गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
172 - स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ
धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! अब मैं स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्साका वर्णन करूँगा। उसे आप सुनें। स्त्रियोंके योनिभागमें होनेवाले रोगोंको दूर करनेके लिये बहुत - से कर्म हैं, किंतु जो कर्म वातदोष - नाशक हैं, उन्हींको प्रशस्त माना जाता है।
वच, उपकुञ्चिका(काला जीरा), जातीफल(जायफल), कृष्णा (काली तुलसी), वासक(अड़ूसा), सैन्धव (सेंधा नमक), अजमोदा(अजवाइन), यवक्षार, चित्रक तथा शर्कराको पीसकर सभीको मिश्रित करके घीमें भूनकर जल या दूधके साथ सेवन किया जाय तो स्त्रियोंकी योनिके पार्श्रभागमें होनेवाला शूल, हृदयरोग, गुल्म और अर्श - विकार दूर हो जाता है। बेरकी पत्तियोंको पीसकर योनिभागमें लेप करनेसे उसकी वेदना शान्त हो जाती है। लोध्र और तुम्बीफलका प्रलेप योनिको दृढ़ एवं संकुचित बनाता है।
पीपल, वट, पाकड़, गूलर और आम - इन पाँचोंके पल्लव और मधुयष्टि तथा मालतीपुष्पका अग्नि या सूर्यकी गर्मीमें सिद्ध घृतपाक रक्तप्रदर एवं योनि - दुर्गन्धका विनाशक है। कांजीमें जपापुष्प(अड़हुलके फूल), ज्योतिष्मती - दल, मालकँगनीकी पत्ती (दूर्वा) और चित्रकको पीसकर शर्कराके साथ पान करनेसे भी योनिरोग दूर हो जाता है।
आँवला, रसौत तथा हरीतकीका चूर्ण जलके साथ पान करनेपर वह स्त्रीके रजोदोषको दूर करता है। ऋतुकालमें लक्ष्मणा(श्वेत कण्टकारी) - की जड़को दुग्धके साथ पान करने या नस्य लेनेसे स्त्रीको पुत्र उत्पन्न होता है। ढाई सेर दुग्ध और सवा सेर घृतमें सिद्ध अश्वगन्धाका रस सेवन करनेसे भी स्त्रीको पुत्रकी प्राप्ति होती है। घृतके साथ व्योष (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च) तथा केसरके चूर्णका सेवन करके तो वन्ध्या स्त्री भी पुत्रवती बन जाती है।
कुश, काश, एरण्ड और गोखरूकी जड़को पीसकर उनके ही द्वारा सिद्ध गोदुग्ध एवं शर्कराका पान करनेसे गर्भिणी स्त्रीके उदरभागमें होनेवाला शूल शान्त हो जाता है। पाठा (पाढ़ा), लाङ्गलि(कलियारी), सिंहास्य (कचनार), मयूर (चिचड़ा) और कुटज (गिरिमल्लिका या कुरैया) - को अलग - अलग पीसकर नाभि, पेड़ू तथा योनिभागमें लेप करनेसे स्त्रीको सुखपूर्वक प्रसव होता है। मदार या बकुलकी जड़का लेप प्रसूता स्त्रीके हृदय, मस्तक और वस्ति (पेड़ू ) - भागमें होनेवाली पीड़ाका हरण करता है। ऐसी स्थितिमें सत्रीको दही अथवा गुनगुने जलमें यवक्षारको मिलाकर पीना चाहिये। दशमूलके क्वाथसे सिद्ध घृतपाक भी प्रसूता स्त्रीकी पीड़ाका विनाशक है। दुग्धके साथ साठी चावलका चूर्ण सेवन करनेसे प्रसूता स्त्रीकों दूध होने लगता है। विदारीकन्द, सतावर तथा कपासके बीजोंका योग भी प्रसूताके दुग्धवृद्धिमें सहायक है। स्तनशोधनके लिये प्रसूता स्त्रियोंको मूँगका जूस पीना चाहिये।
कूट, वच, हरीतकी, ब्राह्मी, द्राक्षाफल, मधु और घृतका योग रंग, आयु तथा सौन्दर्यवर्धक होता है। इन सभी औषधियोंका लेह बालकको चटाना चाहिये। स्तनजन्य दूधका अभाव होनेपर बकरी अथवा गायका दुग्ध बालकके लिये उचित होता है। बच्चेकी नाभिमें सूजन आ जानेपर उसको अग्निमें गरम की गयी मिट्टीसे सेंकना चाहिये। वमन, खाँसी और ज्वर होनेपर मुस्त (नागरमोथा) तथा विषा (सोंठ) - के चूर्णको मधु आदिके साथ चाटना या क्वाथ बनाकर पीना चाहिये। नागरमोथा, सोंठ, गूलर, बिल्व और कुटज(कुरैया) नामक औषधियोंका रस अतिसाररोगका विनाश करता है।
