गरुड महा पुराणम् - आचार खंड
16 - 17 - भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण
रुद्रने कहा - हे शंख-चक्र और गदाको धारण करनेवाले भगवान् हरि! आप पुनः देवदेवेश्वर शुद्धरूप परमात्मा विष्णुके ध्यानका वर्णन करें।
हरिने कहा - हे रुद्र! संसाररूपी वृक्षका विनाश करनेवाले वे हरि ज्ञानरूप, अनन्त, सर्वव्याप्त, अजन्मा और अव्यय हैं। वे अविनाशी, सर्वत्रगामी, नित्य, महान, अद्वितीय ब्रह्म हैं। सम्पूर्ण संसारके मूल कारण तथा समस्त चराचरमें गतिमान् परमेश्वर हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाले तथा सभीके ईश्वर हैं, सम्पूर्ण जगत्का आधार होते हुए भी वे स्वयं निराधार हैं। सभी कारणोंके कारण हैं।
सांसारिक विषयोंकी आसक्तिसे परे उनकी स्थिति है, वे निर्मुक्त हैं। मुक्त योगियोंके ध्येय हैं वे स्थूल शरीरसे रहित नेत्र, पाणि, पाद, पायु, उपस्थादि समस्त इन्द्रियोंसे विहीन हैं। वे हरि मन एवं मनके धर्म सङ्कल्प - विकल्प आदिसे रहित हैं।
वे बुद्धि (भौतिक इन्द्रियविशेष) - से रहित, बुद्धि- धर्म - विवर्जित, अहंकारसे शून्य, चित्तसे अग्राह्य, प्राण - अपान - व्यानादि वायुसे रहित हैं।
हरिने कहा - अब मैं सूर्यकी पूजाका पुनः वर्णन करता हूँ, जो प्राचीन कालमें भूगु ऋषिको सुनायी गयी थी।
'ॐ खखोल्काय नमः'- यह भगवान् सूर्यदेवका मूल मन्त्र है, जो साधकको भोग और मोक्ष प्रदान करता है। (निम्न मन्त्रसे अङ्गन्यास करके साधकको सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये।) यथा..
'ॐ खखोल्काय त्रिदशाय नम:।' 'ॐ विचि ठठ शिरसे नमः।'
'ॐ ज्ञानिने ठठ शिखायै नमः।' 'ॐ सहस्त्रश्मये ठठ कवचाय नमः।'
'ॐ सर्वतेजोऽधिपतये ठठ अस्त्राय नमः।'
'ॐ ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ठठ नमः।'
सूर्यका यह मन्त्र साधकके समस्त पापोंका विनाश करनेवाला है। इसे अग्नि - प्राकार मन्त्र भी कहते हैं।
भगवान् सूर्यको प्रसन्न करनेवाला मन्त्र इस प्रकार है, यह सूर्य - गायत्री - मन्त्र कहलाता है - इस मन्त्र - जपके पश्चात् साधकको सूर्य एवं गायत्रीका सकलीकरण करना चाहिये-
'ॐ आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्य: प्रचोदयात्।'
साधकको प्रत्येक दिशा - प्रदिशामें निम्नलिखित दिक्पाल देवोंके लिये प्रणाम निवेदन करना चाहिये-
'ॐ धर्मात्मने नमः' पूर्वमें, 'ॐ यमाय नमः' दक्षिणमें, 'ॐ दण्डनायकाय नमः' पश्चिममें, 'ॐ दैवताय नमः' उत्तरमें, 'ॐ शयामपिंगलाय नम:' ईशानमें, 'ॐ दीक्षिताय नमः' अग्निकोणमें, 'ॐ वज्रपाणये नमः' नैर्ऋत्यकोणमें, 'ॐ भूर्भुव: स्वः नमः' वायुकोणमें।
