144 - हरिवंशवर्णन (श्रीकृष्णकथा)

ब्रह्माजीने कहा - अब मैं हरिवंशका वर्णन करूँगा, जो भगवान्‌ कृष्णके माहात्म्यसे परिपूर्ण होनेके कारण श्रेष्ठतम है।

पृथिवीपर धर्म आदिकी रक्षा और अधर्मादिके विनाशके लिये वसुदेव तथा देवकीसे कृष्ण और बलरामका प्रादुर्भाव हुआ। जन्मके कुछ ही दिन बाद कृष्णने पूतनाके स्तनोंको दृढ़तापूर्वक पीकर उसे मृत्युके पास पहुँचा दिया था। तदनन्तर शकट(छकड़े) - को बालक्रीडामें उलटकर सभीको विस्मित करते हुए इन्होंने यमलार्जुन - उद्धार, कालियनाग - दमन, धेनुकासुर - वध, गोवर्धन - धारण आदि अनेक लीलाएँ कीं और इन्द्रद्वारा पूजित होकर पृथिवीको भारसे विमुक्त किया तथा अर्जुनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की।

इनके द्वारा अरिष्टासुर आदि अनेक बलवान्‌ शत्रु मारे गये। इन्होंने केशी नामक दैत्यका वध किया तथा गोपोंको संतुष्ट किया। उसके बाद चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल इनके द्वारा ही पराजित हुए। ऊँचे मंचपर अवस्थित कंसको वहाँसे नीचे पटककर इन्होंने ही मारा था।

श्रीकृष्णकी रुक्मिणी, सत्यभामा आदि आठ प्रधान पत्नियाँ थीं। इनके अतिरिक्त महात्मा श्रीकृष्णकी सोलह हजार अन्य स्त्रियाँ थीं। उन स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र - पौत्रोंकी संख्या सैकड़ों - हजारोंमें थी। रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्न उत्पन्न हुए, जिन्होंने शम्बरासुरका वध किया था। इनके पुत्र अनिरुद्ध हुए, जो बाणासुरकी पुत्री उषाके पति थे। अनिरुद्धके विवाहमें कृष्ण और शङ्करका महाभयंकर युद्ध हुआ और इसी युद्धमें हजार भुजाओंवाले बाणासुरकी दो भुजाओंको छोड़कर शेष सभी भुजाएँ कृष्णके द्वारा काट डाली गयीं।

नरकासुरका वध इन्हीं महात्मा श्रीकृष्णने किया था। नन्दन वनसे बलात् पारिजात - वृक्ष सत्यभामाके लिये ये ही उखाड़कर लाये थे। बल नामक दैत्य, शिशुपाल नामक राजा तथा द्विविद नामक बन्दरका वध इन्हींके द्वारा हुआ था।

अनिरुद्धसे वज्र नामका पुत्र हुआ। कृष्णके स्वर्गारोहणके पश्चात्‌ वही इस वंशका राजा बना था। सान्दीपनि नामक मुनि कृष्णके गुरु थे। कृष्णने ही गुरु सान्दीपनिकी पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषाको पूर्ण किया था। मथुरामें उग्रसेन और देवताओंकी रक्षा इन्होंने ही की थी।