व्योष (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च), बिजौरा नीबू तथा मधुके योगसे हिचकी और वमनरोग दूर होते हैं। कुष्ठ (कूट), इन्द्रयव, सरसों, हल्दी तथा दूर्वारससे कुष्ठरोगपर सफलता प्राप्त की जा सकती है।
महामुण्डिनिका (महाश्रावणिका) तथा उदीच्य(ह्रीवेर या चोपचीनी) - के क्वाथसे स्नान करनेपर ग्रहका दोष दूर हो जाता है। ग्रहदोष होनेपर शरीरमें सप्तपर्णी, हल्दी और चन्दनका लेप करना चाहिये। शंख, कमलगट्टा, रुद्राक्ष, वच तथा लौह आदि धारण करनेसे भी ग्रह - दोष दूर होता है।
बालकोंपर ग्रह - दोषका प्रभाव होनेपर निम्न मन्त्रसे उसकी शान्तिका प्रयास करना चाहिये - ‘ॐ कं टं गं गं वैनतेयाय नमः’, ‘ॐ हों हां हः’ - इस मन्त्रसे मार्जन करने तथा बलि प्रदान करनेसे अरिष्ट ग्रह शान्त हो जाता है। बलि प्रदान करते समय निम्न मन्त्रका उच्चारण करे -
‘ॐ ह्रीं बालग्रहाद् बलिं गृह्णीत बालं मुञ्चत स्वाहा।’
चावलके धोवनमें शिरीष(शिरीषोविषघ्रानामू (चरक सं०)) - वृक्षकी जड़ पीसकर पीनेसे विष - दोष दूर हो जाता है। चावलके ही पानीमें मिलाकर पीसे हुए श्वेत फूलवाले वर्षाभूं (वर्षाभू या पुनर्नवाका तात्पर्य धमरवरुआ नामकी प्रसिद्ध औषधिसे है। इसका फूल श्वेत होता है। इसकी पत्तियोंकी आकृति पुनर्नवाके समान होती है। इन दोनोंकी पत्तियोंमें अन्तर इतना है कि पुनर्नवाकी पत्तियाँ छोटी और धमरवरुआकी पत्तियाँ बड़ी होती हैं। वर्षाकालमें पुनर्नवाके समान ही यह औषधि भी अधिक पायी जाती है। मूलतः तो यह पुनर्नवाका एक उपभेद ही है।) (पुनर्नवा) - का रस सर्पदंशके विषको दूर कर देता है।
दही, घृत, चौराई, गृह - धूम, हल्दी, मधु तथा सेंधा नमकको पीसकर पीना विषनाशक है। घृत - मिश्रित सिंहोरकी जड़का क्वाथ पीनेसे भी विष - दोष दूर हो जाता है।
जो औषधि वृद्धावस्थाको दूर करनेका सामर्थ्य रखती है, उसको रसायन((लाभो पाथो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्। (सुं सं सूं अं)) कहा जाता है। रसायनकी अभिलाषा करनेवाले लोगोंको वर्षा आदि ऋतुओंमें यथाक्रम सेंधा नमक, शर्करा, सोंठ, पिप्पली, मधु तथा गुड़के साथ हरीतकी नामक औषधिका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् वर्षाकालमें सेंधा नमक, शरत्कालमें शर्करा, हेमन्तकालमें सोंठ, शिशिरकालमें पिप्पली, वसन्तकालमें मधु तथा ग्रीष्मकालमें गुड़के साथ हरीतकीका (च० चि० 1)सेवन प्राणियोंके लिये रसायनका कार्य करता है।
ज्वरकी समाप्तिपर व्यक्ति एक हरीतकी, दो बहेड़ा, चार आँवला, मधु और घृतका सेवन करके सौ वर्षतक जीवित रहता है। दूध तथा घृतके साथ अश्वगन्धा नामक औषधि तो प्राणियोंके शरीरमें होनेवाले सभी रोगोंका विनाश करती है। मण्डूकपर्णी और विदारीकन्दका रस अमृतके समान है। मनुष्य तिल, आँवले और भृंगराजके सेवनसे शतायु बन जाता है। त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, गुडूची, शतावरी, विडंग और लौहचूर्ण मधुके साथ मिलाकर खाना सभी रोगोंका विनाशक बन जाता है। त्रिफला, पिप्पली, सोंठ, गुडूची, शतावरी, विडंग तथा भृंगगज आदिका सिद्ध रस भी सभी रोगोंको विनष्ट करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होता है। एक भाग शतावरी तथा दस भाग दुग्धसे कल्क बनाकर शर्करा, पिप्पली और मधुसे युक्त घृतपाक अत्यन्त पौष्टिक होता है।
