गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
171 - नाडीव्रण, कुष्ठ आदि रोगोंकी चिकित्सा
धन्वन्तरिजीने कहा - हे सुश्रुत! अब आप नाडीव्रण आदि दोषोंकी चिकित्साका श्रवण करें।
नाडी (नाड़ी) - को शस्त्रसे भलीभाँति काटकर व्रण - चिकित्साके समान उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। गुग्गुल, त्रिफला तथा त्रिकटुको समान भागमें लेकर सिद्ध किये गये घृतसे नाड़ीमें हुए विकृत व्रण, शूल और भगन्दर नामक रोगपर विजय प्राप्त की जा सकती है। निर्गुण्डीके रससे सिद्ध तेल नाड़ी - दोष तथा व्रणको दूर करता है। पामा नामक रोगके उपभेदोंमें यह औषधि पान, अञ्जन और नस्य - विधिसे प्रयोगमें लानेपर गुणकारी होती है। तीन भाग गुग्गुल, पाँच भाग त्रिफला तथा
एक भाग काली तुलसीकी पत्तीसे बनायी गयी गुटिकाएँ शोथ, गुल्म, अर्श और भगन्दर-रोगसे ग्रसित रोगियोंके लिये हितकारिणी होती हैं।
उपदंश - रोगमें शिश्नके मध्यमें रक्तकी शुद्धि-हेतु शिरावेध करे तथा शिश्न नष्ट न होवे, अतः उसे पकनेसे प्रयत्नपूर्वक रक्षा करे। गुग्गुल, खदिर, परवल, नीमका फल और गिलोयका क्वाथ पीनेसे उपदंश - दोष समाप्त हो जाता है। एक कड़ाहेमें त्रिफलाको जलाकर स्याही - जैसी राख बनाकर मधुसे प्रयोग करनेपर लाभ होता है। त्रिफला, चिरायता, नीम, कंजा तथा खदिर आदिसे बने कल्क अथवा क्वाथके द्वारा सिद्ध किया गया घृतपाक उपदंशको दूर करता है।
प्राणीको [भग्नसे] हताश हुआ जानकर सबसे पहले उसे शीतल जलसे सिंचित करे। तदनन्तर पाकका लेपन तथा कुशकी रस्सीसे भग्न - भागपर बन्धन लगाये। ऐसे भग्न - रोगीको उड़द, मांस, मटरकी दाल, उगा हुआ अन्न, घृत, दूध तथा सूप देना चाहिये।
रसोन (लहसुन), मधु, नासा (अड़ूसा) तथा घुतका कल्क बनाकर उसको स्थानसे च्युत अथवा टूटी हड्डियोंके जोड़पर लगानेसे बहुत ही शीघ्र सफलता प्राप्त होती है। त्रिफला, त्रिकटु (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च) - को समान भागमें पीसकर उनके साथ बराबर मात्रामें मिलाया गया गुग्गुल टूटे हुए हड्डीके संधि - स्थानको भी जोड़ देता है।
सभी प्रकारके कुष्ठरोगोंमें रोगीके लिये वमन, रेचन तथा रक्तमोक्षणकी(सु० शा० अ० 8) क्रिया लाभकारी है। वच, अड़ूसा, परवल, नीम तथा बहेड़ेकी छालका क्वाथ मधुके साथ पीनेसे वातरोग नष्ट हो जाता है। इस रोगमें निसोत, दन्तीफल (एरण्ड - बीज) तथा त्रिफलाके योगसे विरिचन - क्रिया भी करनी चाहिये।
