210 - छन्‍द - विधान ( अर्द्धसमवृत्त लक्षण )

श्रीसूतजीने कहा - यदिं छन्‍दके विषमपादमें तीन सगण ( ।। ऽ), एक लघु (। ) और एक गुरु (ऽ)वर्ण - इस प्रकार ग्यारह अक्षर हों एवं समपादमें तीन भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे उपचित्रक कहते हैं। जिस छन्दके विषमपादमें तीन भगण (ऽ।।), दो गुरु (ऽऽ)हों और उसके समपादमें एक नगण (॥।), दो जगण (।ऽ।) और एक यगण (।ऽऽ) हो, उसे द्रुतमध्या नामक छन्द माना गया है। जिस छन्दके विषम - पादमें तीन सगण ( ॥ऽ), एक गुरु और समपादमें तीन भगण (ऽ।)एवं दो गुरु (ऽऽ)होते हैं, उसका नाम वेगवती है। जिस छन्दके विषमपादमें एक तगण (ऽऽ।), एक जगण ( ।ऽ। ), एक रगण (ऽ। ऽ), एक गुरु (ऽ)हो और समपादमें एक मगण (ऽऽऽ), एकसगण ( ॥ऽ), एक जगण ( ।ऽ ।) तथा दो गुरु (ऽऽ) हों, वह भद्रविराट्‌ नामक छन्‍द होता है। यदि विषमपादमें सगण ( ॥ऽ), जगण ( ऽ॥), सगण (॥ऽ), एक गुरु (ऽ)तथा समपादमें भगण (ऽ॥), रगण (ऽ।ऽ), नगण (॥।) और दो गुरु (ऽऽ) हों तो उस छन्दको केतुमती कहा जाता है। जिस छन्दके विषमपादमें दो तगण (ऽऽ। ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ)तथा समपादमें जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण ( । ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ)होते हैं, उसको आख्यानिकी कहते हैं। यदि विषमपादमें जगण ( ।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण(।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) तथा समपादमें दो तगण (ऽऽ।,ऽऽ।), एक जगण (।ऽ।) एवं दो गुरु (ऽऽ) हों तो उसे विपरीताख्यानक छन्द कहा जाता है। ऐसा पिङ्गल मुनिका अभिमत है।

जब छन्दके विषमपादमें दो नगण ( ॥।, ॥।), एक रगण (ऽ।ऽ), एक यगण (।ऽऽ) और समपादमें एक नगण ( ॥।) दो जगण ( ।ऽ।, ।ऽ।), एक रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) होता है तो उसे पुष्पिताग्रा कहते हैं। यदि विषमपादमें रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ), यगण (।ऽऽ) हो और समपादमें जगण ( ।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ),जगण (।ऽ।), रगण (ऽ।ऽ) तथा एक गुरु (ऽ) हो तो उस छन्दका नाम वाङ्मती है।