गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
13 - विष्णुपञ्जरस्तोत्र
(पञ्चर'का अर्थ है-रक्षक। यह विष्णुका स्तोत्र हम सबका रक्षक है, इसलिये 'विष्णुपञ्जरस्तोत्र' कहा जाता है।)
श्रीहरिने पुन: कहा - हे रुद्र ! अब मैं विष्णुपञ्चर नामक स्तोत्र कहता हूँ। यह स्तोत्र (बड़ा ही) कल्याणकारी है। उसे सुनें -
प्रवक्ष्याम्यधुना ह्योतद्दैष्णवं पञ्चरं शुभम्।
नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्॥
प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:।
गदां कौमोदकों गृह्य पद्मनाभ नमोस्तु ते॥
याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः।
हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम॥
प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:।
मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्॥
उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः।
खड्गमादाय चर्माथ अस्त्रशस्त्रादिकं हरे॥
नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः।
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमनुघोष्यं च पङ्कजम्॥
प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञशूकर।
(वामनपुराण अध्याय १7 के अनुसार 'यज्ञशूकर' पाठ उचित है।)
चन्द्रसुर्यं समागृहा खड़गं चान्द्रमसं तथा॥
नैऋ्रत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नुकेसरिन्।
वैजयन्तीं सम्प्रगृह्म श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्॥
वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोस्तु ते।
वैनतेयं समारुह्म त्वन्तरिक्षे जनार्दन॥
मां रक्षस्वाजित सदा नमस्ते स्त्वपराजित।
विशालाक्षं ( विशालाक्ष -गरुडवंशविशेष (शब्दकल्पद्दुम)) समारुह्म रक्ष मां त्वं रसातले॥
अकूपार (अकूपार --कूर्मराज (मेदिनीकोश)) नमस्तुभ्यं महामीन नमोउस्तु ते।
करशीर्षाद्यङ्गलीषु सत्य त्वं बाहुपञ्चरम्॥
कृत्वा रक्षस्व मां विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम।
एतदुत्त्रं शङ्गराय वैष्णवं पञ्चरं महत्॥
पुरा रक्षार्थमीशान्या: कात्यायन्या वृषध्वज।
नाशयामास सा येन चामरं महिषासुरम्॥
दानवं रत्तुबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकान्।
एतज्जपन्नरो भकत्या शत्रूनू विजयते सदा॥
हे गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र लेकर पूर्व दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पद्मनाभ! आपको मेरा नमन है। आप अपनी कौमोदकी गदा धारणकर दक्षिण दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पुरुषोत्तम! आपको मेरा प्रणाम है। आप सौनन्द नामक हल लेकर पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पुण्डरीकाक्ष! आप शातन नामक मुसल हाथमें लेकर उत्तर दिशामें मेरी रक्षा करें। हे जगन्नाथ! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे हरे! आपको मेरा नमस्कार है।
आप खड़्ग, चर्म (ढाल) आदि अस्त्र-शस्त्र ग्रहणकर ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें। हे दैत्यविनाशक! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे यज्ञवराह (महावराह) ! आप पाञ्चजन्य नामक महाशङ्क और अनुघोष (अनुबोध) नामक पद्म ग्रहणकर अग्निकोणमें मेरी रक्षा करें।
हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी रक्षा करें। हे दिव्य-शरीर भगवान् नृसिंह! आप सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रके समान चमत्कृत खड़्गको धारणकर नैऋत्यकोणमें मेरी रक्षा करें। हे भगवान् हयग्रीव! आपको प्रणाम है। आप वैजयन्ती माला तथा कण्ठमें सुशोभित होनेवाले श्रीवत्स नामक आभूषणसे विभूषित होकर वायुकोणमें मेरी रक्षा करें। हे जनार्दन! आप वैनतेय गरुडपर आरूढ होकर अन्तरिक्षमें मेरी रक्षा करें। हे अजित! है अपराजित! आपको सदैव मेरा प्रणाम है। हे कूर्मराज! आपको नमस्कार है। हे महामीन ! आपको नमस्कार है। हे सत्यस्वरूप महाविष्णो ! आप अपनी बाहुको पञ्चर (रक्षक)-जैसा स्वीकार करके हाथ, सिर, अङ्गुली आदि समस्त अङ्ग - उपाङ्गसे युक्त मेरे शरीरकी रक्षा करें। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है।
हे वृषध्वज! मैंने प्राचीन कालमें सर्वप्रथम भगवती ईशानी कात्यायनीकी रक्षाके लिये इस विष्णुपञ्ञर नामक स्तोत्रको कहा था। इसी स्तोत्रके प्रभावसे उस कात्यायनीने स्वयंको अमर समझनेवाले महिषासुर, रक्तबीज और देवताओंके लिये कण्टक बने हुए अन्यान्य दानवोंका विनाश किया था। इस विष्णुपञ्चर नामक स्तुतिका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जप करता है, वह सदा अपने शत्नुओंपर विजय प्राप्त करनेमें सफल होता है।