें विशुद्ध या परम पवित्र माना जाता है।

स्वर्णपत्रमें सम्पुटितकर जब उन मणियोंको अग्निमें शोधित किया जाता है तो वे अत्यधिक देदीप्यमान हो उठती हैं। ऐसी विशुद्ध कर्केतनमणि रोगका नाश करनेवाली, कलिके दोषोंको नष्ट करनेवाली, कुलकी वृद्धि करनेवाली तथा सुख प्रदान करनेवाली होती है।

जो मनुष्य अपने शरीरको अलंकृत करनेके लिये इस प्रकारके बहुत - से गुणोंवाली कर्केतन नामक मणिको धारण करते हैं, वे पूजित, प्रचुर धनसे परिपूर्ण तथा अनेक बन्धु - बान्धवोंसे सम्पन्न होते हैं और नित्य उज्ज्वल कीर्तिसे सम्पन्न तथा प्रसन्न रहते हैं।

अन्य दूषित कर्केतनमणिको धारण करनेवाले विकृत, व्याकुल, नीली कान्तिवाले, मलिन घृतिवाले, स्नेहरहिंत, कलुषित तथा विरूपवान्‌ हो जाते हैं। वे तेज, दीप्ति, कुल, पुष्टि आदिसे विहीन होकर दूषित कर्केतनके सदृश शरीरकों धारण करते हैं।