काली मिर्चके साथ मनःशिल (मैनसिल) - का सिद्ध तेल कुष्ठरोगका विनाशक है। सभी प्रकारके कुष्ठरोगोंमें इस तेलका लेप किया जा सकता है। इस रोगमें पथ्याहार शिव (हरीतकी), पञ्चाम्ल, गुड़ और भात है। कंजा - एल (सुगन्धित बालुका नामक लता), गजपिप्पली तथा कुष्ठ (कूट) - के रसको गोमूत्रके साथ कुष्ठरोगमें प्रलेप करनेसे लाभ होता है। तेलमें करवीर (कनेर) - के मूलका पाकसिद्ध उबटन भी कुष्ठनाशक है। हल्दी, चन्दन, रास्ना, गुडूची, एडगज (तगर), अमलतास और करञ्जका लेप कुष्ठ विनाशक श्रेष्ठम औषधि है। मैनसिल, विडंग, वागुजी (वाकुची), सरसों तथा कंजाको गोमूत्रमें पीसकर तैयार किया गया लेप सूर्यदेवके समान कुष्ठरोगका विनाशी है।
विडंग, एडगज, वच, कुटकी, निशा(दारुहल्दी), समुद्रफेन और सरसोंको गोमूत्र तथा अम्लमें पीसकर तैयार किया गया यह लेप दद्रु नामक कुष्ठरोगको विनष्ट करता है। प्रपुन्नाड (चकवड़) - का बीज, आँवला, सर्जरस (विरोजा या लाख), स्नुही (सेहुँड़) और सौवीर (बेर) - का पिसा हुआ लेप सभी प्रकारके दद्रुरोगोंको दूर करनेवाला श्रेष्ठ औषध है। कांजीके साथ अमलतासकी पत्तियोंका तैयार लेप दद्रु, किट्टिम तथा सिध्म (सेहुवाँ) नामक कुष्ठोंका विनाश करता है। वकुचीका उष्ण क्वाथ सेवन करके दूध पीनेसे भी कुष्ठरोगपर विजय प्राप्त की जा सकती है। तिल, घृत, त्रिफला, क्षौद्र, व्योष (त्रिकटु), भिलावा तथा शर्करा - ये सभी सात ओषधियाँ समान भागमें मिलाकर सेवन करनेसे पुरुषत्वमें वृद्धि होती है। ये पवित्र और कुष्ठटरोग - नाशक हैं।
मधुके सहित विडंग, त्रिफला और काली तुलसीके चूर्णका अवलेह कुष्ठ, कृमि, मेह, नाडीव्रण एवं भगन्दर नामक रोगोंका विनाश करता है। जो मनुष्य कुष्ठरोगी हो, उसे हरीतकी, नीम, कुटकी, आँवला तथा दारुहल्दीका सेवन करना चाहिये। औषधि लेनेके बाद प्राय: एक मासपर्यन्त ऐसा व्यक्ति शीघ्र कुष्ठरोगसे विमुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। उष्ण मक्खन, कुम्भ (गुग्गुल), मूलक (अदरक), खदिर(कत्था), अक्ष(बहेड़ा),आँवला तथा चम्पा नामक योगसे भी कुष्ठका विनाश होता है। यह औषधियोंका एक रसायन है।
आँवला, खदिर और वकुचीके क्वाथका पान करके मनुष्य शंख एवं चन्द्रमाके समान श्वेत श्व्रित्ररोगको शीघ्र ही नष्ट कर देता है, इसमें संदेह नहीं हैं। भल्लातक (भिलावें) - के सिद्ध तेलको एक मासपर्यन्त पानकर प्राणी इस कुष्ठ - रोगपर विजय प्राप्त कर लेता है। जो खदिरमिश्रित जलका यथाविधि सेवन करता है, उसे कुष्ठरोगपर विजय प्राप्त हो जाती है। मलपू अर्थात् कटूमर नामक वृक्षकी छालसे बने क्वाथके द्वारा छौंके गये सोमराजी (वकुची) - के फलोंका चूर्ण प्रतिदिन एक कर्ष मात्र बहेड़े और अर्जुन नामक वृक्षसे बने क्वाथके साथ लेना