गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
32 - पञ्जतत्त्वार्चन - विधि
महेश्वरने कहा - हे शङ्ख - चक्र - गदाधर! आप पञ्चतत्त्वोंकी उस पूजा - विधिको मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेनेमात्रसे ही मनुष्य परमपदको प्राप्त कर लेता है।
श्रीहरिने कहा - हे सुव्रत शिव! मैं आपसे पञ्चतत्त्व - पूजा - विधिको कह रहा हूँ, यह दिव्य, मङ्गल स्वरूप, कल्याणकारी, रहस्यपूर्ण, श्रेष्ठ तथा अभीष्टोंकी सिद्धि करनेवाली है। हे महादेव! ऐसे उस परम पवित्र कलिदोष - विनाशक पूजन -विधिका आप श्रवण करें।
हे सदाशिव! एक ही परमात्मा जो वासुदेव श्रीहरि हैं, वे ही अविनाशी, शान्त, सनातन, सत् - स्वरूप हैं। वे ध्रुव (नित्य, अचल), शुद्ध, सर्वव्याप्त तथा निरञ्चन हैं। वे ही विष्णुदेव अपनी मायाके प्रभावसे पाँच प्रकारसे अवस्थित हैं। वे जगत्का
कल्याण करनेवाले हैं। वे ही अद्वितीय विष्णु वासुदेव, संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण स्वरूपसे पाँच रूपों (तत्त्वों) - में स्थित हैं। हे वृषध्वज! जनार्दन विष्णुके उक्त पञ्चरूपोंके वाचक मन्त्र इस प्रकार हैं-
ॐ अं वासुदेवाय नमः, ॐ आं संकर्षणाय नमः, ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः,
ॐ अ: अनिरुद्धाय नमः, ॐ ॐ नारायणाय नमः।
-ये पाँच मन्त्र उक्त पाँच देवताओंके वाचक हैं, जो सभी पातक, महापातकोंके विनाशक, पुण्यजनक तथा समस्त रोगोंको दूर करनेवाले हैं। अब मैं आपसे मङ्गलमय पञ्चतत्त्वार्चन - विधिको कह रहा हूँ। हे शिव! उसको जिस विधिसे और जिन मन्त्रोंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये, उसको आप श्रवण करें।
- इन पाँच देवोंकी पूजामें सर्वप्रथम स्नान करके विधिवत् संध्या करनी चाहिये। तदनन्तर हाथ - पैर धोकर पूजा - गृहमें प्रवेश करके विद्वान् साधकको चाहिये कि वह आचमन करके मनोऽनुकूल आसन लगाकर बैठ जाय और - 'अं क्षौं रम्'- इन मन्त्रोंसे शोषणादि क्रिया करे।
वे वासुदेव कृष्ण जगत्के स्वामी, पीतवर्णके कौशेय (रेशमी) वस्त्रोंसे विभूषित, सहस्त्रों सूर्यकी किरणोंके समान तेज:स्वरूप तथा देदीप्यमान मकराकृति - कुण्डलोंसे सुशोभित हैं, ऐसे उन भगवान् कृष्णका अपने हृदय - कमलमें ध्यान करना चाहिये।
तदनन्तर भगवान् संकर्षणका ध्यान करे। उसके बाद यथाक्रम प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा श्रीमन्नारायणके स्वरूपका ध्यान करके उन देवाधिदेवसे प्रादुर्भूत इन्द्रादि देवोंका ध्यान करके मूल मन्त्रके द्वारा दोनों हाथोंसे व्यापक रूपमें करन्यास करे, तत्पश्चात् अङ्गन्यासके मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे। हे महादेव! सुव्रत! उन न्यास एवं पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं -
'ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ईं शिरसे नमः, ॐ ऊं शिखायै नमः,
ॐ ऐं कवचाय नमः, ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ अ: अस्त्राय फट्,
ॐ समस्तपरिवारायाच्युताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः,
ॐ आधारशक्तयै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः,
ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः,
ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः,
ॐ अं अर्कमण्डलाय नम:, ॐ सों सोममण्डलाय नमः,
ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः,
ॐ वं वासुदेवाय परब्रह्यणे शिवाय तेजोरूपाय व्यापिने सर्वदेवाधिदेवाय नमः,
ॐ पाञ्चजन्याय नमः, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ पद्माय नमः,
ॐ श्रियै नमः, ॐ ह्रियै नमः, ॐ पुष्टयै नमः, ॐ गीत्यै नमः, ॐ शकत्यै नमः,
ॐ प्रीत्यै नमः, ॐ इन्द्राय नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ यमाय नमः,