हे वृषध्वज! साधकको चाहिये कि वह निम्नािङ्कत मन्त्रोंसे पूर्वादि दिशाओंसे प्रारम्भ करके ईशानकोणतक चन्द्रादि ग्रहोंकी भी पूजा करे-
'ॐ चन्द्राय नक्षत्राधिपतये नम:।' 'ॐ अङ्गारकाय क्षितिसुताय नम:।'
'ॐ बुधाय सोमसुताय नम:।' 'ॐ वागीश्वराय सर्वविद्याधिपतये नमः।'
'ॐ शुक्राय महर्षये भृगुसुताय नमः।' 'ॐ शनैश्चराय सूर्यात्मजाय नमः।'
'ॐ राहवे नमः।' 'ॐ केतवे नमः।'
निम्न तीन मन्त्रोंसे सूर्यदेवको प्रणाम करके उन देवको अर्घ्यादि प्रदान करनेके लिये आवाहित करना चाहिये-
'ॐ अनूरुकाय नमः।' 'ॐ प्रमथनाथाय नमः।' 'ॐ बुधाय नमः।'
'ॐ भगवन्नपरिमितमयूखमालिन् सकलजगत्पते सप्ताश्ववाहन चतुर्भुज परमसिद्धिप्रद विस्फुलिङ्गपिङ्गल तत् एह्येहि इदमर्घ्य मम शिरसि गतं गृह गृह तेजोग्ररूपम् अनग्न ज्वल ज्वल ठठ नमः।'
उपर्युक्त मन्त्रसे आवाहित इन अभीष्ट देवका निम्न मन्त्रसे विसर्जन करे-
'ॐ नमो भगवते आदित्याय सहस्र किरणाय गच्छ सुखं पुनरागमनाय।'
हे सहस्नररश्मि भगवान् आदित्य! आपके लिये मेरा प्रणाम है। हे कृपालु! आप पुनः आगमनके लिये सुखपूर्वक पधारें।
हरिने कहा - हे रुद्र! मैं पुनः सूर्य - पूजाकी विधिका वर्णन करूँगा, जिसे मैंने पहले कुबेरसे कहा था।
[सूर्यपूजा प्रारम्भ करनेसे पूर्व] एकाग्रचित्त होकर पवित्र स्थानपर कर्णिकायुक्त अष्टदल कमल बनाये। तदनन्तर सूर्यदेवका आवाहन करे। तत्पश्चात् भूमिपर निर्मित कमलदलके मध्यमें यन्त्ररूपी खखोल्क भगवान् सूर्यकी उनके परिकरोंके साथ स्थापना करे तथा उन्हें स्नान कराये।
हे शिव! इसके बाद साधक अग्निकोणमें (अभीष्ट) देवके हृदयकी स्थापना करे। ईशान कोणमें सिरकी स्थापना करके नैर्ऋत्य कोणमें शिखाका विन्यास करे। वह पुनः एकाग्रचित्त होकर पूर्व दिशामें उनके धर्म, वायुकोणमें उनके नेत्र और पश्चिम दिशामें उनके अस्त्रका विन्यास करे।
इसी प्रकार अष्टदल कमलके ईशान कोणमें चन्द्र, पूर्व दिशामें मंगल, अग्नि कोणमें बुध, दक्षिण दिशामें बृहस्पति, नैर्ऋत्य कोणमें शुक्र, पश्चिम दिशामें शनि, वायु कोणमें केतु एवं उत्तर दिशामें राहुके पूजनका विधान है। अतः (साधकको इन सभी
ग्रहोंकी पूजा करके) द्वितीय कक्षामें साथ ही द्वादश सूर्योंकी पूजा भी करनी चाहिये।
भग, सूर्य, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और विष्णु- ये द्वादश सूर्य कहे गये हैं।
द्वादश सूर्योकी पूजा करनेके बाद पूर्वादि दिशाओं में इन्द्रादि देवोंकी अर्चना करे तथा जया - विजया - जयन्ती एवं अपराजिता शक्तियोंकी और शेष, वासुकि आदि नागोंकी पूजा करे।