चाहिये। किंतु नमक खाना इस कालमें निषिद्ध है। इस औषधिके उपचारसे श्वित्ररोग विनष्ट हो जाता है। रोगीको इस औषधिका पान करते हुए शरीरपर स्थित सफेद चकत्तोंपर अपराजिता(शेफालिका)- की लताका लेप लगाना चाहिये। अड़ूसा, गुड़ूची, त्रिफला, परवल, कंजा, नीम, अशन तथा कृष्ण वर्णकी वेत्रलताका क्वाथ एवं कल्क - रूपमें पकाकर उससे जो घृतपाक सिद्ध होता है, उसको ‘वज्रक घृत’ कहते हैं। इसके सेवनसे रोगी रोग - विमुक्त होकर सौ वर्षोकी आयु प्राप्त करता है।
दूर्वाके रसमें उससे चौगुना तेल पकाकर औषधिरूपमें उसको शरीरमें लगाना चाहिये। इसके मालिशसे कच्छु, विचर्चिका(विचर्चिका (एक्जिमा)) और पामा नामक कुष्टरोग विनष्ट हो जाते हैं। द्रुम (पारिजात) - की छाल, मन्दार, कुष्ठ, लवण, गोमूत्र, गम्भारी(श्रीपर्णी)तथा चित्रक (एरण्ड)नामक औषधियोंका सिद्ध तेल कुष्ठरोगके व्रण - विकारोंको विनष्ट कर देता है।
आँवला, निमकौरी, गोमूत्र, अड़ुसा, गुडूची, पित्तपापड़ा, चिरायता, नीम, भृंगराज, त्रिफला, कुलथी और मधुका क्वाथ अम्लपित्त - रोगका विनाशक है। त्रिफला, पटोल और कटुकीका क्वाथ शर्करा तथा जेठी मधुके साथ पान करनेपर ज्वर, छर्दि एवं अम्ल - पित्तजनित अन्य विकार नष्ट हो जाते हैं। वासाघृत, तिक्तघृत और पिप्पलीघृतका प्रयोग अम्लपित्त - विकारमें करना चाहिये। गुड़ और कुम्हड़ा खानेसे भी लाभ होता है।
मधुके साथ पिप्पली अम्लपित्तका विनाश करती है। हरीतकी, पिप्पली तथा गुड़का बना हुआ मोदक श्लेष्म एवं अग्निमन्दताके दोषको दूर करता है। जीरा और धनियाको समान भागमें पीसकर एक प्रस्थ घृतमें उन दोनोंका विपाक बनाना चाहिये। यह पाक कफ, पित्त, अरुचि, मन्दाग्नि तथा वमन नामक दोषोंको दूर करता है।
पिप्पली, गुडूची, चिरायता, अड़ूसा, कटुकी, पित्तपापड़ा, खैर और लहसुनसे बना क्वाथ विस्फोट (फोड़ा - फुंसी) तथा ज्वररोगका विनाशक है। निसोतके साथ त्रिफलाके रस - मिश्रित घृतका अनुपान आँतोंकी सफाई और विसर्प नामक रोगकी शान्ति कर देता है। खदिर, त्रिफला(हरड़, आँवला, बहेड़ा), कटुकी, परवल, गुडूची और अड़ूसाके द्वारा बना क्वाथ ‘अष्टक क्वाथ’के नामसे प्रसिद्ध है। इसके सेवनसे रोमान्तिक तथा मसूरिका रोग दूर हो जाते हैं।
लहसुनके चूर्णको घिसनेसे कुष्ठ, विसर्प, फोड़ा तथा खुजली आदि चर्मरोगोंका विनाश होता है। इसके द्वारा घिसनेसे शरीरका मस्सा भी नष्ट हो जाता है। चर्मकील, पुराने एवं बढ़े हुए मस्से, तिल तथा अनुपयुक्त बालोंको शस्त्रसे काटकर निकालनेके पश्चात् क्षार अथवा अग्निके द्वारा उक्त रोगके शरीरस्थ भागको दग्ध कर देनेका भी विधान है।
