गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
202 - स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ
श्रीहरिने कहा - हे शिव! पुनर्नवा अथवा अपामार्ग नामक औषधिकी जड़का गुण अद्वितीय है। इसका यथाविधि प्रयोग करनेसे प्रसव - वेदनाका कष्ट दूर हो जाता है। भुइँकुम्हड़ाकी जड़ अथवा साठी चावलको पीसकर एक सप्ताहपर्यन्त दूधके साथ सेवन करनेसे स्त्रियोंके दूधकी वृद्धि होती है। हे रुद्र! इन्द्रवारुणी (इन्द्रायण) - की जड़का लेप करनेसे स्त्रियोंके स्तनोंकी पीड़ा विनष्ट हो जाती है। नीली, परवलकी जड़ तथा तिलको जलमें पीसकर घीके साथ तैयार किया गया लेप ज्वालागर्दभ नामक रोगका नाश करता है। पाढ़ाकी जड़को चावलके जलके साथ पीनेसे पाप - रोग विनष्ट हो जाता है। ऐसे रोगका विनाश कुष्ठ नामक औषधिके पीनेसे भी सम्भव है। हे शिव! बासी जलमें मधु मिलाकर पीनेसे वह पाप - रोगको दूर कर देता है। गोघृत और लाक्षारसको समभागमें लेकर दूधके साथ उसे पीनेसे प्रदररोग दूर हो जाता है। हे हर! द्विजयष्टी (ब्रह्मदण्डी), त्रिकटु (सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली) - का चूर्ण तिलके काढ़ेमें मिलाकर पीनेसे स्त्रियोंका रक्तगुल्म रोग दूर हो जाता है। हे महेश! लाल कमलका कन्द, तिल तथा शर्कराका औषधिक योग, स्त्रियोंमें गर्भधारणकी क्षमता उत्पन्न कर देता है। शर्कराके साथ इन औषधियोंको पीनेसे स्त्रियोंका गर्भपात रुक जाता है तथा शीतल जलके साथ सेवन करनेसे रक्तस्राव भी बंद हो जाता है। हे रुद्र! शरपोशङ्खाकी जड़का क्वाथ और काँजी, हींग तथा सेंधानमक मिलाकर पीनेसे स्त्रियोंको शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। बिजौरा नीबूकी जड़को कटिप्रदेशमें बाँधनेसे भी प्रसव यथाशीघ्र हो जाता है। अपामार्गकी जड़ सिरपर धारण करनेपर स्त्रीको गर्भजनित पीड़ा नहीं होती।
हे हर! जिस बालकके मस्तकपर गोरोचनका तिलक रहता है और जो बालक शर्करा तथा कुष्ठ नामक औषधिका पान करता है वह विष, भूत, ग्रह तथा व्याधिजनित विकारोंसे दूर रहता है। हे रुद्र! शंखनाभि (सुगंधित द्रव्यविशेष), वच, कुष्ठ और लोहा (लोहेकी ताबीज या कठुला) बच्चेको सदैव धारण कराना चाहिये। इससे उपसर्गजन्य विपदाओंसे बच्चोंकी रक्षा होती है।
मधुके सहित पलाश, आँवला और विडङ्गका चूर्ण तथा गोघृतका पान करनेसे प्राणी महामति (कुशाग्रबुद्धिवाला) बन जाता है। हे महादेव! एक मासतक इस औषधिका सेवन करनेसे मनुष्य वृद्धावस्थाजन्य मृत्युके भयसे रहित हो जाता है। है रुद्र! पलाशबीज, तिल, मधु और घृत समान भागमें लेकर एक सप्ताहतक सेवन करनेसे वृद्धावस्था दूर हो जाती है। आँवलेका चूर्ण, मधु, तेल (तिलका) तथा गोघृतके साथ एक मासपर्यन्त सेवन करनेसे मनुष्य युवा हो उठता है और विद्वान् बन जाता है। हे शिव! आँवलेका चूर्ण मधु अथवा जलके साथ प्रातःकाल सेवन करनेपर नासिकाकी शक्ति बढ़ जाती है। जो मनुष्य घी और मधुके साथ कुष्ठचूर्णका सेवन करता है, वह सुन्दर गन्धसे समन्वित देहवाला हो जाता है और एक हजार वर्षतक जीवित रहता है।