127 - भीमा - एकादशी व्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन - विधि

ब्रह्माजीनी कहा - प्राचीन कालमें माघमासके शुक्ल पक्षमें हस्त नक्षत्रसे युक्त एक एकादशीका व्रत भीमने किया था। इसलिये इस एकादशीको भीमा - एकादशी कहा जाता है। यह आश्चर्य है कि मात्र इसी एकादशीका व्रत करनेसे भीमसेन पितृ ऋणसे मुक्त हो गये थे।

प्राणियोंके पुण्योंकी अभिवृद्धि करनेवाली भीमा - द्वादशी तिथि भीमसेनके नामसे ही प्रसिद्ध भी है। यह तिथि तो बिना हस्त नक्षत्रके संयोगसे ही ब्रह्म हत्यादि पापोंका विनाश कर देती है।

यह द्वादशी तिथि महा पापोंको तो वैसे ही नष्ट कर देती है, जैसे कुमार्गगामी राजासे राज्य, कुपुत्रसे कुल, दुष्टपत्नीसे पति, अधर्मसे धर्म, कुमन्त्रीसे राजा, अज्ञानसे ज्ञान, अशौचसे शौच, अश्रद्धासे श्राद्ध, असत्यसे सत्य, उष्णतासे शीतलता, अनाचारसे सम्पत्ति, कहने मात्रसे दान, विस्मय करनेसे तप, अशिक्षासे पुत्र, दूर चली जानेसे गौ, क्रोधसे शान्ति, नहीं बढ़ानेसे धन, ज्ञानसे अविद्या और निष्कामतासे फल विनष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार पाप नाशके लिये द्वादशी तिथि शुभ कही गयी है।

ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण - चोरी तथा गुरुपत्नी - गमन - ये महापातक मनुष्यमें यदि एक साथ उत्पन्न हो जाये तो इनको त्रिपुष्कर तीर्थ भी नष्ट नहीं कर सकते हैं (किंतु यह द्वादशी उस समस्त पाप समूहको नष्ट कर देती है)। नैमिषक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कालिन्दी (यमुना),गङ्गा तथा सभी तीर्थ भी एकादशीके समान नहीं हैं। कोई भी दान, जप, होम या अन्य पुण्य इसके तुल्य नहीं है। यदि एक ओर पृथिवीके दानका सत्कर्म रखकर दूसरी ओर भगवान्‌ हरिकी इस पवित्र एकादशी तिथिकी तुलना की जाय तो भी यही एक महापुण्य शालिनी एकादशी तिथि सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगी।

इस व्रतमें भगवान्‌ वराहदेवकी स्वर्ण प्रतिमा बनाकर नये ताम्रपात्रमें घटके ऊपर स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणजन समस्त विश्वके बीजभूत विष्णुदेवकी उस प्रतिमाको श्वेत वस्त्रसे आच्छादितकर स्वर्णनिर्मित दीपादिक उपचारोंसे प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करे।

ॐ वराहाय नमः’ इस मन्त्रसे उन विष्णुके चरणकमलोंकी पूजाकर ‘ॐ क्रोडाकृतये नमः’ इस मन्त्रसे उनके कटि प्रदेशका पूजन करे। तदनन्तर ‘ॐ गम्भीरघोषाय नमः’ इस मन्त्रसे उनकी नाभिकी पूजा कर ‘ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः’ इस मन्त्रसे उनके वक्ष:स्थलका पूजन करे। उसके बाद ‘ॐ सहस्रशिरसे नमः’ इस मन्त्रसे उन विष्णु भगवान्‌की भुजाओंकी पूजा करके भक्तको ‘ॐ सर्वेश्वराय नमः’ इस मन्त्रसे उन देवके ग्रीवाभागकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर व्रती ‘ॐ सर्वात्मने नमः’ इस मन्त्रसे मुखकी और ‘ॐ प्रभवाय नमः’ इस मन्त्रसे हरिके ललाट भागकी पूजाकर ‘ॐ शतमयूखाय नमः’ इस मन्त्रसे उन चक्रधारी हरिकी केशराशिकी विधिवत्‌ पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार भगवान्‌ विष्णुकी विधिपूर्वक पूजाको समाप्तकर व्रती रात्रिमें जागरण करते हुए भगवान्‌ हरिके माहात्म्यको प्रतिपादित करनेवाले पुराणकी कथाका श्रवण करे। तदनन्तर प्रातःकाल स्वर्ण निर्मित वराह - सहित सपरिवार भगवान्‌की उस मूर्तिको अपेक्षा रखनेवाले ब्राह्मणको दे करके पारणा करे।

इस विधि - विधानसे व्रत करनेसे मनुष्य पुनः माताके गर्भसे उत्पन्न होकर स्तनका दूध नहीं पान करता है अर्थात्‌ वह पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है। इस पुण्यशालिनी एकादशीका व्रत करनेसे प्राणीको पितृ, गुरु एवं देव - इन तीनों ऋणोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। यह व्रत सभी व्रतोंका आदि स्थान है। इस व्रतको करके मनुष्य अपने समस्त मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त करनेमें सफल रहता है।