परवल और नीलका लेप जालगर्दभ - रोगको विनष्ट करता है। गुञ्जाफल तथा भृंगराजके रससे सिद्ध तेलके द्वारा कण्ठ - विकार, खुजली, अत्यन्त कष्टदायक कुष्ठ और वातरोगोंका विनाश होता है। धत्तूर या आमकी गुठली, त्रिफला, नील तथा भृंगराज - इन औषधियोंके योगसे सिद्ध कांजीयुक्त लौहचूर्ण प्राणियोंके पकनेवाले श्वेत बालोंको काला करनेमें समर्थ है। क्षीरी (खिरनी) और शार्कपर्ण (लोध्र) - का रस दो प्रस्थ तथा मधुका (मुलेठी) एक पल लेकर उसमें एक कुडव अर्थात् बारह पसर सिद्ध किया गया तेलका नस्य भी बालोंको पकने नहीं देता।
मुखमें रोग होनेपर त्रिफला - चूर्णका गण्डूष अर्थात् कुल्ला करना चाहिये। घरका धुआँ, घृत या तिलादिके तेलका दीपक जलानेसे एकत्र धुएँमें यवक्षार, पाढ़ा, व्योष (सोंठ, पिप्पली तथा काली मिर्च) - के रसको मिलाकर अज्ञन बनानेका विधान है। इस अञ्जनको नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रदोष नहीं होता। यदि तेजोद, त्रिफला, लोध्र और चित्ताका चूर्ण मधुके साथ मुँहमें रखा जाय तो कण्ठ, दाँत और मुँहका रोग दूर हो जाता है। पटोल, नीम, जामुन, मालती तथा आमके नवीन पल्लवोंका क्वाथ मुख धोनेकी श्रेष्ठटम औषधि है।
लहसुन, अदरक, सहिजन, भूंगराज, मूली, रुदन्ती (महामांसी) - का गुनगुना रस कर्ण - रोगको दूर करनेका उत्तम उपचार है। कानमें अत्यन्त तीक्र पीड़ा, शब्द और मैल निकलनेपर सेंधा नमकके सहित वस्त अर्थात् बकरेका मूत्र गरम करके उसमें डालना चाहिये। जातिपत्र अर्थात् जावित्रीके रससे सिद्ध तेलपाक पूतिक (दुर्गन्धयुक्त) कानमें डालना चाहिये। सोंठके चूर्णसे सिद्ध गुनगुना सरसोंका तेल कानमें उठनेवाले शूलका विनाशक है।
पञ्चमूलसिद्ध दूध, चित्ता और हरीतकी, घृत तथा गुड़ एवं षडङ्ग जूसका योग पीनस - रोगकी शान्तिके लिये है। इस रोगमें इन योगोंमेंसे किसी एक योगसिद्ध औषधिका प्रयोग करना चाहिये।
नेत्र - दोष, कुक्षि - विकार, प्रतिश्याय (जुकाम या सर्दी), व्रण तथा ज्वर होनेपर पाँच दिनोंतक लंघन करनेका विधान है। ऐसा करनेसे ये पाँचों रोग शान्त हो जाते हैं। आँवलेका रस नेत्रमें डालनेसे विकार दूर हो जाता है अथवा मधु और सेंधा नमकके सहित शोभाञ्चन नामक सहिजन तथा दारुहल्दीका अञ्जन लगानेसे भी लाभ होता है। हल्दी, देवदारु, सेंधा नमक, हरीतकी तथा गैरिक(गैरिक (गेरु))पीसकर उसका लेप नेत्रोंके बाह्य भागमें लगाना चाहिये। यह नेत्ररोग - विनाशक है। घृतमें भुनी हरीतकी, त्रिफला दूधके साथ लेप करनेके पश्चात् गुनगुनी एवं पिसी सोंठ, नीमकी पत्ती, थोड़ा - सा सेंधा नमक, दूध और त्रिफलाचूर्णको नेत्रोंपर लगाना चाहिये। ऐसा करनेसे नेत्रोंकी सूजन, खुजलाहट और पीड़ा समाप्त हो जाती है। हरीतकी, बहेड़ा तथा गुडूची नामक औषधियोंको क्रमश: - मात्रामें एक भाग, दो भाग और चार भाग लेकर मधु एवं घृतके साथ सिद्ध किया गया लेह या क्वाथ सभी प्रकारके नेत्र - रोगोंका विनाशक है।