चिकित्सामें प्रतिमर्ष, अवपीड, नस्य, प्रवपन तथा शिरोव्रिचन - ये पाँच कर्म कहे जाते हैं। क्रमश: माघ आदि प्रत्येक दो मासकी एक ऋतु होती है। इस प्रकार एक वर्षमें छः ऋतुएँ(शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् और हेमन्त) होती हैं। इन सभी ऋतुओंमें अग्निसिवन, मधु, दूध और दहीके विवर्त्त आदिका सेवन करना चाहिये। मनुष्यको शिशिर - ऋतुमें सत्रीके साथ रहना चाहिये। वसन्त - ऋतुमें दिनमें सोना उचित नहीं है। वर्षा - ऋतुमें दिवा - निद्रा तथा शरत्कालमें चन्द्रकिरणोंका सेवन मनुष्यके लिये त्याज्य है।
साठी चावल, मूँगकी दाल, वर्षाका जल, क्वाथ और दूध पथ्य हैं। नीम, अलसी, कुसुम्भ,( कुसुम्भ (बरें)) सहिजन, सरसों, ज्योतिष्मती तथा मूलीका तेल भी प्राणीके लिये पथ्य माना गया है। ये कृमि, कुष्ठ, प्रमेह, वात, श्लेष्मज दोष और सिरमें होनेवाली पीड़ाका नाश करते हैं।
अनार, आँवला, बेर, करौंदा, चिरौंजी, नीबू, नारंगी, आमड़ा और कपित्थ नामक फल भी पथ्य हैं। किंतु ये पित्तवर्धक और अग्निविनाशक हैं तथा इनसे कफजनित दोष होता है। जल, नागरमोथा, इक्षुरस और कुटज मल - मूत्रके अवरोधको दूर करनेमें समर्थ होते हैं।
धामार्गव अर्थात् घिया तरोईको सदैव वमनके रोगमें सेवन करना चाहिये। पूर्वाह्कालमें वमन करनेके लिये वचके साथ खैर और इन्द्रयवका सेवन लाभप्रद है। पित्तदोष होनेसे प्राणियोंका अन्नादिक कोष्ठ सबल नहीं रह पाता। उनमें एक प्रकारकी मधुरता रहती है। वात और कफदोषका आश्रय मिलनेसे उसमें दोष अधिक ही आ जाते हैं। वात, पित्त और कफ - इन त्रिदोषोंकी समान स्थिति रहनेपर उन कोष्ठोंकी क्षमता मध्यम रह जाती है।(उस स्थितिमें न तो उनकी कार्य - क्षमतामें शिथिलता रहती है और न उनमें दोषोंकी क्षमताकी अभिवृद्धि। शरीरके अंदर स्थित कोष्ठका कार्य चलता रहता है।) पित्तदोष होनेपर निसोतका सेवन करके विरेचन करना चाहिये। सेंधा नमक, सोंठ, निसोत, हरीतकी तथा विडंगको गोमूत्रसे सिद्धकर शर्कया और मधुके साथ सेवन करनेपर विरेचनमें अधिक लाभ होता है। वातदोषके प्रबल होनेपर उत्पन्न हुए दोषोंमें रोगीको एक भाग एरण्ड तेल और दो भाग त्रिफलाका क्वाथ पान कराकर वमन कराना चाहिये।
छ: अंगुल, आठ अंगुल या बारह अंगुल लम्बी बाँस आदिकी नेत्रि अर्थात् पिचकारी बनाकर और उस पिचकारीमे कर्कन्धू (बेर) - फलके समान छिद्र करके रोगीको उत्तान सुलाकर वस्ति - क्रिया करनी चाहिये। निरुहदान या निरुढवस्तिके प्रयोगमें भी यही विधि कही गयी है। इन दोनों विधियोंमें औषधियोंकी मात्रा आधा पल, तीन पल तथा छः पल होनी चाहिये। इसी मात्राको क्रमश: लघु, मध्यम तथा उत्तम कहा जाता है। इस वस्ति - विधिमें शतावरी, गुडूची, भृंगराज तथा सिन्धुवार आदिके रसमें भावित हरीतकी एक भाग, बहेड़ा दो भाग और आँवला चार भाग होना चाहिये। ये औषधियाँ उदररोगकी पीड़ाको समाप्त कर देती हैं।