203 - गो एवं अशव -चिकित्सा

श्रीहरिने कहा - हे शिव! जो गौ अपने बछड़ेसे द्वेष करती है, उसे नमकसे युक्त उसीका दूध पिला देना चाहिये। ऐसा करनेसे वह अपने बछड़ेसे प्रेम करने लगेगी। कुत्तेकी हड्डीको भैंस और गायके गलेमें बाँधनेसे उनके शरीरमें पड़े हुए कीड़े गिर जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है। घुँघुचीकी जड़को खिलानेसे भी गायोंके शरीरमें पड़े हुए कीड़े विनष्ट हो जाते हैं। हे शिव! वरुणफलके रसको हाथसे मथकर उसे घावमें भरनेसे उसके अंदर पड़े हुए चार पैरवाले तथा दो पैरवाले कीड़े नष्ट हो जाते हैं। हे रुद्र! जया नामक औषधिको घावमें भरनेसे वह सूख जाता है। हाथीका मूत्र पिलानेसे गाय और भैंसोंमें फलनेवाला उपसर्ग रोग (दैवी आपदाजन्य महामारी आदि) नष्ट हो जाता है। मट्ठेमें मसूर और साठी चावलको घिसकर पिलानेसे भी लाभ होता है।

गाय और भैंसके दूधमें तुलनात्मक दृष्टिसे गायका दूध ही पुरुषके लिये विशेष हितकारी होता है। हे शिव! शरपोंखाके पत्तेको नमकके साथ खिलानेसे घोड़े तथा हाथियोंका वारिस्फोट नामक रोग नष्ट हो जाता है। हे हर! घृतकुमारीके पत्तेका नमकके साथ सेवन करानेसे घोड़े आदिकी खुजली दूर हो जाती है।