चन्दन, त्रिफला, सुपारी तथा पलाशकी जड़को जलमें पीसकर बनायी गयी बत्तीका प्रयोग आँखोंके समस्त तिमिर - रोगोंको दूर करता है। दहीके साथ अत्यधिक घिसी गयी काली मिर्चका अञ्जन रतौंधी नामक रोगको दूर करता है। त्रिफलाके क्वाथ एवं कल्कसे सिद्ध घृतपाकको गुनगुने दूधके साथ सायंकाल पान करनेसे अन्धदर्शन तथा रतौंधीका विकार यथाशीघ्र विनष्ट हो जाता है। पिप्पली, त्रिफला, द्राक्षा, लौहचूर्ण और सेंधा नमकको भुगराजके रसमें घिसकर बनाया गया घुटिकाञ्जन अन्धता, त्रिदोषजन्य तिमिरता, धुँधलाहट तथा अन्य सभी प्रकारके नेत्र - सम्बन्धित रोगोंका विनाशक है।
त्रिकटु, त्रिफला, सेंधा नमक, मैनसिल, रुचक,( रुचक (बिजौरा नीबू)) शंखनाभि(कचूर), जातीपुष्प (मालती), नीम, रसाञ्जन(रसौत) और भृंगराजको घृत, मधु तथा दुग्धभें पीसकर बनायी गयी वटी समस्त नेत्रविकारोंकी नाशकारिणी औषधि है।
एरण्डकी जड़को जलाकर कांजीके साथ सिरमें लेप करने अथवा मुचुकुन्द - पुष्पके प्रयोगसे शीघ्र ही सिर - पीड़ा दूर हो जाती है।
शतमूली, (शतमूली (शतावरी)) एरण्डमूल, चक्रा (कुटकी) तथा व्याप्री (कण्टकारी) - को एक - एक पल एकत्र करके उनसे सिद्ध क्वाथ, तेलपाकका नस्य वात और श्लेष्मजन्य तिमिर तथा ऊर्ध्वरोगका विनाश करता है अथवा नमक, गुड़ और सोंठ या पिप्पली एवं सेंधा नमकका योग भुजस्तम्भ आदि सभी शरीरके ऊर्ध्वभागवाले रोगोंमें लाभकारी होता है। सूर्यावर्त - रोगमें नस्यकर्मका उपचार प्रशस्त माना गया है। ऐसेमें घृत एवं सेंधा नमकसे युक्त दशमूलके क्वाथका नस्य लेना चाहिये। यह अज्भभेद, सूर्यावर्त तथा शिरोव्याधिके दुःखोंको दूर करता है।
वातरक्त - दोषसे पीड़ित स्त्रीको दही एवं मधुके साथ काला नमक, जीरा, महुआ और नीलकमल पीसकर पान करना चाहिये । पित्त - विकार होनेपर अड़ूसा अथवा गुडूचीका रस लाभकारी है। मधुके साथ जलमें पकाये गये आँवलेके बीजोंका कल्क, अड़ूसा तथा श्वेत दूर्वाका रस अथवा आँवलेके साथ मधु और कपासकी जड़का रस चावलके धोवनमें पीनेसे पाण्डु एवं प्रदर - रोग शान्त हो जाता है।
तण्डुलीयक मूल अर्थात् चौराई तथा रसौतको पीसकर मधु एवं चावलके धोवनमें पीनेसे सभी प्रकारका रक्तप्रदर - रोग विनष्ट हो जाता है। चावलके जलके साथ पान किया गया कुशका मूल भी रक्तप्रदर - रोगका विनाशक है।