ॐ निर्ऋतये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नमः, ॐ सोमाय नमः,
ॐ ईशानाय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ विष्वक्सेनाय नमः।'
तत्पशचात् 'ॐ पद्माय नमः' ऐसा कहकर स्वस्तिक और सर्वतोभद्रादि मण्डलोंका निर्माण करके उस मण्डलमें इन्हीं मन्त्रोंसे देवोंका पूजन करना चाहिये।
मूल मन्त्रसे पाद्य आदिका निवेदन करके स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य प्रदान करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे शङ्कर! उसके बाद यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर उसे प्रभुको समर्पित कर दे। तदनन्तर भगवान् वासुदेवका स्मरणकर इस स्तोत्रका पाठ करे-
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च॥
प्रद्युम्नायादिदेवायानिरुद्धाय नमो नमः।
नमो नारायणायैव नराणां पतये नमः॥
नरपूज्याय कीत्र्याय स्तुत्याय वरदाय च।
अनादिनिधनायैव पुराणाय नमो नमः॥
सृष्टिसंहारकरर्त्रे च ब्रह्मण: पतये नमः।
नमो वै वेदवेद्याय शङ्खचक्रधराय च॥
कलिकल्मषहर्त्रे च सुरेशाय नमो नमः।
संसारवृक्षच्छेत्रे च मायाभेत्रे नमो नमः॥
बहुरूपाय तीर्थाय त्रिगुणायागुणाय च।
ब्रह्मविष्णवीशरूपाय मोक्षदाय नमो नमः॥
मोक्षद्वाराय धर्माय निर्वाणाय नमो नमः।
सर्वकामप्रदायैव परब्रह्मस्वरूपिणे॥
संसारसागरे घोरे निमग्नं मां समुद्धर।
त्वदन्यो नास्ति देवेश नास्ति त्राता जगत्मभो॥
त्वामेव सर्वगं विष्णुं गतोऽहं शरणं ततः।
ज्ञानदीपप्रदानेन तमोमुक्तं प्रकाशय॥
'हे वासुदेव! हे संकर्षण (बलराम)! आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न, आदिदेव, अनिरुद्ध! आपके लिये नमस्कार है। हे नारायण! नराधिपति! आपको नमन है, कीर्तन करने योग्य, मनुष्योंसे पूजनीय, स्तुति करने योग्य, वर देनेवाले, आदि तथा अन्तसे रहित सनातन प्रभुको बारम्बार नमस्कार है। सृष्टि और संहार- कर्ता, ब्रह्माके भी स्वामी तथा शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नमस्कार है।'
कलिकालके दोषोंको नष्ट करनेवाले, देवोंके ईश! आपको बारम्बार प्रणाम है। सम्पूर्ण जगत् - रूपी मूल वृक्षका छेदन करनेवाले, मायाका भेदन करनेवाले, बहुतसे रूपोंको धारण करनेवाले, तीर्थस्वरूप, सत्त्व, रजस् तथा तमोरूप एवं वस्तुतः निर्गुण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव - इन तीन रूपोंमें अवस्थित रहनेवाले मोक्षदायक भगवान् विष्णु परमेश्वरको नमस्कार है। मोक्षके द्वारभूत, धर्मस्वरूप, निर्वाणरूप, समस्त अभीष्टोंको प्रदान करनेवाले परब्रह्म स्वरूप आपके लिये बार - बार नमस्कार है। इस गहन संसार सागरमें मैं डूब रहा हूँ, आप मेरा उद्धार करें। हे देवदेवेश्वर! हे जगत्के स्वामी! आपके अतिरिक्त मेरा कोई भी रक्षक नहीं है। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हे भगवान् विष्णु! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे भगवन्! ज्ञानरूपी दीपकको प्रज्वलितकर मेरे (अज्ञानरूपी) अन्धकारको दूर करके मुझे प्रकाशित कर दें।
इस प्रकार समस्त कष्टोंको दूर करनेवाले देवेश भगवान् वासुदेवकी स्तुति करके हे नील लोहित शिव! अन्य वैदिक स्तोत्र-पाठोंसे भी स्तुति करके पञ्चतत्त्वोंसे युक्त उन भगवान् विष्णुका अपने हृदयमें ध्यान करे। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार हे शङ्कर! सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली वासुदेवकी श्रेष्ठ पूजा कही गयी। इस पूजाके करनेमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
हे रुद्र! जो व्यक्ति इस पञ्चतत्त्वार्चनको पढ़ता है, सुनता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह विष्णु लोकको प्राप्त होता है।