गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
43 - विष्णुके पवित्रारोपणकी विधि
श्रीहरिने कहा - हे वृषभध्वज! अब मैं आपसे विष्णुके पवित्रारोपणका वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष दोनोंको देनेवाला है। प्राचीन समयमें हो रहे देवासुर - संग्राममें [अपनी विजय न होते देखकर] ब्रह्मादि देवगण विष्णुकी शरणमें गये। उन सबकी प्रार्थना सुन करके विष्णुने विजय - प्राप्तिकि लिये उन्हें अपने गलेका हार, पवित्र नामक ग्रैवेयक तथा एक ध्वज प्रदान किया और कहा कि इन्हें देखते ही दानव नष्ट हो जायँगे। तभीसे उन पवित्रकोंकी पूजा आरम्भ हुई।
हे हर ! प्रतिपदासे लेकर पौर्णमासीतक जिस देवताकी जो तिथि कही गयी है, उसके अनुसार ही उस तिथिमें उन देवताओंका पवित्रारोपण करना चाहिये। हे शिव! शुक्ल - पक्ष हो अथवा कृष्णपक्ष, द्वादशी तिथिमें विष्णुके लिये पवित्रारेपणका विधान है। व्यतीपातयोग,उत्तरायण, दक्षिणायन, चन्द्र तथा सूर्यग्रहण, विवाहादि मड्गल एवं वृद्धि - कार्यों तथा गुरुजनके आगमन इत्यादि अवसरोंपर यह पूजा करनी चाहिये। पवित्रकके उद्देश्यसे भी नित्य पूजन हो सकता है; किंतु वर्षाकालमें इसका पूजन आवश्यक है।
हे रुद्र! इन पवित्रकोंका निर्माण वर्णानुसार होना चाहिये, जैसे - ब्राह्मणोंका पवित्रक कौशेय (विशेष कीड़ेके कोशसे बननेवाला वस्त्र (रेशमी वस्त्र)।)), कपास, क्षौम (तीसी, केलेकी छाल या अन्य लताविशेषसे बने वस्त्र।) अथवा कुशसूत्रसे निर्मित होना चाहिये। क्षत्रियोंका पवित्रक कौशेयसूत्रसे, वैश्योंका क्षौमसूत्र तथा वल्कलसूत्रसे (वल्कल - भोजपत्र नामके वृक्षविशेष अथवा अन्य मुलायम छालवाले वृक्षकी छालसे बना वस्त्र (वल्कल वस्त्र)।)) और शूद्रोंका सनसे बना हुआ पतवित्रक प्रशस्त माना गया है। कपास या पद्मज (कमल)-से निर्मित पवित्रक समस्त वर्णोके लिये प्रशस्त है।
ॐकार, शिव, चन्द्रमा, अग्नि, ब्रह्मा, शेष, सूर्य, गणेश और विष्णु-इन नौ देवताओंका इस पवित्रकके तन्तुओंमें निवास है।
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र - ये पवित्रकके तीन सूत्रोंके देवता हैं, जो उनमें अधिष्ठित रहते हैं। इन सूत्रोंको सुवर्ण, रजत, ताम्र, बाँस या मिट्टीके बने हुए पात्रमें रखना चाहिये। एक सौ आठ तन्तुओंका सूत्र उत्तम, चौवन तन्तुओंका सूत्र मध्यम तथा सत्ताईस तन्तुओंका पवित्रक कनिष्ठ होता है।
इन पवित्रकोंके प्रत्येक ग्रन्थि - पर्वोको कुंकुम, हल्दी या चन्दनसे चर्चितकर उपवास रखते हुए उन्हें शास्त्रसम्मत पात्रमें रखकर अधिवासित करे।
पवित्रकको पृथक् - पृथक् अभिमन्त्रित करके उसका सम्यक् दर्शन तथा पुनः पूजन करना चाहिये और यत्रपूर्वक उसका वस्त्राच्छादन करके उसे मण्डलस्थ देवप्रतिमाके समक्ष यत्रपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये।
ब्रह्मादि अन्य देवोंकी स्थापना करके कलशकी पूजा करे मण्डलका निर्माण करके नैवेद्य समर्पित करे। पवित्रकको पुनः अधिवासित (अधिवासन - संस्कारविशेष।) करके तीन या नौ बार सूत्र घुमाकर वेदीको वेष्टित करे। तदनन्तर अपनेको तथा कलश, घी, अग्निकुण्ड, विमान, मण्डप और गृहको सूत्रसे वेष्टित करके एक सूत्र देवताके मस्तकपर अर्पित करे।
इस प्रकार सम्पूर्ण सामग्री निवेदितकर महेश्वर विष्णुकी पूजा करके इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये -
आवाहितोऽसि देवेश पूजार्थ परमेश्वर॥
तत्प्रभातेऽर्चयिष्यामि सामम्र्या: संनिधौ भव।
हे परमेश्वर! देवदेवेश्वर! आप यहाँपर पूजाके लिये आवाहित हैं। इस समस्त सामग्रीसे प्रभात कालमें मैं आपका पूजन करूँगा। आपकी संनिधि यहाँ बनी रहे।
एक रात्रि या तीन रात्रितक पवित्रकको अधिवासित कर स्वयं रात्रिमें जागरण करके प्रातःकाल भगवान् केशवका पूजन करे और निर्मित पवित्रकोंको उन देवको अर्पित करे। पवित्रकको धूपसे धूपित करके मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित भी करना चाहिये।
गायत्री - मन्त्रसे पूजित इस पवित्रकके द्वारा देव - पूजन करके उसे मन्त्र पढ़कर देवताके समक्ष स्थापित कर दे -
विशुद्धग्रन्थिकं रम्यं महापातकनाशनम्।
सर्वपापक्षयं देव तवाग्रे धारयाम्यहम् ॥
हे देव! यह पवित्रक विशुद्ध रूपसे ग्रथित, सुन्दर तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका क्षय करनेवाला है। इसे मैं आपके समक्ष स्थापित करता हूँ। तदनन्तर इस मन्त्रका पाठकर स्वयं भी धारण करना चाहिये -
पवित्र वैष्णवं तेज: सर्वपातकनाशनम्॥
धर्मकामार्थसिद्ध्यर्थं स्वकण्ठे धारयाम्यहम्।
[हे देव!] यह विष्णु - तेज:स्वरूप, सर्वपाप - विनाशक पवित्रक है। मैं धर्म, काम तथा अर्थ-इस त्रिवर्गकी सिद्धिके लिये इसे अपने कण्ठमें धारण करता हूँ। अनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करे -
वनमाला यथा देव कौस्तुभं सततं हृदि।
तद्वत् पवित्रं तन्तूनां मालां त्वं हृदये धर॥
हे देव! आपके हृदयपर जिस प्रकार वनमाला और कौस्तुभ विराजते हैं, उसी प्रकार तन्तुओंकी बनी हुई यह माला और पवित्रक आप अपने हृदयपर धारण करें।
इस प्रकार प्रार्थना करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर और उन्हें दक्षिणा देकर उसी दिन सायंकाल या दूसरे दिन पुनः उसी प्रकार पूजा सम्पन्न करके निम्न मन्त्र पढ़ते हुए विसर्जन करे-
सांवत्सरीमिमां पूजां सम्पाद्य विधिवन्मया।
व्रज पवित्रकेदानीं विष्णुलोकं विसर्जित:॥
हे पवित्रक! मैंने इस सांवत्सरी पूजाको विधिवत् सम्पादित किया है। इस समय मेरे द्वारा विसर्जित आप विष्णुलोकको पधारें।