119 - अगस्त्यार्घ्यव्रत - निरूपण

ब्रह्माजीने पुन: कहा - हे मुने! भुक्ति - मुक्ति प्रदान करनेवाले अगस्त्यार्घ्य व्रतको कहता हूँ। कन्याराशिपर सूर्यकी संक्रान्तिके तीन दिन पहलेसे काशपुष्पकी बनी हुई अगस्त्यकी मूर्तिका प्रदोष कालमें पूजन करके कुम्भमें अर्घ्य देना चाहिये। (रात्रि) जागरण और उपवास करके दधि - अक्षत और फल - पुष्पसे पूजा करके पाँच वर्णसे युक्त सोने - चाँदीसे समन्वित सप्तधान्यसे भरे पात्रकों दही और चन्दनसे रंजित कर

'अगस्त्य: खनमानः०'(ऋग्वेद )। इस मन्त्रसे अगस्त्यको अर्घ्य प्रदान करे।

इसके बाद इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करना चाहिये -

काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।

मित्रावरुणयो: पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥

अर्थात्‌ काशपुष्पके समान उज्वल, अग्नि और वायुसे उत्पन्न मित्रावरुणके पुत्र हे कुम्भयोनि अगस्त्यजी! आपको नमस्कार है।

शूद्र, स्त्री आदि इसी विधिसे अगस्त्यके लिये धान, फल और रस प्रदान करे तथा ब्राह्मणको स्वर्ण और दक्षिणासे युक्त घट प्रदान करे। सात ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार वर्षभर अगस्त्यार्घ्यव्रत करनेवाला सभी प्रकारके श्रेयप्राप्तिका अधिकारी हो जाता है।